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खेतों में न जले पराली, जैविक खाद बनकर दे हरियाली
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हरदोई। खेतों मे धान की फसल भले ही अभी तैयार न हो लेकिन जिला प्रशासन ने पराली जलाने के कारण होने वाले प्रदूषण की रोकथाम की कवायद शुरू कर दी है। डीएम अविनाश कुमार के नेतृत्व में फसल अवशेष प्रबंधन की विस्तृत कार्य योजना तैयार की गई है। कार्य योजना में धान की पराली को गोशालाओं तक में लिए जाने से लेकर कंपोस्ट पिट के जरिए इसकी खाद बनवाने तक के इंतजाम किए गए हैं।
जनपद में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान की खेती होती है। पिछले कुछ वर्ष में आधुनिक मशीनों से धान की कटाई की जाने लगी है। खेतों में बचने वाले फसलों के अवशेष जिसे आम बोलचाल की भाषा में पराली कहा जाता है को अधिकांश लोग खेतों में ही जला देते हैं। इसके चलते सर्दियों में प्रदूषण और धुंध काफी बढ़ जाता है। इससे इतर किसानों को कानूनी कार्रवाई भी झेलनी पड़ती है।
जिला प्रशासन ने अभी से फसल अवशेष प्रबंधन की कार्य योजना बनाकर तैयार कर ली है। कार्य योजना के मुताबिक धान की पराली को किसान गोशालाओं तक भेज सकेंगे। इसके लिए ढुलाई का खर्च पंचायत राज विभाग देगा।। गोशालाओं में धान की पराली को चारा कटरी मशीन से कटवाकर भूसे की तरह एकत्र कर लिया जाएगा।
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पराली को अगर किसान अपने निजी उपयोग में लेना चाहते हैं, तो किसान उसे सुरक्षित स्थान पर रखवा लें। शेष पराली को फसल अवशेष प्रबंधन में इस्तेमाल कर लिया जाएगा। इसके अलावा मनेरगा के तहत ग्रामीण इलाकों में व्यक्तिगत और सामुदायिक कंपोस्ट पिट भी बनवाई जाएंगी। इनमें पराली का इस्तेमाल कर वेस्ट डिकंपोजर की मदद से खाद बना ली जाएगी।
लेखपाल, ग्राम सचिव, रोजगार सेवक और तकनीकी सहायक अपनी-अपनी ग्राम पंचायत में फसल अवशेष प्रबंधन के लिए कार्य करेंगे। खेतों में पड़े फसल अवशेषों को किसानों की सुरक्षित भूमि में पहुंचवा दिया जाएगा। गोशालाओं में भी पराली पहुंचाने के जिम्मेदारी इन्हीं कर्मचारियों पर होगी। अगर लापरवाही हुई, तो इन्हीं कर्मचारियों पर कार्रवाई भी होगी।
खंड विकास अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि फसल अवशेष प्रबंधन की नियमित निगरानी करें। बीडीओ देखेंगे कि कितने किसानों ने पराली निजी उपयोग के लिए संकलित की है, कितनी से खाद बनाने की तैयारी है और कितनी गोशालाओं में भेजी गई है। निरीक्षकों की फोटो हर रोज मनरेगा सेल और उपनदेशक कृषि को भेजनी होगी।
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी गोशालाओं में पराली का भंडारण कराएंगे, जबकि उपनिदेशक कृषि वेस्ट कंपोजर की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे।
डीएम अविनाश कुमार ने पराली प्रबंधन के लिए एक टीम भी गठित कर दी है। इस टीम में उपनिदेशक कृ षि, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी, उपायुक्त मनरेगा और जिला पंचायत राज अधिकारी शामिल हैं। यह लोग हर सोमवार को प्रबंधन के लिए बनी कार्य योजना को अमली जामा पहनाए जाने की आख्या डीएम को देंगे।
पराली से खाद बनाने की जानकारी मनरेगा कर्मियों और ग्रामीणों को दी जाएगी। इसके लिए उपनिदेशक कृषि के अधीन तैनात कर्मचारी तकनीकी प्रशिक्षण देंगे। सभी ग्राम पंचायतों में मनरेगा से व्यक्तिगत और सामुदायिक कंपोस्ट पिट की संख्या के आधार पर वेस्ट कंपोजर भी उपलब्ध कराया जाएगा।
