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पटाखों से हवा हुई जहरीली

Wed, 02 Nov 2016 12:46 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, जौनपुर
ब्यूरो/अमर उजाला, जौनपुर Updated Wed, 02 Nov 2016 12:46 AM IST
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from fire work the environmet got polluated
fire work - फोटो : amar ujala
दीपावली के पटाखों के कारण प्रदूषण का स्तर एकाएक बढ़ गया। इसके चलते लोगों को सांस लेना भी मुश्किल हो गया। हवा जहरीली होने से सांस सहित अन्य कई तरह की जानलेवा बीमारियां अपनी चपेट में ले रही है। यदि तेज हवाएं और बारिश नहीं हुई तो बारूदों के गुबार की चादर कई दिनों तक वातावरण में फैली रहेंगी। इससे न सिर्फ मानव जीवन पर बुरा असर पड़ेगा बल्कि पशु पक्षियों भी प्रभावित हो रहे हैं।
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दीपावली के पटाखों से बढ़ते प्रदूषण से पर्यावरण विद् भी चिंतित हैं। उनका मानना है कि तमाम संभावित संकट से उबरने के लिए हम अभी से नहीं चेते तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। हृदय रोग विशेषज्ञ डा. वीएस उपाध्याय कहते हैं कि बारूद का धूआं फेफड़ों में जाने से दमा, टीबी जैसे कई गंभीर रोगों का जन्म होता है। पशु पक्षियों पर भी बुरा असर पड़ता है। वह कहते हैं कि बारूदों के धूएं से ग्लोबल वार्मिंग हो रही जिससे ग्लेसियर को पिघलने का खतरा है। प्रदूषण के चलते ओजोन लेयर में छेद हो रहा है इससे सूर्य से निकलने वाली खतरनाक किरणें जमीन पर आने का खतरा बना है। सूर्य की परावैगनी किरणों से हमारी आंखों की रौशनी जा सकती है, चमड़े में कैंसर समेत अन्य गंभीर बीमारी हो सकती हैं।
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 पर्यावरण विद् एवं पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्राध्यापक डा.मनोज मिश्र कहते हैं कि उत्सव मानने के  लिए मृदंग और ढोल जैसे हमारे वाद्य यंत्र बेहतर विकल्प  हो सकते हैं।  पहले इन्हीं वाद्य यंत्रों के साथ लोग कोई उत्सव मनाया करते थे। डा. मिश्र कहते हैं कि हम पटाखों को पूरी तरह बंद नहीं कर सकते तो कम से कम यह संकल्प जरूर ले सकते हैं कि एक ही पटाखा छोड़ें। ऐसा करने से भी काफी हद तक प्रदूषण कम हो सकता है। वह कहते हैं कि बारूद की गंध से पेड़ पौधों को भी नुकसान हो रहा है। डा. मिश्र कहते हैं कि किसी भी चीज की अंधानुकरण की प्रवृत्ति हमे बदलनी होगी। दो दशक पहले हम तेल और बाती का दीपक जलाते थे। कहीं लाइट और झालर नहीं थे।
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