{"_id":"59020fd64f1c1b9928c0edfa","slug":"there-is-no-any-agency-to-check-ro-water","type":"story","status":"publish","title_hn":"केवल टीडीएस जांच कर पिलाते हैं ‘आरओ का पानी’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
केवल टीडीएस जांच कर पिलाते हैं ‘आरओ का पानी’
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Fri, 28 Apr 2017 01:58 AM IST
विज्ञापन
आरओ का पानी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शुद्ध पानी के नाम पर धंधा करने वाले न सिर्फ भूगर्भ जल का दोहन कर रहे हैं बल्कि लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी कर रहे हैं। किसी भी तरह की जांच न होने का लाभ उठाते हुए कारोबारी केवल टीडीएस जांच कर लोगों के लोगों की प्यास बुझा रहे हैं।
दरअसल नगर निगम पर शहर के लोगों को साफ एवं शुद्ध पानी पिलाने की जिम्मेदारी है, लेकिन स्थिति यह है कि अक्सर शहर के किसी न किसी इलाके में गंदे पानी की आपूर्ति होने की शिकायत रहती है। कभी-कभी तो पानी की सप्लाई ठप हो जाती है। ऐसी स्थिति में पीने के पानी के लिए लोगों की निर्भरता जार, कैन एवं डिब्बों में पानी की आपूर्ति करने वालों पर बढ़ गई है। इसका असर यह है कि शहर के करीब-करीब सभी इलाकों में इनका धंधा जबरदस्त फल-फूल रहा है। सबसे चिंता वाली बात यह है कि इन कारोबारियों द्वारा बेचे जा रहे पानी की गुणवत्ता की कोई भी एजेंसी जांच नहीं करती। वहीं कारोबारियों का कहना है कि टीडीएस जांच कर पानी की बिक्री की जाती है। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से शहर के भूगर्भ जल के सर्वे रिपोर्ट में यह स्थिति चिंता जनक है।
भूगर्भ जल भी हो चुका है प्रदूषित
नगर निगम का जलकल विभाग शहर के लोगों को शुद्ध पानी पिलाने का दावा करता रहा है, लेकिन अक्सर जांच में निगम द्वारा सप्लाई पानी की गुणवत्ता खराब पाई जाती है। सामान्य तौर पर जलकल विभाग क्लोरीनेशन कर पानी की सप्लाई करता है, लेकिन मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शोध छात्रों के सर्वे में भूगर्भ जल में जिस तरह के खतरनाक तत्व पाए गए हैं वह चिंताजनक है क्योंकि केवल क्लोरीनेशन से आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे तत्व को खत्म नहीं किया जा सकता। विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. गोविंद पांडेय ने बताया कि शहर के कई इलाकों के पानी में न सिर्फ बैक्टीरिया बल्कि फ्लोराइड और आर्सेनिक मिले हैं। हालांकि 400 से 500 फीट की गहराई से मिलने वाले पानी में इनके मिलने की संभावना न के बराबर होती है।
विज्ञापन
36 प्रतिशत सैंपल में मिला आर्सेनिक
पानी में प्रति लीटर फ्लोराइड की मात्रा एक मिलीग्राम और आर्सेनिक की मात्रा 0.01 मिलीग्राम से कम होनी चाहिए। हालांकि वैकल्पिक स्थिति में यह मात्रा क्रमश: 1.5 मिलीग्राम और 0.05 मिलीग्राम तक मान्य होती है, लेकिन गोरखपुर के कई इलाकों के यह मात्रा मानक से ज्यादा मिली है। यूनिवर्सिटी के शोधछात्र संजय कुमार ने शहर के 70 इंडिया मार्क-2 हैंडपंप समेत गोरखपुर के कुल 248 जगहों से पानी का सैंपल लिया। इनमें से 36 प्रतिशत सैंपल में आर्सेनिक और 27 प्रतिशत में फ्लोराइड मिला है। शहर में असुरन, बहरामपुर, राप्तीनगर, बेतियाहाता समेत कुछ अन्य इलाकों के पानी में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड की मात्रा पाई गई है।
सैप्टिक टैंक वाले इलाकों के पानी में बैक्टीरिया
