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खाई है चोट दिल पर संभलने तो दीजिए...
ब्यूरो, अमर उजाला, जौनपुर
Updated Thu, 19 Feb 2015 11:34 PM IST
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मुनेश्वर महाविद्यालय परिसर में आयोजित कवि गोष्ठी में कवि और शायरों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर सभी को खूब गुदगुदाया। गोष्ठी में कई जनपदों के नामी गिरामी कवि और शायरों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की शुरुआत रचना त्रिपाठी ने अपनी रचना महफिल तो गैर की हो पर बात हो हमारी, सारे जहां से ऊपर औकात हो हमारी... सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। मंजरी पांडेय की रचना खाई है चोट दिल पर संभलने तो दीजिए, हमराह बन सके नहीं चलने तो दीजिए को सभी ने खूब सराहा।
आकाशवाणी के झगड़ू भाई की कविता नाम लिखउली पढ़े बदे, तब विद्या के ठास हो गइली, तरकारी पहुंचावे लगली तब पंडित जी के खास हो गइली...सुनाकर लोगों को खूब हंसाया। डा. पीसी विश्वकर्मा ने कहा कि गिरा दे वो मुझको ठोकर से मारकर, लेकिन मेरे इरादों को हरगिज मिटा सकते नहीं। यमुना प्रसाद उपाध्याय ने आज के कलियुगी संतान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कैसेट्स सजाकर गुलदान में रखना है, मां बाप को गैरेज या दलान में रखना है।
मिथिलेश गहमरी ने कहा कि मस्जिद नहीं होता ये शिवाला नहीं होता, परदों में अगर रोशनी वाला नहीं होता...। सौरभ प्रतापगढ़ी ने कहा कि तू उतारकर फेंक दे ये कपड़े नापाक, तुझ पर जमती नहीं ये नफरत की पोशाक...। कमलेश राय ने अपनी प्रस्तुत कर सभी को खूब गुदगुदाया। आकिब जौनपुरी की रचना खूब सराही गई। अंसारी जौनपुरी ने कहा कि यहां पर मत बांटो त्रिशूल और मत बांटो तलवार, राम की नगरी में रावण की नहीं चलेगी यहां तलवार...। बादशाह प्रेमी देवरिया की रचना पर पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठा।
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संचालन कर रहे कवि सभाजीत द्विवेदी प्रखर ने भी हास्य व्यंग्य सुनाया। शयार अहमद निसार ने कहा कि वतन की सरहदों को पार करना चाहते हैं, हमारी जिंदगी दुखार करना चाहते हैं. यही तो बात है कि दोस्तों में शामिल होकर पीछे वार करना चाहते हैं। मुख्य अतिथि बीएचयू के प्रोफेसर वशिष्ट अनूप रहे। इस मौके पर सुरेंद्र यादव, राजेश यादव, सुभाष चंद्र यादव, अरविंद यादव, अनुज यादव, रायमीर्ति सिंह, धर्मेद्र यादव, प्रमोद, विश्वनाथ यादव आदि मौजूद थे।
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आकाशवाणी के झगड़ू भाई की कविता नाम लिखउली पढ़े बदे, तब विद्या के ठास हो गइली, तरकारी पहुंचावे लगली तब पंडित जी के खास हो गइली...सुनाकर लोगों को खूब हंसाया। डा. पीसी विश्वकर्मा ने कहा कि गिरा दे वो मुझको ठोकर से मारकर, लेकिन मेरे इरादों को हरगिज मिटा सकते नहीं। यमुना प्रसाद उपाध्याय ने आज के कलियुगी संतान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कैसेट्स सजाकर गुलदान में रखना है, मां बाप को गैरेज या दलान में रखना है।
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मिथिलेश गहमरी ने कहा कि मस्जिद नहीं होता ये शिवाला नहीं होता, परदों में अगर रोशनी वाला नहीं होता...। सौरभ प्रतापगढ़ी ने कहा कि तू उतारकर फेंक दे ये कपड़े नापाक, तुझ पर जमती नहीं ये नफरत की पोशाक...। कमलेश राय ने अपनी प्रस्तुत कर सभी को खूब गुदगुदाया। आकिब जौनपुरी की रचना खूब सराही गई। अंसारी जौनपुरी ने कहा कि यहां पर मत बांटो त्रिशूल और मत बांटो तलवार, राम की नगरी में रावण की नहीं चलेगी यहां तलवार...। बादशाह प्रेमी देवरिया की रचना पर पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठा।
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संचालन कर रहे कवि सभाजीत द्विवेदी प्रखर ने भी हास्य व्यंग्य सुनाया। शयार अहमद निसार ने कहा कि वतन की सरहदों को पार करना चाहते हैं, हमारी जिंदगी दुखार करना चाहते हैं. यही तो बात है कि दोस्तों में शामिल होकर पीछे वार करना चाहते हैं। मुख्य अतिथि बीएचयू के प्रोफेसर वशिष्ट अनूप रहे। इस मौके पर सुरेंद्र यादव, राजेश यादव, सुभाष चंद्र यादव, अरविंद यादव, अनुज यादव, रायमीर्ति सिंह, धर्मेद्र यादव, प्रमोद, विश्वनाथ यादव आदि मौजूद थे।