Atal Bihari Vajpayee Birth Anniversary: पहले भाषण में ही विद्यार्थियों के दिल में उतर गए थे अटल जी, दिया था बीसीजी का मंत्र
भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी का जौनपुर से गहरा नाता रहा है। चुनावी रैलियों, सभाओं में वह जितनी बार जौनपुर आए, हमेशा ही एक अमिट छाप छोड़ गए। कोई उनके भाषणों और अद्भुत संवाद शैली का कायल होता था तो कोई उनकी सादगी और सहजता पर रीझ जाता था।
जौनपुर में उनका पहला भाषण राजा श्रीकृष्ण दत्त पीजी कॉलेज में हुआ था। वह छात्र संगठन के कार्यक्रम में यहां आए थे। तब खसरे के प्रकोप से बचाने के लिए देश में चल रहे टीकाकरण अभियान के माध्यम से ही चर्चा में आए बीसीजी के माध्यम से उन्होंने युवाओं को अपना संदेश दिया था।
हिंदी भवन के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार अजय सिंह ने बताया कि जब वह हाईस्कूल के छात्र थे, तब अटल जी को पहली बार सीधे सुनने का मौका मिला था। राज कॉलेज में आयोजित छात्र संगठन के कार्यक्रम में वह अतिथि बनकर पहुंचे थे। युवा अटल की काया जितनी पतली-दुबली थी, उनकी आवाज उतनी ही बुलंद थी।
अद्भुत भाषण से उन्होंने छात्रों का दिल जीत लिया था। तब बीसीजी का टीका काफी चर्चा में था। अटल जी ने बीसीजी को नए ढंग से परिभाषित करते हुए उसे अपनाने के लिए युवाओं को प्रेरित किया। उनके शब्दों में बीसीजी का तात्पर्य ब्रह्मचर्य, चरित्र निर्माण और गुरुसेवा से था।
उन्होंने कहा कि छात्र इस फार्मूले को अपनाकर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें। अटल जी का यह भाषण आज भी नहीं भूलता। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत यही थी, वह अपनी बातों को इतना प्रभावी ढंग से कहते कि श्रोता उसे असहमत नहीं हो सकते थे।
सरल, सहज और सुलभ थे अटल जी
जौनपुर। पं. दीनदयाल उपाध्याय जब जौनपुर से सांसद का चुनाव लड़ रहे थे, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने जौनपुर में लंबा समय बिताया। सड़कों पर पैदल घूमकर चुनाव प्रचार किया। राजा जौनपुर यादवेंद्र दत्त दुबे की हवेली उनका ठिकाना होती थी। कई कार्यक्रमों में अटल जी के साथ प्रचार करने वाले राज कॉलेज में हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. देवेंद्र उपाध्याय बताते हैं कि अटल जी सरल, सहज और सुलभ थे।
उनका कद बड़ा था, लेकिन वह हर किसी से ऐसे मिलते, मानो पुरानी जान-पहचान है। टीडी कॉलेज के प्रबंधक अशोक सिंह ने बताया कि बड़े भाई उमानाथ सिंह के चुनाव में प्रचार के लिए अटल जी का कार्यक्रम था। बाबतपुर हवाई अड्डे पर हम लोग उन्हें लेने पहुंचे थे।
जहाज से उतरते वक्त वह बंद गले की कोट पहने थे, लेकिन तुरंत उन्होंने धोती-कुर्ता पहना और सभा के लिए रवाना हुए। उनका मानना था कि हमारे आचार-विचार में कोई भिन्नता नहीं होनी चाहिए। आसपास के जिलों में भी अटल जी का भाषण होता तो हम लोग उन्हें सुनने जाते थे।