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हरदोई जिपं अध्यक्ष चुनाव: दो दशक बाद नरेश के कुनबे से बाहर आई ‘कुर्सी’
Sat, 03 Jul 2021 10:45 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरदोई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरदोई
Published by: शिखा पांडेय
Updated Sat, 03 Jul 2021 10:45 PM IST
सार
अब दो दशक बाद यह कुर्सी नरेश अग्रवाल परिवार के कुनबे से बाहर निकली है, लेकिन जिस तरह नामांकन से लेकर मतदान और फिर मतगणना में मुकेश अग्रवाल सक्रिय रहे, उससे कहीं न कहीं उन चर्चाओं को बल मिलता है, जिसमें उनका दखल और प्रभाव जिला पंचायत में बरकरार रहने की बात कही जा रही है।
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नरेश अग्रवाल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हरदोई में दो दशक बाद जिला पंचायत अध्यक्ष का पद जिले के कद्दावर नेता नरेश अग्रवाल के कुनबे से बाहर हो गया। यह बात और है कि जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में जिस तरह नरेश अग्रवाल और उनके छोटे भाई जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष मुकेश अग्रवाल ने भूमिका निभाई है, उससे कहीं न कहीं यह संदेश है कि अग्रवाल परिवार का दखल जिला पंचायत में बना रहेगा।
नरेश अग्रवाल के छोटे भाई मुकेश अग्रवाल वर्ष 2000 में लोकतांत्रिक कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। वर्ष 2005 में वह सपा प्रत्याशी के रूप में जिला पंचायत के अध्यक्ष चुने गए। वर्ष 2010 में जब सूबे में बसपा की सरकार थी तो जिला पंचायत अध्यक्ष का पद महिला के लिए आरक्षित हो गया था।
इस पर मुकेश अग्रवाल की पत्नी कामिनी अग्रवाल जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित हुईं थीं। वर्ष 2015 में जब सूबे में सपा की सरकार थी तो यह पद पिछड़ा वर्ग की महिला के लिए आरक्षित हो गया था। इस पर एक विशेष रणनीति के तहत कार्य कर मुकेश अग्रवाल ने अपनी करीबी रिश्तेदार मीना अग्रवाल को निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित कराने में सफलता पाई थी।
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इस चुनाव में अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित है, लेकिन पूर्व अध्यक्ष मुकेश अग्रवाल जिला पंचायत के सदस्य चुने जा चुके हैं। जनपद की 72 सीटों में से जिला पंचायत सदस्य के लिए महज एक निर्विरोध निर्वाचन हुआ और वह सुरसा चतुर्थ सीट से मुकेश अग्रवाल का था।
अब दो दशक बाद यह कुर्सी नरेश अग्रवाल परिवार के कुनबे से बाहर निकली है, लेकिन जिस तरह नामांकन से लेकर मतदान और फिर मतगणना में मुकेश अग्रवाल सक्रिय रहे, उससे कहीं न कहीं उन चर्चाओं को बल मिलता है, जिसमें उनका दखल और प्रभाव जिला पंचायत में बरकरार रहने की बात कही जा रही है।
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नरेश अग्रवाल के छोटे भाई मुकेश अग्रवाल वर्ष 2000 में लोकतांत्रिक कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। वर्ष 2005 में वह सपा प्रत्याशी के रूप में जिला पंचायत के अध्यक्ष चुने गए। वर्ष 2010 में जब सूबे में बसपा की सरकार थी तो जिला पंचायत अध्यक्ष का पद महिला के लिए आरक्षित हो गया था।
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इस पर मुकेश अग्रवाल की पत्नी कामिनी अग्रवाल जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित हुईं थीं। वर्ष 2015 में जब सूबे में सपा की सरकार थी तो यह पद पिछड़ा वर्ग की महिला के लिए आरक्षित हो गया था। इस पर एक विशेष रणनीति के तहत कार्य कर मुकेश अग्रवाल ने अपनी करीबी रिश्तेदार मीना अग्रवाल को निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित कराने में सफलता पाई थी।
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इस चुनाव में अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित है, लेकिन पूर्व अध्यक्ष मुकेश अग्रवाल जिला पंचायत के सदस्य चुने जा चुके हैं। जनपद की 72 सीटों में से जिला पंचायत सदस्य के लिए महज एक निर्विरोध निर्वाचन हुआ और वह सुरसा चतुर्थ सीट से मुकेश अग्रवाल का था।
अब दो दशक बाद यह कुर्सी नरेश अग्रवाल परिवार के कुनबे से बाहर निकली है, लेकिन जिस तरह नामांकन से लेकर मतदान और फिर मतगणना में मुकेश अग्रवाल सक्रिय रहे, उससे कहीं न कहीं उन चर्चाओं को बल मिलता है, जिसमें उनका दखल और प्रभाव जिला पंचायत में बरकरार रहने की बात कही जा रही है।