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मंगलवार की रात खुलेगा गौसपीर दरगाह का फाटक
Updated Sat, 15 Dec 2018 12:55 AM IST
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खुटहन। दरबारे कादरिया गौसपीर दरगाह का फाटक मंगलवार की रात 11 बजकर 11 मिनट पर खुल जाएगा। इसी के साथ यहां का सालाना उर्स (मेला) भी शुरू हो जाएगा। फाटक खुलने के बाद जायरीन मस्जिद के भीतर मत्था टेकेंगे। यह उर्स प्रत्येक वर्ष रबी उस्सानी की ग्यारहवें से शुरू होकर सत्रह दिनों तक चलता है। यहां देश के विभिन्न प्रांतों से हजारों जायरीन मत्था टेकने आते हैं। दरगाह समिति के मुतवल्ली मंसूर शाह ने बताया कि मेले की तैयारियां अंतिम चरण पर है। जिसे मंगलवार के पूर्व ही पूरा कर लिया जाएगा।
जनपद मुख्यालय से लगभग 25 किमी पश्चिम गौसपुर गांव स्थित दरगाह के विषय में कहावत है कि इजरत शाह मोहम्मद उमर व इजारत शाह नगीना दोनों भाई लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व इजारत के लिए बगदाद शरीफ गए थे। जहां से उन दोनों ने एक ईंट लाया था। गौसपुर में रात्रि विश्राम के बाद उन्हें स्वप्न में बरसात हुई कि ईंट को इसी जगह एक रौजा की तामीर करके नस्ब कर दिया जाए। ताकि इस जमीन पर भी बगदाद शरीफ की तरह गौसपाक फैज का चश्मा जारी रहे।
यही पाक ईंट दरगाह की गुंबद के भीतर छोटे से कुब्बे मे नस्ब है। इसी कुब्बे का फाटक रबी उस्सानी की ग्यारहवें की रात जायरीनों को मत्था टेकने लिए खोला जाता है। दरगाह के दक्षिण तरफ हजरत शाह मोहम्मद उमर और शाह नगीना दोनों भाइयों की मजार बनी हुई है। यहां जायरीन चादर चढ़ाते हैं। दरगाह पर वार्षिक उर्स के अलावा भी प्रत्येक गुरुवार को अकीदत मंद पहुंचते हैं। दरगाह की मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई मुरादें अवश्य पूरी होती हैं। सबसे अधिक प्रेत बाधा के निवारण के लिए लोग आते हैं। मेले मे अल्पसंख्यक समुदाय के अलावा भी हिन्दू धर्म के लोगों का भी खूब जमावड़ा होता है। दरगाह के मुतवल्ली मोहम्मद मंसूर, मोहम्मद असलम, मोहम्मद हारुन ने बताया कि मेले की पूरी व्यवस्था में प्रशासनिक अमला कोई सहयोग नहीं दे रहा है। यहां पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा साफ सफाई कराना आवश्यक है।
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जनपद मुख्यालय से लगभग 25 किमी पश्चिम गौसपुर गांव स्थित दरगाह के विषय में कहावत है कि इजरत शाह मोहम्मद उमर व इजारत शाह नगीना दोनों भाई लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व इजारत के लिए बगदाद शरीफ गए थे। जहां से उन दोनों ने एक ईंट लाया था। गौसपुर में रात्रि विश्राम के बाद उन्हें स्वप्न में बरसात हुई कि ईंट को इसी जगह एक रौजा की तामीर करके नस्ब कर दिया जाए। ताकि इस जमीन पर भी बगदाद शरीफ की तरह गौसपाक फैज का चश्मा जारी रहे।
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यही पाक ईंट दरगाह की गुंबद के भीतर छोटे से कुब्बे मे नस्ब है। इसी कुब्बे का फाटक रबी उस्सानी की ग्यारहवें की रात जायरीनों को मत्था टेकने लिए खोला जाता है। दरगाह के दक्षिण तरफ हजरत शाह मोहम्मद उमर और शाह नगीना दोनों भाइयों की मजार बनी हुई है। यहां जायरीन चादर चढ़ाते हैं। दरगाह पर वार्षिक उर्स के अलावा भी प्रत्येक गुरुवार को अकीदत मंद पहुंचते हैं। दरगाह की मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई मुरादें अवश्य पूरी होती हैं। सबसे अधिक प्रेत बाधा के निवारण के लिए लोग आते हैं। मेले मे अल्पसंख्यक समुदाय के अलावा भी हिन्दू धर्म के लोगों का भी खूब जमावड़ा होता है। दरगाह के मुतवल्ली मोहम्मद मंसूर, मोहम्मद असलम, मोहम्मद हारुन ने बताया कि मेले की पूरी व्यवस्था में प्रशासनिक अमला कोई सहयोग नहीं दे रहा है। यहां पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा साफ सफाई कराना आवश्यक है।
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