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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम औरतों में जगी नई उम्मीद
Updated Wed, 23 Aug 2017 12:23 AM IST
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जौनपुर। तीन तलाक के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जहां कुछ मुस्लिम महिलाओं ने सराहना की है। उनका कहना है कि इससे मुस्लिम महिलाओं में उम्मीद जगी है। वहीं मौलवी अब्दुल्लाह फारूक ने तीन तलाक को मुसलमानों का मजहबी और निजी मामला बताते हुए कहा कि हुकूमत और संसद की जिम्मेदारी है कि वह ऐसा कानून बनाए जो इस मुल्क के लोकतांत्रिक उसूलों के मुताबिक हो।
मछलीशहर तहसील अधिवक्ता संघ की वरिष्ठ उपाध्यक्ष लाडली बेगम ने कहा कि तीन तलाक की वजह से मुस्लिम औरतों पर जुल्म होते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम औरतों में एक नई उम्मीद जगी है। तीन तलाक पर कानून बनने से मुस्लिम महिलाओं के लिए खुशहाली का मार्ग प्रशस्त होगा। तीन तलाक से पीड़ित खेतासराय क्षेत्र की सुम्बुलपुर निवासी गुलशन ने कहा कि निकाह में महिला की सहमति ली जाती है तो तलाक में भी ली जानी चाहिए। अदालत के फैसले पीड़ित तमाम महिलाओं के दिल को तसल्ली मिली है। खेतासराय के बिसवां निवासी सामाजिक कार्यकर्ता शहनाज बानो ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सम्मानीय है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पहले ही कानून में बदलाव का भरोसा दे चुका है। नगर के बारह दुअरिया निवासी समीना नसीम ने कहा कि तीन तलाक के मुद्दे पर केंद्र की भाजपा सरकार बेवजह दखलंदाजी कर रही है। नगर के मुफ्तीमोहल्ला निवासी शबा अंजुम ने कहा कि शरीयत में भी एक बार में तीन तलाक को नाजायज माना गया है। सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए ही इस तरह के मुद्दों में जनता को उलझाना चाहती है। खेतासराय मदरसा दर्स गाहे इस्लामी मारुफपुर के संचालक मौलवी अब्दुल्लाह फारूक ने तलाक को मुसलमानों का मजहबी और निजी मामला बताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब हुकूमत और संसद की जिम्मेदारी है की वह ऐसा कानून बनाए जो इस मुल्क के लोकतांत्रिक उसूलों के मुताबिक हो। इस मुद्दे पर मुस्लिम तंजीमों को बेहतर सुझाव संसद को देना चाहिए।
जामियां हुसैनियां लाल दरवाजा के उस्ताद मौलाना वसीम अहमद शेरवानी का कहना है कि धार्मिक आजादी का संविधान में भी उल्लेख है। धार्मिक कानून में हस्तक्षेप कर सरकार विकास में बाधक बन रही है। देश की मूल समस्याओं पर चर्चा ही नहीं हो रही। सामाजिक कार्यकर्ता मो. अयूब ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला प्रशंसनीय है। सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर हस्तक्षेप से इनकार करते हुए इस काम को जनप्रतिनिधियों के हाथों में सौंपा है। इसका अर्थ ये है कि जो समुदाय विशेष है उसके प्रतिनिधियों के साथ मशवरा करके ही आगे का रास्ता निकलना चाहिए।
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सामाजिक कार्यकर्ता आरिफ हबीब कहते हैं कि मुसलमानों में तलाक की दर बेहद कम है लेकिन यदि किसी एक व्यक्ति के अधिकारों का भी हनन होता है तो इस्लाम उसकी इजाजत नहीं देता है। इस्लाम जुल्म, नाइंसाफ़ी और शोषण के खिलाफ हैे। वहीं भाजपा के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य पंकज जायसवाल का कहना है कि कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं को राहत मिली है।
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मछलीशहर तहसील अधिवक्ता संघ की वरिष्ठ उपाध्यक्ष लाडली बेगम ने कहा कि तीन तलाक की वजह से मुस्लिम औरतों पर जुल्म होते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम औरतों में एक नई उम्मीद जगी है। तीन तलाक पर कानून बनने से मुस्लिम महिलाओं के लिए खुशहाली का मार्ग प्रशस्त होगा। तीन तलाक से पीड़ित खेतासराय क्षेत्र की सुम्बुलपुर निवासी गुलशन ने कहा कि निकाह में महिला की सहमति ली जाती है तो तलाक में भी ली जानी चाहिए। अदालत के फैसले पीड़ित तमाम महिलाओं के दिल को तसल्ली मिली है। खेतासराय के बिसवां निवासी सामाजिक कार्यकर्ता शहनाज बानो ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सम्मानीय है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पहले ही कानून में बदलाव का भरोसा दे चुका है। नगर के बारह दुअरिया निवासी समीना नसीम ने कहा कि तीन तलाक के मुद्दे पर केंद्र की भाजपा सरकार बेवजह दखलंदाजी कर रही है। नगर के मुफ्तीमोहल्ला निवासी शबा अंजुम ने कहा कि शरीयत में भी एक बार में तीन तलाक को नाजायज माना गया है। सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए ही इस तरह के मुद्दों में जनता को उलझाना चाहती है। खेतासराय मदरसा दर्स गाहे इस्लामी मारुफपुर के संचालक मौलवी अब्दुल्लाह फारूक ने तलाक को मुसलमानों का मजहबी और निजी मामला बताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब हुकूमत और संसद की जिम्मेदारी है की वह ऐसा कानून बनाए जो इस मुल्क के लोकतांत्रिक उसूलों के मुताबिक हो। इस मुद्दे पर मुस्लिम तंजीमों को बेहतर सुझाव संसद को देना चाहिए।
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जामियां हुसैनियां लाल दरवाजा के उस्ताद मौलाना वसीम अहमद शेरवानी का कहना है कि धार्मिक आजादी का संविधान में भी उल्लेख है। धार्मिक कानून में हस्तक्षेप कर सरकार विकास में बाधक बन रही है। देश की मूल समस्याओं पर चर्चा ही नहीं हो रही। सामाजिक कार्यकर्ता मो. अयूब ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला प्रशंसनीय है। सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर हस्तक्षेप से इनकार करते हुए इस काम को जनप्रतिनिधियों के हाथों में सौंपा है। इसका अर्थ ये है कि जो समुदाय विशेष है उसके प्रतिनिधियों के साथ मशवरा करके ही आगे का रास्ता निकलना चाहिए।
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सामाजिक कार्यकर्ता आरिफ हबीब कहते हैं कि मुसलमानों में तलाक की दर बेहद कम है लेकिन यदि किसी एक व्यक्ति के अधिकारों का भी हनन होता है तो इस्लाम उसकी इजाजत नहीं देता है। इस्लाम जुल्म, नाइंसाफ़ी और शोषण के खिलाफ हैे। वहीं भाजपा के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य पंकज जायसवाल का कहना है कि कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं को राहत मिली है।