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GRP सिपाही हत्याकांड: 598 तारीखें...19 गवाहों के बयान, 10 धाराओं में आरोप पत्र किया गया था कोर्ट में प्रस्तुत
Sat, 06 Aug 2022 11:57 PM IST
वाराणसी ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, जौनपुर
अमर उजाला नेटवर्क, जौनपुर
Published by: वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 06 Aug 2022 11:57 PM IST
सार
जौनपुर के मछलीशहर से बसपा के पूर्व सांसद उमाकांत यादव समेत सात लोगों को अपर सत्र न्यायाधीश तृतीय शरद कुमार तिवारी ने जीआरपी सिपाही हत्याकांड मामले में दोषी करार दिया है। घटना शाहगंज में 4 फरवरी 1995 को हुई थी। सजा के बिंदु पर आठ अगस्त को सुनवाई होगी।
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उमाकांत यादव
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जौनपुर के शाहगंज में जीआरपी सिपाही हत्याकांड में 598 तारीखें पड़ीं। अपर सत्र न्यायाधीश तृतीय शरद कुमार त्रिपाठी ने दोनों पक्षों की बहस एवं समस्त साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद पूर्व सांसद उमाकांत यादव समेत सात लोगों को दोषी करार दिया है। इस मामले में कुल 19 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए थे।
चार फरवरी 1995 को हुई इस घटना के संबंध में उसी दिन मुकदमा दर्ज हुआ था। मामले की विवेचना पहले जीआरपी ने ही शुरू की थी लेकिन बाद में सीबीसीआईडी ने मामले की जांच शुरू की। विवेचक ने उमाकांत यादव, बच्चू लाल, सूबेदार, धर्मराज, महेंद्र, सभाजीत और राजकुमार को दोषी माना था। साथ ही उनके खिलाफ हत्या एवं हत्या के प्रयास सहित 10 धाराओं में आरोप पत्र कोर्ट में प्रस्तुत किया था। इस मामले में 19 फरवरी 1996 को पहली तारीख पड़ी थी।
इस दौरान एमपी/एमएलए कोर्ट प्रयागराज में बनने के कारण पत्रावली वहां भेजी गई थी लेकिन बाद में हाईकोर्ट के दिशा निर्देश से यहां व अन्य जिलों में एमपी/एमएलए कोर्ट अलग से गठित हुई। अभियोजन पक्ष से सीबीसीआईडी के सरकारी वकील मृत्युंजय सिंह एवं दीवानी जौनपुर के सरकारी वकील लाल बहादुर पाल और अनिल सिंह कप्तान ने अभियोजन पक्ष से पैरवी की। 19 गवाह परीक्षित कराए गए। गवाह पुलिसकर्मी लल्लन सिंह आरोपियों के भय से पक्षद्रोही घोषित हुए। पुलिसकर्मी रघुनाथ सिंह और लालमणि सिंह ने घटना की पुष्टि की।
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मालखाना लूटने का भी लगा आरोप
अभियोजन के मुताबिक फायरिंग में जीआरपी कांस्टेबल अजय सिंह की मौत हो गई थी तथा आरक्षी लल्लन सिंह, रेल कर्मी निर्मल लाल तथा एक यात्री भरत लाल गंभीर रूप से घायल हो गए थे। फायरिंग से चौकी के दरवाजे व शीशे टूट गए थे। आरोपितों ने राजकुमार को पुलिस अभिरक्षा से छुड़ा लिया था, इसके बाद चौकी के मालखाने को लूटने का प्रयास किया था। पुलिस कर्मी रघुनाथ सिंह व लालमणि सिंह ने सरकारी रायफल से फायरिंग की थी, तब उमाकांत और अन्य आरोपी राजकुमार को अपने साथ लेकर भाग गए थे। घायलों का मेडिकल कराया गया था।
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चार फरवरी 1995 को हुई इस घटना के संबंध में उसी दिन मुकदमा दर्ज हुआ था। मामले की विवेचना पहले जीआरपी ने ही शुरू की थी लेकिन बाद में सीबीसीआईडी ने मामले की जांच शुरू की। विवेचक ने उमाकांत यादव, बच्चू लाल, सूबेदार, धर्मराज, महेंद्र, सभाजीत और राजकुमार को दोषी माना था। साथ ही उनके खिलाफ हत्या एवं हत्या के प्रयास सहित 10 धाराओं में आरोप पत्र कोर्ट में प्रस्तुत किया था। इस मामले में 19 फरवरी 1996 को पहली तारीख पड़ी थी।
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इस दौरान एमपी/एमएलए कोर्ट प्रयागराज में बनने के कारण पत्रावली वहां भेजी गई थी लेकिन बाद में हाईकोर्ट के दिशा निर्देश से यहां व अन्य जिलों में एमपी/एमएलए कोर्ट अलग से गठित हुई। अभियोजन पक्ष से सीबीसीआईडी के सरकारी वकील मृत्युंजय सिंह एवं दीवानी जौनपुर के सरकारी वकील लाल बहादुर पाल और अनिल सिंह कप्तान ने अभियोजन पक्ष से पैरवी की। 19 गवाह परीक्षित कराए गए। गवाह पुलिसकर्मी लल्लन सिंह आरोपियों के भय से पक्षद्रोही घोषित हुए। पुलिसकर्मी रघुनाथ सिंह और लालमणि सिंह ने घटना की पुष्टि की।
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मालखाना लूटने का भी लगा आरोप
अभियोजन के मुताबिक फायरिंग में जीआरपी कांस्टेबल अजय सिंह की मौत हो गई थी तथा आरक्षी लल्लन सिंह, रेल कर्मी निर्मल लाल तथा एक यात्री भरत लाल गंभीर रूप से घायल हो गए थे। फायरिंग से चौकी के दरवाजे व शीशे टूट गए थे। आरोपितों ने राजकुमार को पुलिस अभिरक्षा से छुड़ा लिया था, इसके बाद चौकी के मालखाने को लूटने का प्रयास किया था। पुलिस कर्मी रघुनाथ सिंह व लालमणि सिंह ने सरकारी रायफल से फायरिंग की थी, तब उमाकांत और अन्य आरोपी राजकुमार को अपने साथ लेकर भाग गए थे। घायलों का मेडिकल कराया गया था।