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मुश्किलों से लड़ीं, आत्मनिर्भर बनीं

Mon, 11 Jan 2021 11:41 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 11 Jan 2021 11:41 PM IST
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Fought hard, became self sufficient
शरूम तैयार करती रोमा कश्यप। - फोटो : JAUNPUR
बदलापुर। जहां चाह है, वहीं राह है। इसे साबित किया है मुरादपुर गांव की रोमा कश्यप ने। तीन वर्ष पहले एक हादसे में पति की मौत के बाद रोमा के भविष्य में अंधेरा छा गया। दो बच्चों का क्या होगा ये चिंता मुंह बाए आगे खड़ी हो गई। लेकिन रोमा ने हार नहीं मानी । मशरूम की खेती ने उन्हें आगे की राह दिखाई। अब न वे खुद को सशक्त बनाने में जुटी हैं बल्कि समूह की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बनी हैं। उनकी इस पहल के लिए ब्लाक स्तर पर उन्हें सम्मानित भी किया जा चुका है।
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मुरादपुर गांव निवासी रोमा कश्यप के पति राकेश सूरत की एक कंपनी में काम करते थे। राकेश ही परिवार का सहारा थे। लेकिन करीब तीन वर्ष पहले काम के दौरान करंट की चपेट में आने से उनकी मौत हो गई। पति की मौत के बाद अचानक से दो बच्चों उज्ज्वल (12) और आयुषी (9) का पूरा जिम्मा रोमा के कंधों पर आ गया। परिवार चलाने के लिए पहले तो आसपास के लोगों से मदद ली। तमाम मुश्किलें झेलीं, ताने सहे, लेकिन ऐसा भला कितने दिन चलता। ऐसे मेेें रोमा को ये बात समझ में आ गई कि खुद को आत्मनिर्भर बनाना ही होगा। इसमें जरिया बना ग्रामीण आजीविका मिशन। नारी शक्ति जनसेवा स्वयं सहायता समूह का गठन कर रोमा कुछ अलग करने की तैयारी में जुट गई। करीब चार माह पहले बिहार के समस्तीपुर में आयोजित कृषि प्रदर्शन व कृषि मेला में वह ब्लाक की ओर से हिस्सा लेने पहुंची तो वहां मशरूम की खेती के बारे में सुनकर उत्साहित हुईं। इसे अपनी तरक्की का जरिया बनाने का संकल्प लिया। घर लौटकर मकान के एक कमरे में खेती की शुरुआत की। पांच किलो भूसा और नर्सरी के साथ खेती की शुरुआत की। अब मशरूम तैयार होने लगा है। रोमा बताती हैं कि पांच सौ रुपये लगाकर एक हजार रुपये तक का उत्पादन मशरूम से हो सकता है। इसके तैयार होने में 25-30 दिन का समय लगता है। पिछले दिनों ब्लाक पर आयोजित मेले में रोमा के स्टाल पर मशरूम की खेती की जानकारी लेने महिलाओं की भीड़ लगी रही। अब अन्य महिलाएं भी इसे अपनाने की तैयारी में हैं। रोमा के मुताबिक जल्द ही इसे वह इसे विस्तृत रूप देंगी।
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खेती में हैं तमाम अवसर
इंटर पास रोमा का कहना है कि पति की मौत के बाद काफी मुश्किलें झेलनी पड़ी। किसी तरह परिवार का भरण-पोषण हो रहा था। हालात देखकर खुद कुछ करने का फैसला लिया। मशरूम की खेती ने नई राह दिखाई है। कम लागत में आमदनी का इससे बढ़िया जरिया नहीं हो सकता। खेत नहीं थे, इसलिए मकान के ही एक कमरे में इसकी खेती करनी पड़ी। बस एक हजार रुपये की लागत से शुरुआत की थी। समूह की महिलाओं के साथ मिलकर इसे वृहद रूप दूंगी। हाथ में पैसे आएंगे तो महिलाओं का भी मन लगेगा।
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मुरादपुर में स्वयं सहायता समूह की सदस्य रोमा को मशरूम की खेती के लिए प्रशिक्षित किया गया है। उनका छोटा सा प्रयास महिलाओं के लिए बड़ी उम्मीद बना है। अन्य महिलाएं भी इस ओर आकर्षित हुई हैं। अन्य गांवों में भी समूह बनाकर इसके लिए प्रेरित किया जा रहा है। सरकार की ओर से 1.10 लाख रुपये की मदद भी दी जा रही है। -अनिल कुमार यादव, ब्लाक मिशन प्रबंधक, एनआरएलएम, बदलापुर।
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