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सरकार नहीं कर पाई गेहूं भंडारण की व्यवस्था
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संवाद न्यूज एजेंसी, सादाबाद।
किसानों को उनकी आय दोगुनी करने का सपना दिखाने वाली प्रदेश और देश की भाजपा सरकार किसानों का अत्यधिक शोषण करने में लगी है। सरकार आज तक गेहूं के भंडारण की व्यवस्था नहीं कर पाई है। देश में हर साल 50 हजार करोड़ रुपये का गेहूं सड़ता है, जिससे आठ करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता है। गेहूं क्रय केंद्र और सहकारी समितियों पर किसानों के गेहूं की बजाय व्यापारियों का गेहूं खरीदा जा रहा है। खरीद केंद्रों पर जो स्थिति है, वह किसानों के शोषण की पराकाष्ठा है।
यह आरोप सोमवार को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजीलाल सुमन ने लोक निर्माण विभाग के गेस्ट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में लगाए। उन्होंने कहा कि किसान कई-कई दिनों से गेहूं बेचने के लिए क्रय केंद्रों पर भाड़े की ट्रैक्टर ट्रॉलियों को लेकर खड़े हुए हैं, लेकिन उनका गेहूं हफ्ता बीत जाने के बाद भी नहीं खरीदा जा रहा।
उन्होंने गेहूं की खरीद न किए जाने पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि क्षेत्रीय सहकारी समितियों के परिसर में ट्रैक्टर-ट्रॉलियाें में लदे गेहूं को जब हफ्तों तक नहीं खरीदा जाता तो इससे सहज ही किसानों की समस्याओं का अनुमान लगाया जा सकता है।
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उन्होंने अधिकांश किसानों के पास अपनी ट्रैक्टर और ट्रॉली नहीं होती और वह भाड़े पर ट्रैक्टर ट्रॉली को लेकर आते हैं, तत्काल गेहूं की खरीद न होने के कारण किसानों पर भाड़े का बोझ बढ़ता रहता है, कभी वारदाना न होने के कारण भी किसान के गेहूं की खरीद नहीं हो पाती। गेहूं खरीदने में क्षेत्रीय समितियां मनमानी करती हैं। टोकन की कोई व्यवस्था नहीं होती।
गेहूं न खरीदने का एक कारण ये भी होता है कि क्षेत्रीय समितियों के पास गोदामों में जगह ही नहीं होती। किसानों को तो अपना गेहूं बेचने में दिक्कत होती है, लेकिन व्यापारियों को नहीं। उन्होंने कहा कि गेहूं का समर्थन मूल्य 1975 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन इन परेशानियों के चलते किसानों को अपना गेहूं 1700 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बाजार में बेचना पड़ रहा है।
समिति पर उन्हीं किसानों का गेहूं खरीदा जाता है, जिन्होंने अपना ऑनलाइन पंजीकरण करा लिया है। राज्य सरकार ने यह फरमान जारी कर दिया कि 30 क्विंटल से ज्यादा किसी भी किसान का गेहूं सहकारी समितियों पर नहीं खरीदा जाएगा, लेकिन किसान ने अपने खून पसीने की कमाई से भारी मात्रा में गेहूं का उत्पादन किया।
अफसोस कि सरकार आज तक गेहूं भंडारण की व्यवस्था नहीं कर पाई है। हमारे देश में हर साल 50 हजार करोड़ रूपये का गेहूं सड़ता है, जिससे आठ करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता है। यह अन्नदाता के साथ उसके श्रम का क्रूर मजाक है। राज्य सरकार जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।
उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि जिसने भी किसानों के साथ अन्याय किया है, उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ा है। किसानों के शोषण का यह क्रम जारी रहा तो 2022 में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की स्थिति क्या होगी, इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। इस दौरान सपा महासचिव जैनुद्दीन चौधरी भी मौजूद रहे।
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किसानों को उनकी आय दोगुनी करने का सपना दिखाने वाली प्रदेश और देश की भाजपा सरकार किसानों का अत्यधिक शोषण करने में लगी है। सरकार आज तक गेहूं के भंडारण की व्यवस्था नहीं कर पाई है। देश में हर साल 50 हजार करोड़ रुपये का गेहूं सड़ता है, जिससे आठ करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता है। गेहूं क्रय केंद्र और सहकारी समितियों पर किसानों के गेहूं की बजाय व्यापारियों का गेहूं खरीदा जा रहा है। खरीद केंद्रों पर जो स्थिति है, वह किसानों के शोषण की पराकाष्ठा है।
यह आरोप सोमवार को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजीलाल सुमन ने लोक निर्माण विभाग के गेस्ट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में लगाए। उन्होंने कहा कि किसान कई-कई दिनों से गेहूं बेचने के लिए क्रय केंद्रों पर भाड़े की ट्रैक्टर ट्रॉलियों को लेकर खड़े हुए हैं, लेकिन उनका गेहूं हफ्ता बीत जाने के बाद भी नहीं खरीदा जा रहा।
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उन्होंने गेहूं की खरीद न किए जाने पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि क्षेत्रीय सहकारी समितियों के परिसर में ट्रैक्टर-ट्रॉलियाें में लदे गेहूं को जब हफ्तों तक नहीं खरीदा जाता तो इससे सहज ही किसानों की समस्याओं का अनुमान लगाया जा सकता है।
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उन्होंने अधिकांश किसानों के पास अपनी ट्रैक्टर और ट्रॉली नहीं होती और वह भाड़े पर ट्रैक्टर ट्रॉली को लेकर आते हैं, तत्काल गेहूं की खरीद न होने के कारण किसानों पर भाड़े का बोझ बढ़ता रहता है, कभी वारदाना न होने के कारण भी किसान के गेहूं की खरीद नहीं हो पाती। गेहूं खरीदने में क्षेत्रीय समितियां मनमानी करती हैं। टोकन की कोई व्यवस्था नहीं होती।
गेहूं न खरीदने का एक कारण ये भी होता है कि क्षेत्रीय समितियों के पास गोदामों में जगह ही नहीं होती। किसानों को तो अपना गेहूं बेचने में दिक्कत होती है, लेकिन व्यापारियों को नहीं। उन्होंने कहा कि गेहूं का समर्थन मूल्य 1975 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन इन परेशानियों के चलते किसानों को अपना गेहूं 1700 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बाजार में बेचना पड़ रहा है।
समिति पर उन्हीं किसानों का गेहूं खरीदा जाता है, जिन्होंने अपना ऑनलाइन पंजीकरण करा लिया है। राज्य सरकार ने यह फरमान जारी कर दिया कि 30 क्विंटल से ज्यादा किसी भी किसान का गेहूं सहकारी समितियों पर नहीं खरीदा जाएगा, लेकिन किसान ने अपने खून पसीने की कमाई से भारी मात्रा में गेहूं का उत्पादन किया।
अफसोस कि सरकार आज तक गेहूं भंडारण की व्यवस्था नहीं कर पाई है। हमारे देश में हर साल 50 हजार करोड़ रूपये का गेहूं सड़ता है, जिससे आठ करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता है। यह अन्नदाता के साथ उसके श्रम का क्रूर मजाक है। राज्य सरकार जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।
उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि जिसने भी किसानों के साथ अन्याय किया है, उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ा है। किसानों के शोषण का यह क्रम जारी रहा तो 2022 में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की स्थिति क्या होगी, इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। इस दौरान सपा महासचिव जैनुद्दीन चौधरी भी मौजूद रहे।