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स्वतंत्रता की धधकती आग में शहीदों का गवाह बना सेनापुर बाग
Updated Sun, 12 Aug 2018 12:09 AM IST
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थानागद्दी। मेरठ में 1857 में इस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ चिनगारी भड़की तो उसकी आंच जौैनपुर के डोभी में भी महसूस की गई। क्रांति की रोटी यहां पहुंची हो या नहीं लेकिन यहां के रणबांकुरों ने अंग्रेजों से जबरदस्त लोहा लिया। लंबी लड़ाई के बाद सीधे मुकाबले में सफल नहीं होने पर कंपनी के अफसरों ने धोखे से समझौते के लिए सेनपुरा बुलाया बुलाया और 22 रणबांकुरों को फांसी दे दी। उसके बाद उनके सहयोगियों का दमन किया गया।
जौनपुर मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर पूरब केराकत तहसील का सेनापुर गांव हैं। जहां के शहीद बाग में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 22 रणबांकुरों को फांसी दी गई थी। मेरठ में भड़ी चिंगारी पूर्वी उत्तर प्रदेश में आग बनकर धधकने लगी थी। बनारस में जून माह में कंपनी के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ तो उसकी खबर जौनपुर पहुंची तो डोभी और चौदह कोस में फैले कटेहर क्षेत्र के रघुवंशियों ने अपनी सेना गठित कर ली। जौनपुर और वाराणसी की सीमा पर मौजूद दानगंज में दानू अहीर अपने सात पुत्रों के साथ सेनानी बनकर अंग्रेजों पर कहर बनकर टूट पड़ेडोभी के रघुवंशियों ने संगठित होकर सेना का रूप धारण कर लिया। उन्होेंने अंग्रेजों को कई बार खदेड़कर जौनपुर की सीमा से बाहर कर दिया। अंग्रेजी सेना को वाराणसी के बावनबीघा तक खदेड़ने दिया और वाराणसी-आजमगढ़ मार्ग पर कब्जा कर लिया। क्रांतिकारियों ने नील गोदाम पर भी कब्जा कर लिया था। सितंबर माह में गोरखा सेना आई लेकिन उसकी भी एक न चली। बाद में अंग्रेजों ने समझौते के बहाने सेनापुर में पंचायत बुलाई। वहां अंग्रेजों ने डोभी के 22 क्रांतिवीरों को गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी दे दी। फांसी पर लटकाने के बाद अंग्रेजों ने उन पर गोलियां चलाईं। 22 शहीदों में सात लोग कौन थे, इसका पता नहीं चल पाया। सेनपुरा के शहीद बाग के शिलापट्ट पर 10 गांवों के यदुबीर सिंह, शिवब्रत सिंह, जयमंगल सिंह, देवकी सिंह, रामदुलार सिंह, अभिलाष सिंह, ठाकुर सिंह, शिवराम अहीर ,किशुन अहीर, माधव सिंह, विश्वेसर सिंह, छांगुर सिंह एवं रामभरोस सहिं सहित केवल 15 शहीदों के नाम अंकित हैं। शहीदों की इस पवित्र भूमि की तरफ शासन और जनप्रतिनिधियों की आज तक नजरे इनायत नहीं हुई। ढाई दशक पूर्व तत्कालीन सांसद राजनाथ सोनकर शास्त्री ने एक एकड़ में फैले शहीद बाग की चहारदीवारी बनवाई थी। गांव के जयप्रकाश सिंह ने बताया कि गेट टूटकर गिर गया है। शहीद बाग में हरे पेड़ो की कटाई और खनन किया जाता रहा, जिसे किसी तरह रोकवाया गया। पूर्व प्रधान डा. राम लौटन विश्वकर्मा ने तालाब खुदवाया था किंतु अब खनन से उसका स्वरूप बिगड़ गया हैं। डा. ईश्वरदत्त सिंह, श्याम कन्हैया सिंह, शारदा और बुझारत के कहने पर पूर्वांचल विश्विद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. शरत कुमार सिंह 1995 में शिलापट्ट और शहीद स्मारक का सुंदरीकरण कराया था। समाजसेवी जयप्रकाश सिंह ने जिलाधिकारी और कबीना मंत्री तथा इस जिले के प्रभारी रीता बहुगुणा जोशी को पत्र देकर शहीद स्थल के सुंदरीकरण की मांग की है।
