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तालाबों पर दबंगों का कब्जा
ब्यूरो/अमर उजाला, उरई
Updated Fri, 15 Apr 2016 01:57 AM IST
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माधौगढ़ क्षेत्र में तालाब पर अतिक्र्रमण।
- फोटो : अमर उजाला
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एक समय था, जब गांव की संपन्नता उस गांव के तालाब बयां करते थे, लेकिन अब गांवों के तालाब अपना वजूद खोते जा रहे हैं। तालाबाें पर दबंगों का कब्जा है। वोट की राजनीति के तहत गांव के प्रधान भी उनका विरोध नहीं करते हैं। इससे लगातार जलस्तर नीचे खिसक रहा है। वाटर रिर्चाजिंग के प्रमुख श्रोत पर ही संकट है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश बेअसर साबित हो रहा है।
जानकाराें की मानें तो जलस्तर गिरने का बड़ा कारण तालाबों पर कब्जा व उनका सूखा होना है। इससे जलस्तर लगातार गिरता जा रहा है। किसान नेताआें ने मांग की कि तालाबाें से कब्जा हटवाकर गांव के प्रधान के सहयोग से वहां पर सौर ऊर्जा का नलकूप लगवाना चाहिए। इससे जलस्तर बढ़ेगा और जानवराें को पाने का पानी भी मिलेगा। बहरहाल अप्रैल माह में जिले के हालात भयावह हैं और आने वाले समय में पानी का भीषण संकट होने की संभावना बन रही है।
जिले में 572 ग्राम सभाएं हैं, एक दो गांवाें को अपवाद के तौर पर छोड़ दें तो अधिकांश गांवों में तालाबों का वजूद संकट में है। मनरेगा के तहत तालाबाें की रखरखाव की योजना फ्लाप साबित हो रही है। तालाबों में अप्रैल में धूल उड़ रही है। वहीं अधिकांश गांवों के तालाबाें पर दबंगाें ने अपने मकान बनवा लिए हैं। यही नहीं गांवाें में पानी की व्यवस्था न होने से तालाब सूख रहे हैं। इससे लगातार जिले में जलस्तर नीचे जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश बेअसर दिख रहा है।
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कोर्ट ने तालाबाें पोखराें आदि परंपरागत जल स्रोताें से कब्जा हटाने के निर्देश डीएम को दिए थे, लेकिन वह अभियान भी सिर्फ कागजाें में सिमटकर रह गया है। जिले के गांव करसान बजीदा, बोहदपुरा, कुकर गांव से लेकर बीहड के गांवाें में तालाबाें का वजूद संकट में है। जितना रकबा तालाबों का दर्ज है, मौके पर आधा ही तालाब बचा हुआ है। इससे पहले तालाब गांव की संपन्नता का सूचक होता था। तालाब के अलावा छोटी- छोटी तलाइयां भी गांव में होती थी, जो कच्चे मकान निर्माण के दौरान अपने आप बन जाती थी। यह भी वाटर रिचार्जिंग के लिए बेहतर साबित होती थी।
लगाए जाए सौर ऊर्जा के नलकूप- किसान नेता बलराम लंबरदार ने बताया कि तालाब पोखराें का संरक्षण बहुत आवश्यक है लोग प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं और इसका नतीजा है कि बुंदेलखंड आज सूखे की त्रासदी को झेल रहा है। जलस्तर 10 से 15 फीट नीचे खिसक चुका है। जलस्तर को स्थिर रखने के लिए सरकार को चाहिए कि तालाबाें से कब्जा हटाकर वहां सौर ऊर्जा से चालित नलकूप लगाया जाए और उससे तालाब लगातार भरे जाएं तो वाटर लेबिल ठीक होगा ही और वहां जानवराें को पानी की समस्या से भी निजात मिलेगी।
गांव में बैठक कर बनाएंगे योजना- उरई। ग्रामीणाें को इस संकट की घड़ी में एकजुट होकर काम करना होगा, तभी सूखे की समस्या से निजात मिलेगी। गांव बोहदपरा के किसान प्रहलाद सिंह, भगवती शरण, संतोष चौहान आदि ने बताया कि ग्रामीणाें को इसके लिए अपने नलकूप से तालाब भरने हाेंगे और जल संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक करना पडे़गा। वहीं जिला प्रशासन को इसके लिए जागरूकता अभियान चलाकर सूखे के संकट से निपटना पड़ेगा।
सबमर्सिबल का कम करें इस्तेमाल- उरई। आजकल गांवों से लेकर शहराें तक में लोग अपने हैंडपंपाें में सबमर्सिबल डाल रखे हैं। जरा से पानी के लिए वह उसको चलाते हैं। इससे कई गैलन पानी बर्बाद हो जाता है। ऐसे में लोगों को चाहिए कि वह एक साथ एक समय में पूरा पानी भर लें। बार बार सबमर्सिबल न चलाएं। इससे पानी की बर्बादी रुकेगी।
