{"_id":"5ad644ab4f1c1b87028b51c7","slug":"152399172214-jaunpur-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"शायर अंजुम जौनपुरी नहीं रहे","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शायर अंजुम जौनपुरी नहीं रहे
Updated Wed, 18 Apr 2018 12:47 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
जौनपुर। हिंदुस्तान के मशहूर शायरों में स्थान रखने वाले जिले के मशहूर शायर अंजुम जौनपुरी का मंगलवार को इंतकाल हो गया। बीएचयू में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।
नगर के अजमेरी मोहल्ला निवासी मुफ्ती मेंहदी हैदर उर्फ अंजुम जौनपुरी (67) ने देश विदेश में अपनी शायरी के दम पर अपनी पहचान स्थापित की। फिराक गोरखपुरी, अली सरदार जाफरी, वामिक जौनपुरी, कुमार बाराबंकी व कैफी आजमी जैसे शायरों के साथ उनको मंच पर शायरी करने का मौका मिला। 1981 में वे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के कराची में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मुशायरे में भी शामिल हुए थे। उन्होंने करबला के शहीदों पर सैकड़ों नौहे भी लिखे है। 1971 में अंजुम जौनपुरी परिवहन विभाग में टेक्निशियन के पद पर तैनात हुए थे और पूर्वांचल के कई जिलों में उन्होंने अपनी सेवाएं दी लेकिन शायरी से उनका जुड़ाव इतना था कि इन्होंने 2002 में सरकारी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया और सिर्फ उर्दू शायरी के लिए ही पूरा वक्त देने लगे। आखिरी वक्त में उनका कहना था कि शायरी उनके जिस्म की रुह है और ये उनके मरने के बाद भी जिंदा रहेगी। उन्होंने अपनी मशहूर गजल %रुक जाओ सुबह न हो, ये रात आखरी, शायद हो ये जिंदगी के लम्हात आखिरी, मरने के बाद कब्रा पर आना तुम जरुर, अंजुम यह कह रहा है कोई बात आखिरीऽ कहकर अपनी बात पूरी दुनिया के सामने रख दी।
नगर के अजमेरी मोहल्ला निवासी मुफ्ती मेंहदी हैदर उर्फ अंजुम जौनपुरी (67) ने देश विदेश में अपनी शायरी के दम पर अपनी पहचान स्थापित की। फिराक गोरखपुरी, अली सरदार जाफरी, वामिक जौनपुरी, कुमार बाराबंकी व कैफी आजमी जैसे शायरों के साथ उनको मंच पर शायरी करने का मौका मिला। 1981 में वे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के कराची में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मुशायरे में भी शामिल हुए थे। उन्होंने करबला के शहीदों पर सैकड़ों नौहे भी लिखे है। 1971 में अंजुम जौनपुरी परिवहन विभाग में टेक्निशियन के पद पर तैनात हुए थे और पूर्वांचल के कई जिलों में उन्होंने अपनी सेवाएं दी लेकिन शायरी से उनका जुड़ाव इतना था कि इन्होंने 2002 में सरकारी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया और सिर्फ उर्दू शायरी के लिए ही पूरा वक्त देने लगे। आखिरी वक्त में उनका कहना था कि शायरी उनके जिस्म की रुह है और ये उनके मरने के बाद भी जिंदा रहेगी। उन्होंने अपनी मशहूर गजल %रुक जाओ सुबह न हो, ये रात आखरी, शायद हो ये जिंदगी के लम्हात आखिरी, मरने के बाद कब्रा पर आना तुम जरुर, अंजुम यह कह रहा है कोई बात आखिरीऽ कहकर अपनी बात पूरी दुनिया के सामने रख दी।
विज्ञापन