डीएम अविनाश कुमार ने बताया कि प्रदूषण की रोकथाम में सभी का सहयोग आवश्यक है। कुछ किसान अज्ञानतावश खेतों में पराली जला देते हैं। इससे भूमि की उर्वरता पर फर्क पड़ता है।
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जनपद में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान की खेती होती है। पिछले कुछ वर्ष में आधुनिक मशीनों से धान की कटाई की जाने लगी है। खेतों में बचने वाले फसलों के अवशेष जिसे आम बोलचाल की भाषा में पराली कहा जाता है को अधिकांश लोग खेतों में ही जला देते हैं। इसके चलते सर्दियों में प्रदूषण और धुंध काफी बढ़ जाता है। इससे इतर किसानों को कानूनी कार्रवाई भी झेलनी पड़ती है।
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जिला प्रशासन ने अभी से फसल अवशेष प्रबंधन की कार्य योजना बनाकर तैयार कर ली है। कार्य योजना के मुताबिक धान की पराली को किसान गोशालाओं तक भेज सकेंगे। इसके लिए ढुलाई का खर्च पंचायत राज विभाग देगा।। गोशालाओं में धान की पराली को चारा कटरी मशीन से कटवाकर भूसे की तरह एकत्र कर लिया जाएगा।
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पराली को अगर किसान अपने निजी उपयोग में लेना चाहते हैं, तो किसान उसे सुरक्षित स्थान पर रखवा लें। शेष पराली को फसल अवशेष प्रबंधन में इस्तेमाल कर लिया जाएगा। इसके अलावा मनेरगा के तहत ग्रामीण इलाकों में व्यक्तिगत और सामुदायिक कंपोस्ट पिट भी बनवाई जाएंगी। इनमें पराली का इस्तेमाल कर वेस्ट डिकंपोजर की मदद से खाद बना ली जाएगी।
लेखपाल, ग्राम सचिव, रोजगार सेवक और तकनीकी सहायक अपनी-अपनी ग्राम पंचायत में फसल अवशेष प्रबंधन के लिए कार्य करेंगे। खेतों में पड़े फसल अवशेषों को किसानों की सुरक्षित भूमि में पहुंचवा दिया जाएगा। गोशालाओं में भी पराली पहुंचाने के जिम्मेदारी इन्हीं कर्मचारियों पर होगी। अगर लापरवाही हुई, तो इन्हीं कर्मचारियों पर कार्रवाई भी होगी।
खंड विकास अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि फसल अवशेष प्रबंधन की नियमित निगरानी करें। बीडीओ देखेंगे कि कितने किसानों ने पराली निजी उपयोग के लिए संकलित की है, कितनी से खाद बनाने की तैयारी है और कितनी गोशालाओं में भेजी गई है। निरीक्षकों की फोटो हर रोज मनरेगा सेल और उपनदेशक कृषि को भेजनी होगी।
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी गोशालाओं में पराली का भंडारण कराएंगे, जबकि उपनिदेशक कृषि वेस्ट कंपोजर की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे।
डीएम अविनाश कुमार ने पराली प्रबंधन के लिए एक टीम भी गठित कर दी है। इस टीम में उपनिदेशक कृ षि, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी, उपायुक्त मनरेगा और जिला पंचायत राज अधिकारी शामिल हैं। यह लोग हर सोमवार को प्रबंधन के लिए बनी कार्य योजना को अमली जामा पहनाए जाने की आख्या डीएम को देंगे।
पराली से खाद बनाने की जानकारी मनरेगा कर्मियों और ग्रामीणों को दी जाएगी। इसके लिए उपनिदेशक कृषि के अधीन तैनात कर्मचारी तकनीकी प्रशिक्षण देंगे। सभी ग्राम पंचायतों में मनरेगा से व्यक्तिगत और सामुदायिक कंपोस्ट पिट की संख्या के आधार पर वेस्ट कंपोजर भी उपलब्ध कराया जाएगा।
डीएम अविनाश कुमार ने बताया कि प्रदूषण की रोकथाम में सभी का सहयोग आवश्यक है। कुछ किसान अज्ञानतावश खेतों में पराली जला देते हैं। इससे भूमि की उर्वरता पर फर्क पड़ता है।