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हिंदी के पुजारी थे शब्द शिल्पी आशु कवि बाबा निर्भय हाथरसी

Sat, 29 Aug 2020 10:57 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 29 Aug 2020 10:57 PM IST
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poet baba nirbhay hathrasi is great lover of Hindi
विद्या सागर विकल। - फोटो : HATHRAS
बृज की देहरी कहे जाने वाले हाथरस नगर की मिट्टी साहित्य, संगीत और कला के क्षेत्र में काफी उर्वरा रही है। इस नगरी की अनेक प्रतिभाओं ने इन सभी क्षेत्रों में अपना नाम रोशन किया है। प्रख्यात कवि निर्भय हाथरसी भी उनमें से प्रमुख थे। नगर के दिल्ली वाला चौक इलाके के रहने वाले निर्भय हाथरसी का जन्म तो अपनी ननिहाल मथुरा के एदलपुर गांव में वर्ष 1926 की देवोत्थान एकादशी के दिन हुआ था,लेकिन इसके बाद हाथरस ही उनकी कर्मभूमि रही। काव्य मंचों के वटवृक्ष रहे निर्भय जी ने अपनी लोकप्रिय कविताओं के माध्यम से मातृभाषा हिंदी की सेवा की। निर्भय हाथरसी ने हिंदी कविताओं के मंचों पर ऐसी धूम मचाई कि लोग उन्हें शब्दशिल्पी, रससिद्ध, आशुकवि बाबा निर्भयानंद के नाम से जानते, पुकारते थे।
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हिंदी के प्रख्यात कवि निर्भय हाथरसी का मूल नाम देवीदास तैनगुरिया था। उनके बारे में जानने वाले लोग बताते हैं कि शब्द ब्रह्म के उपासक निर्भय जी को साहित्य साधना विरासत में मिली और उन्होंने सात वर्ष तक एकांत कक्ष में गायत्री साधना से वाकसिद्धि हासिल की थी। ऊंचा ललाट ,चमकती बड़ी आंखें, धवल दाढ़ी और गेरुआ कुर्ता व लुंगी वेशभूषाधारी कवि निर्भय हाथरसी कविता के मंचों पर हाजिर जवाबी और आशु कविता के क्षेत्र में विरले ही कवि थे। यही कारण था कि उन्हें श्रोताओं की मांग पर काव्य मंचों पर एक बार में तीन से पांच घंटे लगातार कविताएं सुनाने की महारथ हासिल थी। वे जिस काव्य मंच पर होते थे, वह कवि सम्मेलन सुबह तक चलता था। उनकी कविताओं का क्षेत्र बहुआयामी था। कविताओं के वे सिद्धहस्त रचनाकार थे।
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उन्होंने सदैव प्रयोगवाद का सहारा लिया। शब्दों से खिलवाड़ करने की सामर्थ्य तथा इस गुण ने उन्हें शब्दशिल्पी बना दिया और वे सृजन के गुण के कारण हिंदी आशु कविता के वटवृक्ष के रूप में काव्य मंचों पर सुशोभित रहे। वेशभूषा तथा धर्म सहिष्णुता ने उन्हें बाबा निर्भयानंद बना दिया। बाबा निर्भय हाथरसी कवि ही नहीं, कुशल लेखक तथा पत्रकार भी थे। बाबा ने पत्रकारिता के माध्यम से भी हिंदी के प्रचार प्रसार का अलख जगाया। उन्होंने जुगनूं नाम से समाचार पत्र भी निकाला था। बाबा अस्सी के दशक में मथुरा के गोवर्धन तीर्थधाम की मानसी गंगा की सफाई के अभियान से जुड़े।
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हिंदी कवि बाबा निर्भय हाथरसी ने अनेक रसों में छंद, व्यंग, खंडकाव्य, समसामयिक रचनाएं और उर्दू की गजलें भी लिखीं। उनकी कविताओं की 250 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाबा का देहावसान 28 जुलाई 1999 को गुरुपूर्णिमा के दिन हुआ। देश ही नहीं, विदेशों तक हिंदी हास्य व्यंग काव्य का परचम फहराने वाले श्रेष्ठ व्यंगकार व हास्य सम्राट पद्मश्री काका हाथरसी को लोग प्रसिद्ध कवि और उनके समकालीन कवि निर्भय हाथरसी को सिद्ध कवि कहते थे। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हिंदी कविताओं के महारथी तथा हिंदी काव्यमंच के वटवृक्ष कवि निर्भय हाथरसी ने अपनी कविताओं के माध्यम से हिंदी की उल्लेखनीय सेवा की।
प्रस्तुति : विद्यासागर विकल साहित्यकार, हाथरस।

बाबा निर्भय हाथरसी।

बाबा निर्भय हाथरसी।- फोटो : HATHRAS

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