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अपराजिता 100 मिलियन इस्माइल्स के तहत हुई संगोष्ठी
Updated Wed, 21 Nov 2018 11:55 PM IST
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जौनपुर। जैसे-जैसे महिलाओं की भूमिका बदल रही है, वैसे परिवार के लोगों को समझने की आवश्यकता कि इसे स्वीकार करें और उनसे सामंजस्य बनाएं, तभी महिला सशक्तिकरण का सपना साकार हो सकेगा, तभी अबला अपराजिता बन सकेगी। वहीं, महिलाओं को भी यह ध्यान रहे कि परिवार की धुरी हैं रिश्ते संजोना उनकी जिम्मेदारी है। अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत पश्चिमी सहकारी कॉलोनी स्थित अमर उजाला कार्यालय में बुधवार को ‘पारिवारिक तालमेल में महिला की भूमिका’ विषयक संवाद कार्यक्रम हुआ। इसमें शहर के विभिन्न वर्ग की विचारशील महिलाओं में गहन चर्चा की।
सहायक चकबंदी अधिकारी डॉ. शांता तिवारी ने कहा कि अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स नारी की गरिमा के लिए एक साक्षा मंच तैयार करने की मुहिम है। उन्होंने कहा कि समाज का नकारात्मक माहौल आज के दौर में महिलाओं के लिए चुनौती है। ऐसे में महिलाओं को रिश्तों को सजोकर रखना ही उनके जीवन की पूंजी है। टीडी कॉलेज शिक्षा विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्रद्धा सिंह ने कहा कि परिवार में जब तक हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझेंगी जब तक परेशानियां आएगी। स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. शिखा शुक्ला ने कहा कि प्रेम एवं तालमेल हो तो परिवार में कोई दिक्कत नहीं आती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में शादी एवं परिवार को बेहद पवित्र बंधन माना गया है। महिला समाख्या की रेखा मौर्या ने समाज में महिलाओं की स्थिति एवं नौकरी पेशा वाली महिलाओं के साथ सामाजिक एवं पारिवारिक नजरिए पर विस्तार से अपनी बातों को रखा।
अध्यापिका किरण मिश्रा ने कहा कि पारिवारिक रिश्ता तालमेल से चलता है। गृहिणी ज्योति पाठक ने कहा कि रिश्तों को बोझ की तरह नहीं समझना चाहिए। पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन भी एक जिम्मेदारी है। सामाजिक कार्यकर्त्ता ज्योति पाठक ने कहा कि परिवार में हर व्यक्ति एक ही सोच का नहीं हो सकता। अध्यापिका आस्था श्रीवास्तव ने कहा कि नौकरी पेशा में होने के बावजूद भी महिलाओं के ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियां है जिसे बेहतर तालमेल बनाकर उन्हें निर्वहन करना चाहिए। उन्होंने बाहर एवं घर में होने वाली परेशानियों का जिक्र किया। अध्यापिका माला कश्यप ने कहा कि जो काम बेटियां करती हैं वहीं काम बेटों से भी करना चाहिए। उनका परिवार में सहयोग होना चाहिए। इससे बेटियों के मन में हीन भावना पैदा नहीं होती। अध्यापिका मंजू सिंह ने कहा कि आपसी समझ-बूझ से परिवार को खुश रखा जा सकता है। अंशिका तिवारी ने कहा पढ़ी-लिखी बेटियां जागरूक होकर खुद अपनी रक्षा करने में समर्थ हो रही है। हम सभी को पुरानी रुढ़िवादी परंपरा से निकल कर नए समाज के निर्माण के लिए आगे आना होगा। इच्छा तिवारी ने कहा कि परिवार टूटता क्यों है विषय पर विस्तार से अपनी बातों को रखा। निहारिका ने कहा कि किसी भी नौकरी पेशा में कार्यरत महिला का परिवार सपोर्ट नहीं करता। उसे घर के अंदर एवं बाहर कड़े संघर्ष करने होते हैं। परिवार का भी दायित्व है कि ऐसी महिलाओं को कामकाज में सपोर्ट करें।
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किसी भी गलती के लिए केवल महिलाओं को ही जिम्मेदार नहीं मान लेना चाहिए। यदि किसी महिला से कोई गलती हो भी जाती है तो उसे भूल को सुधारने के लिए मौका देना चाहिए।
डॉ. शांता तिवारी, सहायक चकबंदी अधिकारी
महिलाओं को हमेशा सकारात्मक दिशा में सोचना चाहिए। महिलाओं की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अपने को एक आदर्श के रूप में हमेशा प्रस्तुत करें। इससे परिवार में एक दूसरे के प्रति प्रेम बना रहता है।
डॉ. शैली निगन, स्त्री रोग विशेषज्ञ
महिलाओं को पुरानी रुढ़िवादी परंपरा से निकल कर नए समाज के निर्माण के लिए आगे आना होगा। महिलाएं अपने और परिवार की जिम्मेदारी का निर्वहन जितना बेहतर करेंगी परिवार का उतना बेहतर विकास होगा।
निशा मिश्रा, प्रधानाध्यापक
महिलाओं को अत्याचार सहने के बजाय उसका विरोध करना चाहिए। पर रिश्तो कों संभालते हुए क्योंकि ये बहुत नाजुक होते हैं। उन्हें संजोये रखना बहुत जरूरी होता है। परिवार को सूत्र में बांधे रखने से ही विकास संभव है।
कुमुदिनी अस्थाना, सहायक अध्यापक
महिलाओं को परिवार की धूरी की संज्ञा दी गई है। त्याग के साथ-साथ उन्हें नारी की गरिमा का हमेशा ध्यान रखना होगा। परिवार को चलाने के लिए तालमेल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
