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आधुनिकता की दौड़ में घट रही है अनरसा की लोकप्रियता
Updated Thu, 26 Jul 2018 12:08 AM IST
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सिकरारा। अनरसा बरसात की प्रमुख मिठाई है। डमरुआ के अनरसा की कभी पूरे पूर्वांचल में धूम थी लेकिन अब मांग कम हो गई है। दरअसल बदलते दौर में अनरसा के तलबगार कम हो गई है। जब मिठाई की ही पूछ नहीं रही तो डमरुआ का अनरसा भी कितने दिनों तक अपनी साख बचाए रखता।
पहले बरसात की दिनों में अनरसा ही प्रमुख मिठाई थी। तीज-त्योहारों पर लोग अपने रिश्तेदारों के यहां अनरसा ही भेजा जाता था। इसमें डमरुआ का अनरसा तो सबसे ललीज माना जाता था। चावल के आटे से बनने वाली यह मिठाई बरसात के दिनों में खराब नहीं होती थी लेकिन समय के साथ-साथ खानपान का तरीका भी बदल गया। अब अनरसा की मांग कम हो गई है। पहले डमरुआ बाजार मे 15 परिवार इस मिठाई को बनाते थे। चावल का आटा, शक्कर और गुड़ तथा तेल से तैयार की गयी यह मिठाई परिवार के चार से पांच सदस्य लगकर बनाते थे और अल सुबह बड़ी बड़ी खंचियों में लाद कर साइकिल से ही व्यापारी जौनपुर तक इसकी आपूर्ति करने जाते थे। मगर खोवे और छेने की मिठाइयों ने इस पारंपरिक मिठाई को क पीछे ढकेल दिया। मांग कम हुई तो डमरुआ में अनरसा बनाने वाले भी इस मिठाई के निर्माण से अलग होते गए।
डमरुआ में अनरसा बनना कम हुआ लेकिन बरईपार तथा लाल बाजार में यह मिठाई पहुंच गई है। दरअसल डमरुआ की लड़कियां ब्याह के बाद जब इन कस्बों में पहुंची तो उन्होंने इस मिठाई का उत्पादन वहां शुरू कर दिया। लाल बाजार के प्रमुख निर्माता त्रिभुवन नाथ बताते हैं कि पिछले सालों में वे जितनी बिक्री करते थे, इस साल बारिश कम होने के कारण वे उतना नहीं कर पाए। उनका कहना है कि चावल के दाम में वृद्धि हुई है लेकिन अनरसा का भाव पुराना ही है। तिल वाले अनरसा की कीमत 100 रुपये तथा सादा 80 रुपये प्रति किलो है। मगर गुड़ वाला अनरसा बाजार से गायब होता जा रहा है। दीपक व प्रदीप बताते हैं कि मिठाई बनने में जितनी मेहनत लगती है, उसके हिसाब से लाभ कम होता है। लिहाजा लोग इसे छोड़ते जा रहे हैं। प्रमिला देवी का कहना है कि भले ही बाजार में तरह-तरह की मिठाइयां आ गयी हों लेकिन बहू -बेटियों को तीज भेजते समय लोगों को अनरसा की याद आती है।
पहले बरसात की दिनों में अनरसा ही प्रमुख मिठाई थी। तीज-त्योहारों पर लोग अपने रिश्तेदारों के यहां अनरसा ही भेजा जाता था। इसमें डमरुआ का अनरसा तो सबसे ललीज माना जाता था। चावल के आटे से बनने वाली यह मिठाई बरसात के दिनों में खराब नहीं होती थी लेकिन समय के साथ-साथ खानपान का तरीका भी बदल गया। अब अनरसा की मांग कम हो गई है। पहले डमरुआ बाजार मे 15 परिवार इस मिठाई को बनाते थे। चावल का आटा, शक्कर और गुड़ तथा तेल से तैयार की गयी यह मिठाई परिवार के चार से पांच सदस्य लगकर बनाते थे और अल सुबह बड़ी बड़ी खंचियों में लाद कर साइकिल से ही व्यापारी जौनपुर तक इसकी आपूर्ति करने जाते थे। मगर खोवे और छेने की मिठाइयों ने इस पारंपरिक मिठाई को क पीछे ढकेल दिया। मांग कम हुई तो डमरुआ में अनरसा बनाने वाले भी इस मिठाई के निर्माण से अलग होते गए।
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डमरुआ में अनरसा बनना कम हुआ लेकिन बरईपार तथा लाल बाजार में यह मिठाई पहुंच गई है। दरअसल डमरुआ की लड़कियां ब्याह के बाद जब इन कस्बों में पहुंची तो उन्होंने इस मिठाई का उत्पादन वहां शुरू कर दिया। लाल बाजार के प्रमुख निर्माता त्रिभुवन नाथ बताते हैं कि पिछले सालों में वे जितनी बिक्री करते थे, इस साल बारिश कम होने के कारण वे उतना नहीं कर पाए। उनका कहना है कि चावल के दाम में वृद्धि हुई है लेकिन अनरसा का भाव पुराना ही है। तिल वाले अनरसा की कीमत 100 रुपये तथा सादा 80 रुपये प्रति किलो है। मगर गुड़ वाला अनरसा बाजार से गायब होता जा रहा है। दीपक व प्रदीप बताते हैं कि मिठाई बनने में जितनी मेहनत लगती है, उसके हिसाब से लाभ कम होता है। लिहाजा लोग इसे छोड़ते जा रहे हैं। प्रमिला देवी का कहना है कि भले ही बाजार में तरह-तरह की मिठाइयां आ गयी हों लेकिन बहू -बेटियों को तीज भेजते समय लोगों को अनरसा की याद आती है।
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