क्या कहते हे जिम्मेदार- तालाबाें के संरक्षण की बाबत एसडीएम संजय कुमार का कहना है कि उन्हाेंने क्षेत्र के गांव में लेखपाल से रिपोर्ट मांगी है। पहले अतिक्रमण हटवाया गया था। अगर दोबारा कब्जा कर लिया है तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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जानकाराें की मानें तो जलस्तर गिरने का बड़ा कारण तालाबों पर कब्जा व उनका सूखा होना है। इससे जलस्तर लगातार गिरता जा रहा है। किसान नेताआें ने मांग की कि तालाबाें से कब्जा हटवाकर गांव के प्रधान के सहयोग से वहां पर सौर ऊर्जा का नलकूप लगवाना चाहिए। इससे जलस्तर बढ़ेगा और जानवराें को पाने का पानी भी मिलेगा। बहरहाल अप्रैल माह में जिले के हालात भयावह हैं और आने वाले समय में पानी का भीषण संकट होने की संभावना बन रही है।
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जिले में 572 ग्राम सभाएं हैं, एक दो गांवाें को अपवाद के तौर पर छोड़ दें तो अधिकांश गांवों में तालाबों का वजूद संकट में है। मनरेगा के तहत तालाबाें की रखरखाव की योजना फ्लाप साबित हो रही है। तालाबों में अप्रैल में धूल उड़ रही है। वहीं अधिकांश गांवों के तालाबाें पर दबंगाें ने अपने मकान बनवा लिए हैं। यही नहीं गांवाें में पानी की व्यवस्था न होने से तालाब सूख रहे हैं। इससे लगातार जिले में जलस्तर नीचे जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश बेअसर दिख रहा है।
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कोर्ट ने तालाबाें पोखराें आदि परंपरागत जल स्रोताें से कब्जा हटाने के निर्देश डीएम को दिए थे, लेकिन वह अभियान भी सिर्फ कागजाें में सिमटकर रह गया है। जिले के गांव करसान बजीदा, बोहदपुरा, कुकर गांव से लेकर बीहड के गांवाें में तालाबाें का वजूद संकट में है। जितना रकबा तालाबों का दर्ज है, मौके पर आधा ही तालाब बचा हुआ है। इससे पहले तालाब गांव की संपन्नता का सूचक होता था। तालाब के अलावा छोटी- छोटी तलाइयां भी गांव में होती थी, जो कच्चे मकान निर्माण के दौरान अपने आप बन जाती थी। यह भी वाटर रिचार्जिंग के लिए बेहतर साबित होती थी।
लगाए जाए सौर ऊर्जा के नलकूप- किसान नेता बलराम लंबरदार ने बताया कि तालाब पोखराें का संरक्षण बहुत आवश्यक है लोग प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं और इसका नतीजा है कि बुंदेलखंड आज सूखे की त्रासदी को झेल रहा है। जलस्तर 10 से 15 फीट नीचे खिसक चुका है। जलस्तर को स्थिर रखने के लिए सरकार को चाहिए कि तालाबाें से कब्जा हटाकर वहां सौर ऊर्जा से चालित नलकूप लगाया जाए और उससे तालाब लगातार भरे जाएं तो वाटर लेबिल ठीक होगा ही और वहां जानवराें को पानी की समस्या से भी निजात मिलेगी।
गांव में बैठक कर बनाएंगे योजना- उरई। ग्रामीणाें को इस संकट की घड़ी में एकजुट होकर काम करना होगा, तभी सूखे की समस्या से निजात मिलेगी। गांव बोहदपरा के किसान प्रहलाद सिंह, भगवती शरण, संतोष चौहान आदि ने बताया कि ग्रामीणाें को इसके लिए अपने नलकूप से तालाब भरने हाेंगे और जल संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक करना पडे़गा। वहीं जिला प्रशासन को इसके लिए जागरूकता अभियान चलाकर सूखे के संकट से निपटना पड़ेगा।
सबमर्सिबल का कम करें इस्तेमाल- उरई। आजकल गांवों से लेकर शहराें तक में लोग अपने हैंडपंपाें में सबमर्सिबल डाल रखे हैं। जरा से पानी के लिए वह उसको चलाते हैं। इससे कई गैलन पानी बर्बाद हो जाता है। ऐसे में लोगों को चाहिए कि वह एक साथ एक समय में पूरा पानी भर लें। बार बार सबमर्सिबल न चलाएं। इससे पानी की बर्बादी रुकेगी।
क्या कहते हे जिम्मेदार- तालाबाें के संरक्षण की बाबत एसडीएम संजय कुमार का कहना है कि उन्हाेंने क्षेत्र के गांव में लेखपाल से रिपोर्ट मांगी है। पहले अतिक्रमण हटवाया गया था। अगर दोबारा कब्जा कर लिया है तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।