{"_id":"58d28db34f1c1b776a1a15d5","slug":"rehman-organize-ramleela","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘रहमान’ के हाथों में रामलीला की कमान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘रहमान’ के हाथों में रामलीला की कमान
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Thu, 23 Mar 2017 12:57 AM IST
विज्ञापन
117 साल पहले मियां खुद्दस ने यहीं रामलीला की नींव रखी थी।
- फोटो : Amar Ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
‘भजन गाने कभी मंदिर में जब रसखान आते हैं, मंजर देखने ऐसे वहां भगवान आते हैं। फिरकापरस्ती उस गांव को छू नहीं सकती, बनाने राम की मूरत जहां रहमान आते हैं।’ पूर्वांचल की गंगा-जमुनी तहजीब समझाता कुशीनगर के राजेश राही का यह शेर रावतगंज रामलीला मैदान पर जीवंत हो उठता है। रामलला की धरती से आए एक मुसलमान ने 117 साल पहले यहां रामलीला की जो नींव रखी थी, वो आज सांस्कृतिक धरोहर का रूप ले चुकी है। मुहम्मदपुर के मुसलमान हों या भगवानपुर के हिंदू, यहां उनकी आस्था यूं जुड़ी की मंच के पीछे रामजानकी मंदिर बन गया।
अंग्रेजी शासन में फैजाबाद के खुद्दुस मियां जमींदार का मैनेजर बनकर गोरखपुर के रावतगंज पहुंचे थे। नई जगह पर लोगों से घुलने-मिलने के लिए उन्होंने रामलीला कराने का बीड़ा उठाया। सन् 1900 में उन्होंने यहां रामलीला की शुरुआत की और ताउम्र कराते रहे। इनके बाद स्थानीय लोगों ने बखूबी जिम्मेदारी उठाई। आज रामलीला समिति में करीब तीन दर्जन मुसलमान सदस्य हैं। क्षेत्र पंचायत सदस्य शिव कुमार पासवान बताते हैं कि रामलीला के दौरान कलाकारों का खाना हो या समापन पर भंडारे का चंदा, पूरी श्रद्धा के साथ मुस्लिम अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
रथयात्रा देती है सौहार्द का संदेश
समिति के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय रामप्रसाद सिंह के नाती एवं वर्तमान में रामलीला के सदस्य धीरज सिंह बताते हैं कि रामलीला नवरात्र के दूसरे दिन शुरू होती है। एकादशी को राजतिलक के बाद रथयात्रा निकलती है। बजहां, मुहम्मदपुर, महावनखोर, करमहवा और रावतगंज गांव में बिना किसी भेदभाव के रथयात्रा हर दरवाजे पर रुकती है। इसमें मुस्लिम भी बड़ी संख्या में श्रीराम की झांकी की आरती उतारते हैं।
विज्ञापन
हाजी मांगते थे ठाकुरजी का चरणोदक
गांव की गंगा-जमुनी तहजीब बयां करते हुए महंत रघुनाथ दास हाजी सत्तार को याद करने लगते हैं। छह महीने पूर्व अल्ला को प्यारे हुए हाजी सत्तार उनके बेहद करीब थे। बताया, जब वह रामलीला मैदान पर पहुंचते थे तब ठाकुर जी को चढ़ाया गया चरणोदक जरूर मांगते थे। उनके बेटे युसुफ से भी वैसी ही करीबी है। गोरखपुर में नौकरी कर रहे युसुफ ने उन्हें दर्जनों धार्मिक पुस्तकें भेंट कर चुके हैं।
सांस्कृतिक विरासत का दर्जा मिले
पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह इस रामलीला के संरक्षक रहे। अब उनके पुत्र पूर्व मंत्री फतेह बहादुर सिंह संरक्षक हैं। क्षेत्र पंचायत सदस्य शिव कुमार पासवान को उम्मीद है कि सूबे की नई सरकार से वह रामलीला को सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा दिलाने की पैरवी करेंगे। युवा रमजान भी इसकी पुरजोर वकालत करते हुए कहते हैं कि एक ओर मंदिर-मस्जिद के नाम पर झगड़े हो रहे हैं वहीं ये रामलीला भाईचारा की मिसाल है।
विज्ञापन
अंग्रेजी शासन में फैजाबाद के खुद्दुस मियां जमींदार का मैनेजर बनकर गोरखपुर के रावतगंज पहुंचे थे। नई जगह पर लोगों से घुलने-मिलने के लिए उन्होंने रामलीला कराने का बीड़ा उठाया। सन् 1900 में उन्होंने यहां रामलीला की शुरुआत की और ताउम्र कराते रहे। इनके बाद स्थानीय लोगों ने बखूबी जिम्मेदारी उठाई। आज रामलीला समिति में करीब तीन दर्जन मुसलमान सदस्य हैं। क्षेत्र पंचायत सदस्य शिव कुमार पासवान बताते हैं कि रामलीला के दौरान कलाकारों का खाना हो या समापन पर भंडारे का चंदा, पूरी श्रद्धा के साथ मुस्लिम अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
विज्ञापन
रथयात्रा देती है सौहार्द का संदेश
समिति के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय रामप्रसाद सिंह के नाती एवं वर्तमान में रामलीला के सदस्य धीरज सिंह बताते हैं कि रामलीला नवरात्र के दूसरे दिन शुरू होती है। एकादशी को राजतिलक के बाद रथयात्रा निकलती है। बजहां, मुहम्मदपुर, महावनखोर, करमहवा और रावतगंज गांव में बिना किसी भेदभाव के रथयात्रा हर दरवाजे पर रुकती है। इसमें मुस्लिम भी बड़ी संख्या में श्रीराम की झांकी की आरती उतारते हैं।
विज्ञापन
हाजी मांगते थे ठाकुरजी का चरणोदक
गांव की गंगा-जमुनी तहजीब बयां करते हुए महंत रघुनाथ दास हाजी सत्तार को याद करने लगते हैं। छह महीने पूर्व अल्ला को प्यारे हुए हाजी सत्तार उनके बेहद करीब थे। बताया, जब वह रामलीला मैदान पर पहुंचते थे तब ठाकुर जी को चढ़ाया गया चरणोदक जरूर मांगते थे। उनके बेटे युसुफ से भी वैसी ही करीबी है। गोरखपुर में नौकरी कर रहे युसुफ ने उन्हें दर्जनों धार्मिक पुस्तकें भेंट कर चुके हैं।
सांस्कृतिक विरासत का दर्जा मिले
पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह इस रामलीला के संरक्षक रहे। अब उनके पुत्र पूर्व मंत्री फतेह बहादुर सिंह संरक्षक हैं। क्षेत्र पंचायत सदस्य शिव कुमार पासवान को उम्मीद है कि सूबे की नई सरकार से वह रामलीला को सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा दिलाने की पैरवी करेंगे। युवा रमजान भी इसकी पुरजोर वकालत करते हुए कहते हैं कि एक ओर मंदिर-मस्जिद के नाम पर झगड़े हो रहे हैं वहीं ये रामलीला भाईचारा की मिसाल है।