डॉ. शिखा शुक्ला, स्त्री रोग विशेषज्ञ
परिवार को संस्कारिक करने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नारी के आदर्शों को बनाए रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। परिवार को आगे बढ़ाने और सामाजिक दायित्यों के निर्वहन में पूरी सहभागिता करनी चाहिए।
डॉ. नीता सिंह, शिक्षक राज कॉलेज
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सहायक चकबंदी अधिकारी डॉ. शांता तिवारी ने कहा कि अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स नारी की गरिमा के लिए एक साक्षा मंच तैयार करने की मुहिम है। उन्होंने कहा कि समाज का नकारात्मक माहौल आज के दौर में महिलाओं के लिए चुनौती है। ऐसे में महिलाओं को रिश्तों को सजोकर रखना ही उनके जीवन की पूंजी है। टीडी कॉलेज शिक्षा विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्रद्धा सिंह ने कहा कि परिवार में जब तक हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझेंगी जब तक परेशानियां आएगी। स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. शिखा शुक्ला ने कहा कि प्रेम एवं तालमेल हो तो परिवार में कोई दिक्कत नहीं आती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में शादी एवं परिवार को बेहद पवित्र बंधन माना गया है। महिला समाख्या की रेखा मौर्या ने समाज में महिलाओं की स्थिति एवं नौकरी पेशा वाली महिलाओं के साथ सामाजिक एवं पारिवारिक नजरिए पर विस्तार से अपनी बातों को रखा।
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अध्यापिका किरण मिश्रा ने कहा कि पारिवारिक रिश्ता तालमेल से चलता है। गृहिणी ज्योति पाठक ने कहा कि रिश्तों को बोझ की तरह नहीं समझना चाहिए। पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन भी एक जिम्मेदारी है। सामाजिक कार्यकर्त्ता ज्योति पाठक ने कहा कि परिवार में हर व्यक्ति एक ही सोच का नहीं हो सकता। अध्यापिका आस्था श्रीवास्तव ने कहा कि नौकरी पेशा में होने के बावजूद भी महिलाओं के ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियां है जिसे बेहतर तालमेल बनाकर उन्हें निर्वहन करना चाहिए। उन्होंने बाहर एवं घर में होने वाली परेशानियों का जिक्र किया। अध्यापिका माला कश्यप ने कहा कि जो काम बेटियां करती हैं वहीं काम बेटों से भी करना चाहिए। उनका परिवार में सहयोग होना चाहिए। इससे बेटियों के मन में हीन भावना पैदा नहीं होती। अध्यापिका मंजू सिंह ने कहा कि आपसी समझ-बूझ से परिवार को खुश रखा जा सकता है। अंशिका तिवारी ने कहा पढ़ी-लिखी बेटियां जागरूक होकर खुद अपनी रक्षा करने में समर्थ हो रही है। हम सभी को पुरानी रुढ़िवादी परंपरा से निकल कर नए समाज के निर्माण के लिए आगे आना होगा। इच्छा तिवारी ने कहा कि परिवार टूटता क्यों है विषय पर विस्तार से अपनी बातों को रखा। निहारिका ने कहा कि किसी भी नौकरी पेशा में कार्यरत महिला का परिवार सपोर्ट नहीं करता। उसे घर के अंदर एवं बाहर कड़े संघर्ष करने होते हैं। परिवार का भी दायित्व है कि ऐसी महिलाओं को कामकाज में सपोर्ट करें।
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डॉ. शांता तिवारी, सहायक चकबंदी अधिकारी
महिलाओं को हमेशा सकारात्मक दिशा में सोचना चाहिए। महिलाओं की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अपने को एक आदर्श के रूप में हमेशा प्रस्तुत करें। इससे परिवार में एक दूसरे के प्रति प्रेम बना रहता है।
डॉ. शैली निगन, स्त्री रोग विशेषज्ञ
महिलाओं को पुरानी रुढ़िवादी परंपरा से निकल कर नए समाज के निर्माण के लिए आगे आना होगा। महिलाएं अपने और परिवार की जिम्मेदारी का निर्वहन जितना बेहतर करेंगी परिवार का उतना बेहतर विकास होगा।
निशा मिश्रा, प्रधानाध्यापक
महिलाओं को अत्याचार सहने के बजाय उसका विरोध करना चाहिए। पर रिश्तो कों संभालते हुए क्योंकि ये बहुत नाजुक होते हैं। उन्हें संजोये रखना बहुत जरूरी होता है। परिवार को सूत्र में बांधे रखने से ही विकास संभव है।
कुमुदिनी अस्थाना, सहायक अध्यापक
महिलाओं को परिवार की धूरी की संज्ञा दी गई है। त्याग के साथ-साथ उन्हें नारी की गरिमा का हमेशा ध्यान रखना होगा। परिवार को चलाने के लिए तालमेल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
डॉ. शिखा शुक्ला, स्त्री रोग विशेषज्ञ
परिवार को संस्कारिक करने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नारी के आदर्शों को बनाए रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। परिवार को आगे बढ़ाने और सामाजिक दायित्यों के निर्वहन में पूरी सहभागिता करनी चाहिए।
डॉ. नीता सिंह, शिक्षक राज कॉलेज