जौनपुर मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर पूरब केराकत तहसील का सेनापुर गांव हैं। जहां के शहीद बाग में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 22 रणबांकुरों को फांसी दी गई थी। मेरठ में भड़ी चिंगारी पूर्वी उत्तर प्रदेश में आग बनकर धधकने लगी थी। बनारस में जून माह में कंपनी के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ तो उसकी खबर जौनपुर पहुंची तो डोभी और चौदह कोस में फैले कटेहर क्षेत्र के रघुवंशियों ने अपनी सेना गठित कर ली। जौनपुर और वाराणसी की सीमा पर मौजूद दानगंज में दानू अहीर अपने सात पुत्रों के साथ सेनानी बनकर अंग्रेजों पर कहर बनकर टूट पड़ेडोभी के रघुवंशियों ने संगठित होकर सेना का रूप धारण कर लिया। उन्होेंने अंग्रेजों को कई बार खदेड़कर जौनपुर की सीमा से बाहर कर दिया। अंग्रेजी सेना को वाराणसी के बावनबीघा तक खदेड़ने दिया और वाराणसी-आजमगढ़ मार्ग पर कब्जा कर लिया। क्रांतिकारियों ने नील गोदाम पर भी कब्जा कर लिया था। सितंबर माह में गोरखा सेना आई लेकिन उसकी भी एक न चली। बाद में अंग्रेजों ने समझौते के बहाने सेनापुर में पंचायत बुलाई। वहां अंग्रेजों ने डोभी के 22 क्रांतिवीरों को गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी दे दी। फांसी पर लटकाने के बाद अंग्रेजों ने उन पर गोलियां चलाईं। 22 शहीदों में सात लोग कौन थे, इसका पता नहीं चल पाया। सेनपुरा के शहीद बाग के शिलापट्ट पर 10 गांवों के यदुबीर सिंह, शिवब्रत सिंह, जयमंगल सिंह, देवकी सिंह, रामदुलार सिंह, अभिलाष सिंह, ठाकुर सिंह, शिवराम अहीर ,किशुन अहीर, माधव सिंह, विश्वेसर सिंह, छांगुर सिंह एवं रामभरोस सहिं सहित केवल 15 शहीदों के नाम अंकित हैं। शहीदों की इस पवित्र भूमि की तरफ शासन और जनप्रतिनिधियों की आज तक नजरे इनायत नहीं हुई। ढाई दशक पूर्व तत्कालीन सांसद राजनाथ सोनकर शास्त्री ने एक एकड़ में फैले शहीद बाग की चहारदीवारी बनवाई थी। गांव के जयप्रकाश सिंह ने बताया कि गेट टूटकर गिर गया है। शहीद बाग में हरे पेड़ो की कटाई और खनन किया जाता रहा, जिसे किसी तरह रोकवाया गया। पूर्व प्रधान डा. राम लौटन विश्वकर्मा ने तालाब खुदवाया था किंतु अब खनन से उसका स्वरूप बिगड़ गया हैं। डा. ईश्वरदत्त सिंह, श्याम कन्हैया सिंह, शारदा और बुझारत के कहने पर पूर्वांचल विश्विद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. शरत कुमार सिंह 1995 में शिलापट्ट और शहीद स्मारक का सुंदरीकरण कराया था। समाजसेवी जयप्रकाश सिंह ने जिलाधिकारी और कबीना मंत्री तथा इस जिले के प्रभारी रीता बहुगुणा जोशी को पत्र देकर शहीद स्थल के सुंदरीकरण की मांग की है।
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