शहर के जिन इलाकों में सैप्टिक टैंक हैं उन इलाकों में 100 फीट के दायरे में और 150 फीट की गहराई में बैक्टीरिया पाए गए हैं। शहर के कई इलाकों में 50 इंडिया मार्क 2 हैंडपंप के नमूने लिए गए। इनमें से एक तिहाई नमूनों (17) में बैक्टीरिया मिले। शहर में मात्र 22 प्रतिशत इलाकों में ही सीवर प्रणाली मौजूद है, जो 1968-69 में बनी हुई है। लेकिन सीवेज निस्तारण की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है और न ही नगर में कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट है।
विज्ञापन
दरअसल नगर निगम पर शहर के लोगों को साफ एवं शुद्ध पानी पिलाने की जिम्मेदारी है, लेकिन स्थिति यह है कि अक्सर शहर के किसी न किसी इलाके में गंदे पानी की आपूर्ति होने की शिकायत रहती है। कभी-कभी तो पानी की सप्लाई ठप हो जाती है। ऐसी स्थिति में पीने के पानी के लिए लोगों की निर्भरता जार, कैन एवं डिब्बों में पानी की आपूर्ति करने वालों पर बढ़ गई है। इसका असर यह है कि शहर के करीब-करीब सभी इलाकों में इनका धंधा जबरदस्त फल-फूल रहा है। सबसे चिंता वाली बात यह है कि इन कारोबारियों द्वारा बेचे जा रहे पानी की गुणवत्ता की कोई भी एजेंसी जांच नहीं करती। वहीं कारोबारियों का कहना है कि टीडीएस जांच कर पानी की बिक्री की जाती है। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से शहर के भूगर्भ जल के सर्वे रिपोर्ट में यह स्थिति चिंता जनक है।
विज्ञापन
भूगर्भ जल भी हो चुका है प्रदूषित
नगर निगम का जलकल विभाग शहर के लोगों को शुद्ध पानी पिलाने का दावा करता रहा है, लेकिन अक्सर जांच में निगम द्वारा सप्लाई पानी की गुणवत्ता खराब पाई जाती है। सामान्य तौर पर जलकल विभाग क्लोरीनेशन कर पानी की सप्लाई करता है, लेकिन मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शोध छात्रों के सर्वे में भूगर्भ जल में जिस तरह के खतरनाक तत्व पाए गए हैं वह चिंताजनक है क्योंकि केवल क्लोरीनेशन से आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे तत्व को खत्म नहीं किया जा सकता। विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. गोविंद पांडेय ने बताया कि शहर के कई इलाकों के पानी में न सिर्फ बैक्टीरिया बल्कि फ्लोराइड और आर्सेनिक मिले हैं। हालांकि 400 से 500 फीट की गहराई से मिलने वाले पानी में इनके मिलने की संभावना न के बराबर होती है।
विज्ञापन
36 प्रतिशत सैंपल में मिला आर्सेनिक
पानी में प्रति लीटर फ्लोराइड की मात्रा एक मिलीग्राम और आर्सेनिक की मात्रा 0.01 मिलीग्राम से कम होनी चाहिए। हालांकि वैकल्पिक स्थिति में यह मात्रा क्रमश: 1.5 मिलीग्राम और 0.05 मिलीग्राम तक मान्य होती है, लेकिन गोरखपुर के कई इलाकों के यह मात्रा मानक से ज्यादा मिली है। यूनिवर्सिटी के शोधछात्र संजय कुमार ने शहर के 70 इंडिया मार्क-2 हैंडपंप समेत गोरखपुर के कुल 248 जगहों से पानी का सैंपल लिया। इनमें से 36 प्रतिशत सैंपल में आर्सेनिक और 27 प्रतिशत में फ्लोराइड मिला है। शहर में असुरन, बहरामपुर, राप्तीनगर, बेतियाहाता समेत कुछ अन्य इलाकों के पानी में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड की मात्रा पाई गई है।
सैप्टिक टैंक वाले इलाकों के पानी में बैक्टीरिया
शहर के जिन इलाकों में सैप्टिक टैंक हैं उन इलाकों में 100 फीट के दायरे में और 150 फीट की गहराई में बैक्टीरिया पाए गए हैं। शहर के कई इलाकों में 50 इंडिया मार्क 2 हैंडपंप के नमूने लिए गए। इनमें से एक तिहाई नमूनों (17) में बैक्टीरिया मिले। शहर में मात्र 22 प्रतिशत इलाकों में ही सीवर प्रणाली मौजूद है, जो 1968-69 में बनी हुई है। लेकिन सीवेज निस्तारण की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है और न ही नगर में कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट है।