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Jalaun News: मार्च में 34 डिग्री पारा, पीली पड़ने लगी गेहूं की फसल

Tue, 03 Mar 2026 01:26 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 03 Mar 2026 01:26 AM IST
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34 degrees Celsius in March, wheat crop turns yellow
फोटो - 01 खेती में खड़ी गेहूं की फसल। संवाद
उरई। मार्च की शुरुआत में तापमान 34 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने से गेहूं की फसल प्रभावित हो रही है। खेतों में खड़ी फसल की पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं और मिट्टी जल्दी सूख रही है। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।
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सामान्यतः तीन सिंचाई में तैयार होने वाली फसल को अब चार से पांच बार पानी देना पड़ रहा है। तेज धूप और गर्म हवाओं के कारण खेतों में नमी नहीं टिक पा रही है। सिंचाई के दो दिन बाद ही खेतों में दरारें पड़ने लगती हैं। कई क्षेत्रों में नहरों में पानी न आने से स्थिति और गंभीर हो गई है। किसानों को मजबूरी में निजी नलकूपों से सिंचाई करनी पड़ रही है। इसमें प्रति बीघा 400 से 500 रुपये का अतिरिक्त खर्च आ रहा है।
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ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों ने बताया कि समय पर नहरों में पानी न मिलने से उन्हें डीजल या बिजली से चलने वाले नलकूपों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे लागत बढ़ने के साथ-साथ बिजली आपूर्ति की अनियमितता भी परेशानी का कारण बन रही है। किसानों को आशंका है कि यदि तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो दाने भरने की अवस्था में फसल पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और पैदावार घट सकती है।
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बलकट पर खेती करने वाले किसानों की बढ़ी मुसीबत
जिले में लगातार बढ़ रहे मौसम से किसान परेशान हैं। बलकट पर खेती करने वाले किसानों का कहना है कि उन्होंने दस हजार रुपये बीघा के हिसाब से खेत लिया था। जुताई व बोआई मिलाकर करीब 15 हजार रुपये बीघा तक खर्च हो चुके हैं, लेकिन अब तापमान बढ़ने से प्रति बीघा दो से तीन हजार का खर्च और बढ़ रहा है। अगर ऐसा ही तापमान रहा तो उत्पादन पर भी खतरा रहेगा।

कृषि वैज्ञानिक की सलाह






कृषि वैज्ञानिक विस्टर जोशी का कहना है कि गेहूं की फसल के लिए दाना भरने के समय 20 से 25 डिग्री तापमान अनुकूल माना जाता है। 30 डिग्री से ऊपर तापमान पहुंचने पर दाने का विकास प्रभावित हो सकता है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि खेतों में हल्की लेकिन समय पर सिंचाई करें, जलभराव न होने दें।

नमी बनाए रखने के लिए खेत की मेड़ों की मरम्मत करें।

जिन किसानों के पास सुविधा हो, वे स्प्रिंकलर या ड्रिप जैसी सूक्ष्म सिंचाई पद्धति अपनाएं।

फसल में पोटाश युक्त उर्वरक का संतुलित प्रयोग करें, जिससे गर्मी सहन करने की क्षमता बढ़े।

दोपहर की बजाय शाम या सुबह के समय सिंचाई करें, ताकि पानी का वाष्पीकरण कम हो।
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