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ब्रह्मचारिणी और चंद्रघंटा के गूंजे जयकारे
अमर उजाला ब्यूरो/हरदोई
Updated Sun, 10 Apr 2016 12:12 AM IST
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मंदिर में पूजा करते भक्त।
- फोटो : अमर उजाला
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हरदोई। नवरात्र के दूसरे दिन भी शनिवार को मंदिरों में माता के जयकारे गूंजते रहे। मां ब्रह्मचारिणी और चंद्रघंटा का पूजन किया गया। घरों में भी पूजन और पाठ का सिलसिला जारी रहा। शहर के श्रवण देवी मंदिर, तुरंतनाथ मंदिर, बाबा सिद्धनाथ मंदिर, दुर्गा देवी मंदिर, फूलमती मंदिर, मौनी बाबा मंदिर आदि में मां के पूजन को लेकर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
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मां ब्रह्मचारिणी देवी के बारे में शास्त्री उमाकांत अवस्थी ने बताया कि देवी का यह स्वरूप पूर्व ज्योर्तिमय एवं अत्यंत सुंदर है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है। इनकी उपासना से श्रद्धालुओं के अंदर सहनशीलता, तप, त्याग, सदाचार एवं संयम की वृद्धि होती है। इसके अलावा माता के शिख पर चंद्र व हस्त में घंटा है। देवासुर संग्राम में देवी ने घंटे की नाद से अनेकानेक असुरों का दमन किया। शास्त्रों में सुर और संगीत दोनों की ही मुद्रा शांत और आत्मविभोर करने वाली यह देवी मानी गई है। दोनों देवियों का पूजन किया गया है।
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संतरा और खीरा अधिक लें
बाला जी हास्पिटल के डा. सीपी कटियार का कहना है कि बदलते मौसम में आस्था के साथ अपने स्वास्थ्य का भी ख्याल रखे वरना कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन आदि की कमी से बीमार हो सकते हैं। पेय पदार्थ और फल अधिक मात्रा में लेते रहें। फलों में संतरा और खीरा अधिक मात्रा में ले सकते हैं। व्रत रह रहीं गर्भवती महिलाएं नमक और चीनी आदि का सेवन न छोड़ें। वह सेंधा नमक का प्रयोग करती रहें। डायबिटीज मरीज आलू और केले का प्रयोग करने से बचें।
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दुर्गा सप्तशती के नियमित पाठ में हैं अद्भुत शक्तियां
शास्त्री उमाकांत अवस्थी का कहना है कि नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ किया जाए तो माता न सिर्फ प्रसन्न ही होती हैं बल्कि श्रद्धालु को अद्भुत शक्तियां भी प्रदान करती हैं। कहा कि सर्वप्रथम साधक को स्नान कर शुद्ध हो जाना चाहिए। आसन शुद्धि की प्रक्रिया को पूरा करने के बाद आसन पर बैठ जाएं। माथे पर अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन व रोली लगा लेें। शिखा बांध ले फिर पूर्वाभिमुख होकर चार बार आचमन करें, फिर मंत्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत व जल लेकर देवी को अर्पित करें। देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार विधि से पुस्तक की पूजा करें। फिर मूल नवाणि मंत्र से पीठ आदि में आधार शक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद विधि विधान से सप्तशती पुस्तक का पाठ करें।