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होलिका दहन का विशेष योग 62 वर्ष बाद
अमर उजाला ब्यूरो, उरई
Updated Sun, 20 Mar 2016 11:11 PM IST
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- फोटो : demo
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इस वर्ष संवत् 2072 में फाल्गुन सुदी पूर्णिमा बुधवार दिनांक 23 मार्च 2016 को 27 घटी 42 पल यानि सायंकाल 5 बजकर 30 मिनट तक रहेगी और अग्रिम वृद्धि गामिनी तिथि प्रतिपदा का प्रवेश हो जाएगा। ऐसी स्थिति में होलिका दहन के मुहूर्त में असमंजस की स्थिति हो जाती है। यही स्थिति ज्योतिष आचार्यों के सामने सन् 1954 में यानि 62 वर्ष पूर्व भी
उत्पन्न हुई थी। आचार्य गौरव के अनुसार तब धर्मसिंधु, निर्णय सिंधु आदि शास्त्रों के मतानुसार यह स्पष्ट हुआ था कि प्रदोष ग्राह्य पूर्णिमा प्रतिपदा वृद्धिगामिनी हो तो प्रदोष बेला में होलिका दहन करना चाहिए। इस परिस्थिति में शवित्योत्तर पुराण में महर्षि वेदव्यास जी ने लिखा है। सार्धयाम त्रयं पा स्यात् द्वितीये दिवसे यदा। प्रतिपद् वर्धमाना तु तदा सा होलिका
स्मृता।। इस मत से यदि साढ़े तीन याम यानि पूर्णिमा 10:30 साढ़े दस घंटे का योग भोगने के उपरांत अग्रिम प्रतिपदा युक्त हो तो होलिका दहन सायाह्माल व्यापिनी पूर्णिमा के दिन ही प्रदोष वेला में करना चाहिए। सूर्यास्त के उपरांत 6 घटी तक प्रदोष वेला मानी जाती है। ऐसा अनेक पूर्वाचार्यों ने एवम धर्मसिंधु आदि ग्रंथकारों ने स्वीकार किया है। यानि सूर्यास्त के
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उपरांत 2 घंटा 24 मिनट तक होलिका का दहन अत्यंत शुभ माना जाएगा। 23 तारीख बुधवार को शुद्ध समयानुसार रात के 8 बजकर 40 मिनट तक का समय होलिका दहन के लिए ग्राह्य यानि स्वीकार किया गया है। जिसमें सवार्ध सिद्धि योग का भी सायंकाल 7 बजकर 09 मिनट से विशेष संयोग प्राप्त हो रहा है।
पूजन विधि- आचार्य गौरव जी महाराज बताते हैं कि होलिका का पूजन गंध अक्षत व धूप दीप नैवेद्य व सप्तधस्य अर्पित करते हुए करना चाहिए। मार्तण्ड पुराण के अनुसार चार रात्रियों में
उपासना सिद्धि का विशेष महत्व बताया गया है। इसमें दाऊण रात्रि-यानि होलिका दहन की रात्रि में विशेष पूजन अथवा मंत्र जाप करके मनुष्य अतिदुर्लभ पदार्थों को भी सहजता से सीमित समय में प्राप्त कर लेता है। इस दिन भगवान नारायण की उपासना विशेष फलदायी मानी गयी है।
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उत्पन्न हुई थी। आचार्य गौरव के अनुसार तब धर्मसिंधु, निर्णय सिंधु आदि शास्त्रों के मतानुसार यह स्पष्ट हुआ था कि प्रदोष ग्राह्य पूर्णिमा प्रतिपदा वृद्धिगामिनी हो तो प्रदोष बेला में होलिका दहन करना चाहिए। इस परिस्थिति में शवित्योत्तर पुराण में महर्षि वेदव्यास जी ने लिखा है। सार्धयाम त्रयं पा स्यात् द्वितीये दिवसे यदा। प्रतिपद् वर्धमाना तु तदा सा होलिका
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स्मृता।। इस मत से यदि साढ़े तीन याम यानि पूर्णिमा 10:30 साढ़े दस घंटे का योग भोगने के उपरांत अग्रिम प्रतिपदा युक्त हो तो होलिका दहन सायाह्माल व्यापिनी पूर्णिमा के दिन ही प्रदोष वेला में करना चाहिए। सूर्यास्त के उपरांत 6 घटी तक प्रदोष वेला मानी जाती है। ऐसा अनेक पूर्वाचार्यों ने एवम धर्मसिंधु आदि ग्रंथकारों ने स्वीकार किया है। यानि सूर्यास्त के
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उपरांत 2 घंटा 24 मिनट तक होलिका का दहन अत्यंत शुभ माना जाएगा। 23 तारीख बुधवार को शुद्ध समयानुसार रात के 8 बजकर 40 मिनट तक का समय होलिका दहन के लिए ग्राह्य यानि स्वीकार किया गया है। जिसमें सवार्ध सिद्धि योग का भी सायंकाल 7 बजकर 09 मिनट से विशेष संयोग प्राप्त हो रहा है।
पूजन विधि- आचार्य गौरव जी महाराज बताते हैं कि होलिका का पूजन गंध अक्षत व धूप दीप नैवेद्य व सप्तधस्य अर्पित करते हुए करना चाहिए। मार्तण्ड पुराण के अनुसार चार रात्रियों में
उपासना सिद्धि का विशेष महत्व बताया गया है। इसमें दाऊण रात्रि-यानि होलिका दहन की रात्रि में विशेष पूजन अथवा मंत्र जाप करके मनुष्य अतिदुर्लभ पदार्थों को भी सहजता से सीमित समय में प्राप्त कर लेता है। इस दिन भगवान नारायण की उपासना विशेष फलदायी मानी गयी है।