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Ground Report Allahabad: इस बार यहां विरासत की जंग, किसी भी दल के लिए लड़ाई आसान नहीं... जानें सियासी समीकरण

Thu, 23 May 2024 09:24 AM IST
आकाश दुबे अमित सरन, अमर उजाला, प्रयागराज
अमित सरन, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: आकाश दुबे Updated Thu, 23 May 2024 09:24 AM IST
सार

इलाहाबाद सीट पर मौजूदा चुनाव की बात करें तो मतदाताओं का जो रुख है, उसे देखते हुए किसी भी दल के लिए लड़ाई आसान नहीं नजर आ रही, चाहे वह सत्तारूढ़ दल का प्रत्याशी हो या फिर गठबंधन समेत अन्य दलों का।

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Ground Report Allahabad This time there is a war of inheritance here
नीरज त्रिपाठी (BJP), उज्जवल रमण सिंह (कांग्रेस), रमेश पटेल (बसपा) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद संसदीय सीट पर इस बार विरासत की जंग है। भाजपा ने सांसद डॉ. रीता बहुगुणा जोशी का टिकट काटकर पार्टी के दिग्गज नेता पूर्व विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी के पुत्र नीरज त्रिपाठी को मैदान में उतारा है। शहर दक्षिणी विधानसभा क्षेत्र केसरीनाथ त्रिपाठी का गढ़ रहा है। वहीं, कांग्रेस ने करछना से दो बार सपा से विधायक रह चुके उज्ज्वल रमण सिंह पर दांव लगाया है। उज्ज्वल के पिता कुंवर रेवती रमण सिंह ने इस सीट पर 2004 व 2009 में लगातार दो बार सपा से जीत हासिल की थी। वहीं, बसपा ने करीब दो लाख पटेल मतदाताओं को देखते हुए पेशे से ठेकेदार रमेश पटेल को मैदान में उतारा है।

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सियासत की बड़ी प्रयोगशाला में शुमार इलाहाबाद लोकसभा सीट का इतिहास बेहद समृद्ध है। जय जवान, जय किसान का नारा बुलंद करने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने यहां का प्रतिनिधित्व किया। पूर्व पीएम विश्वनाथ प्रताप सिंह भी यहां से जीते। हेमवतीनंदन बहुगुणा, जनेश्वर मिश्र, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कुंवर रेवती रमण सिंह के सियासी कद को भी इस लोकसभा क्षेत्र के मतदाताओं ने बढ़ाया। 

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मौजूदा चुनाव की बात करें तो मतदाताओं का जो रुख है, उसे देखते हुए किसी भी दल के लिए लड़ाई आसान नहीं नजर आ रही, चाहे वह सत्तारूढ़ दल का प्रत्याशी हो या फिर गठबंधन समेत अन्य दलों का। यमुनापार की जसरा मंडी में मिले प्याज के बड़े सप्लायर राम कुमार कुशवाहा चुनावी चर्चा छिड़ते ही केंद्र की नीतियों को कोसने लगते हैं। कहते हैं, इसकी वजह से पिछले 11 महीनों में मैं बड़ा कर्जदार हो गया। बगल में बैठे सियाराम कुशवाहा भी उनकी हां में हां मिलाते हुए कहते हैं, व्यापारी परेशान हैं, बदलाव तो होना ही चाहिए। वहीं, सब्जियों के थोक व्यवसायी कर्मा निवासी प्रसिद्ध राम कुशवाहा कहते हैं कि उनका और पूरे परिवार का वोट तो भाजपा में ही जाएगा।

राम कुमार कुशवाहा हों या प्रसिद्ध राम कुशवाहा, जीत-हार के सवाल पर दोनों यही बोले कि इस बार ओबीसी वोटर बंटे हुए हैं। ऐसे में कुछ भी कहना मुश्किल है। दोपहर 12 बजे के आसपास भीषण गर्मी में अपने साथियों के संग शंकरगढ़ के रामभवन चौराहा के पास चाय की चुस्कियां लेते मिले सोनू कहते हैं, क्षेत्र में पावर प्लांट और सीमेंट  प्लांट तो खुला, लेकिन स्थानीय लोगों को कोई रोजगार नहीं मिला।

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बारा विधानसभा क्षेत्र के शिवराजपुर चौराहे पर खीरा और तरबूज की दुकान लगाने वाले अमन इंटर पास हैं। रोजगार के सवाल पर बोले कि सबको सरकारी नौकरी तो मिल नहीं सकती। निजी नौकरी में 10 हजार से अधिक नहीं मिलते। अच्छी बात यह है कि अब गुंडई और वसूली नहीं होती। मंडी से माल लाने में किसी को कुछ देना नहीं पड़ता और महीने में 15 हजार रुपये आसानी से कमा लेता हूं। कोरांव विधानसभा क्षेत्र के खीरी में पान की दुकान लगाने वाले 75 वर्षीय दारा का मानना है कि इस बार चुनाव में कोई मुद्दा ही नहीं है। कौन जीत रहा है, इस सवाल पर वह कहते हैं, भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है। पास की गुमटी में परचून की दुकान चलाने वाले 70 वर्षीय दीवान चुनावी माहौल पर काफी कुरेदने पर बोले, तीन दिनों से बिजली नहीं आ रही है। वोट किसे देंगे? इस पर टका सा जवाब दिया कि जहां गांव वाले कहेंगे, वहीं दे देंगे।

शाम चार बजे के आसपास करछना के भीरपुर में एक मिष्ठान भंडार के बाहर चाय-नाश्ता कर रहे मनोज पांडेय और उनके साथियों ने तो राजनीति की चौपाल ही लगा रखी थी। वे कहते हैं, इलाहाबाद संसदीय सीट के विधानसभा क्षेत्र कोरांव में भाजपा तो करछना में कांग्रेस ज्यादा मजबूत है। मेजा और बारा में दोनों के बीच कांटे की टक्कर है। ऐसे में शहर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के मतदाता निर्णायक की भूमिका निभा सकते हैं।

बातचीत में मतदाताओं ने उठाए ये मुद्दे

  • शंकरगढ़ में राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी के प्रयास से वर्ष 1999 में मिनी आईटीआई खुली, लेकिन इसमें कभी प्रवेश ही नहीं लिया गया।

 

  • मेजा पहाड़ी पर स्थित मेजा कताई मिल 1998 से बंद पड़ी है। 90 फीसदी श्रमिकों के पुराने भुगतान वर्षों से लंबित पड़े हैं। श्रमिकों ने आंदोलन किया तो चार माह पहले कानपुर में प्रबंधन और मजदूर संघ के मंत्री राम प्रताप पांडेय के बीच हुई बैठक में सहमति बनी कि एक माह में लंबित भुगतान कर दिया जाएगा, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ।

 

  • शंकरगढ़ के निराला नगर की आबादी 1500 है। स्थानीय लोग पिछले 15 वर्षों से प्रयास में हैं कि किसी तरह एक आंगनबाड़ी केंद्र खोल दिया जाए। इसके लिए सरकार को कई पत्र भी लिखे गए, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ।
  • शंकरगढ़ तीन भागों-उपरहार, मधवार और तरहार में विभाजित है। यमुना किनारे वाले तरहार को छोड़ दें तो पहाड़ी पर स्थित उपरहार और पठार पर मधवार में पानी की जबरदस्त किल्लत है। स्थानीय लोग बताते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के कार्यकाल में यहां नहरें बनी थीं। उसके बाद पानी के लिए कोई बड़ा काम नहीं हुआ। गर्मी के मौसम में तकरीबन एक लाख की आबादी को पानी के लिए तरसना पड़ता है।
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