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मानसून के पूर्वानुमान को बनेगी मोबाइल ऑब्जर्वेटरी लैब
डॉ. राकेश राय, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Thu, 28 Jul 2016 01:16 AM IST
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गोरखपुर यूनिवर्सिटी
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वातावरण में ब्लैक कार्बन की स्थिति के अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपने के बाद इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी के भौतिक विज्ञान विभाग के शोध विभाग पर एक बार फिर भरोसा जताया है। इस बार ‘इसरो’ ने विभाग की देखरेख में मोबाइल ऑब्जर्वेटरी लैब लगाने का फैसला किया है। खुले आसमान के नीचे एक कंटेनर में बनाई जाने वाली यह लैब मानसून के पूर्वानुमान का आकलन करने में ‘इसरो’ का सहयोग करेगी।
लैब को स्थापित करने और उसके संचालन की जिम्मेदारी भी ‘इसरो’ ने उन्हीं प्रो. शांतनु रस्तोगी को सौंपी है, जिन्हें पहले ब्लैक कार्बन के अध्ययन का दायित्व दिया गया था। प्रो. शांतनु के मुताबिक यह लैब ब्लैक कॉर्बन के अध्ययन की ही अगली कड़ी है। दरअसल वातावरण में मौजूद वो कण जो बारिश की वजह बनते हैं, उनमें ब्लैक कार्बन के अलावा सिलकान और सल्फर प्रोडक्ट शामिल होते हैं। ये कण समूचे तौर पर एरोसोल के नाम से जाने जाते हैं। मोबाइल लैब समूचे एरोसोल का अध्ययन करेगा। प्रो. शांतनु ने बताया कि इस लैब को लगाने की शुरुआत देश के तीन जिलों से की गई है। इनमें गोरखपुर के अलावा उड़ीसा का भुवनेश्वर और कर्नाटक का बंगलूरू शामिल है।
शुरुआती दौर में ही गोरखपुर में लैब बनाने की वजह प्रो. शांतनु, यूनिवर्सिटी में एरोसोल पर पहले से गुणवत्तापरक शोध कार्य को देते हैं। उन्होंने बताया कि प्री-मानसून के अध्ययन के लिए स्थापित की जाने वाली इस लैब को मानसून से पहले शुरू किया जाना था, लेकिन मशीनों के इंस्टॉल न हो पाने से अब इसे अगले मानसून से शुरू करने का लक्ष्य है। इस लैब में एरोसोल पर किए गए अध्ययन को तय अवधि में ‘इसरो’ को उपलब्ध कराया जाएगा, जिसके आधार पर पूर्वांचल में मानसून की बारिश का अनुमान संभव हो सकेगा। मौसम के उतार-चढ़ाव का सटीक पूर्वानुमान भी लगाया जा सकेगा।
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लैब के अध्ययन का यह होगा स्वरूप
मोबाइल आब्जर्वेटरी लैब के लिए यूनिवर्सिटी परिसर के भौतिक विज्ञान विभाग के बगल में एक कंटेनर भी स्थापित किया जा रहा है। इसमें न सिर्फ एरोसोल के अध्ययन के लिए अत्याधुनिक यंत्र होंगे बल्कि अध्ययनकर्ता के बैठने का भी इंतजाम होगा। पूरी तरह से वातानुकूलित इस लैब में लगे यंत्र अध्ययन के दायरे में आने वाले कणों की वैज्ञानिक प्रापर्टी, उनके प्रकाश को अवशोषित और परावर्तित करने की क्षमता, मौसम के बदलाव में उनकी भूमिका और मौसमवार कणों के विकास और बदलते स्वरूप का आकलन करेंगे।
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लैब को स्थापित करने और उसके संचालन की जिम्मेदारी भी ‘इसरो’ ने उन्हीं प्रो. शांतनु रस्तोगी को सौंपी है, जिन्हें पहले ब्लैक कार्बन के अध्ययन का दायित्व दिया गया था। प्रो. शांतनु के मुताबिक यह लैब ब्लैक कॉर्बन के अध्ययन की ही अगली कड़ी है। दरअसल वातावरण में मौजूद वो कण जो बारिश की वजह बनते हैं, उनमें ब्लैक कार्बन के अलावा सिलकान और सल्फर प्रोडक्ट शामिल होते हैं। ये कण समूचे तौर पर एरोसोल के नाम से जाने जाते हैं। मोबाइल लैब समूचे एरोसोल का अध्ययन करेगा। प्रो. शांतनु ने बताया कि इस लैब को लगाने की शुरुआत देश के तीन जिलों से की गई है। इनमें गोरखपुर के अलावा उड़ीसा का भुवनेश्वर और कर्नाटक का बंगलूरू शामिल है।
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शुरुआती दौर में ही गोरखपुर में लैब बनाने की वजह प्रो. शांतनु, यूनिवर्सिटी में एरोसोल पर पहले से गुणवत्तापरक शोध कार्य को देते हैं। उन्होंने बताया कि प्री-मानसून के अध्ययन के लिए स्थापित की जाने वाली इस लैब को मानसून से पहले शुरू किया जाना था, लेकिन मशीनों के इंस्टॉल न हो पाने से अब इसे अगले मानसून से शुरू करने का लक्ष्य है। इस लैब में एरोसोल पर किए गए अध्ययन को तय अवधि में ‘इसरो’ को उपलब्ध कराया जाएगा, जिसके आधार पर पूर्वांचल में मानसून की बारिश का अनुमान संभव हो सकेगा। मौसम के उतार-चढ़ाव का सटीक पूर्वानुमान भी लगाया जा सकेगा।
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लैब के अध्ययन का यह होगा स्वरूप
मोबाइल आब्जर्वेटरी लैब के लिए यूनिवर्सिटी परिसर के भौतिक विज्ञान विभाग के बगल में एक कंटेनर भी स्थापित किया जा रहा है। इसमें न सिर्फ एरोसोल के अध्ययन के लिए अत्याधुनिक यंत्र होंगे बल्कि अध्ययनकर्ता के बैठने का भी इंतजाम होगा। पूरी तरह से वातानुकूलित इस लैब में लगे यंत्र अध्ययन के दायरे में आने वाले कणों की वैज्ञानिक प्रापर्टी, उनके प्रकाश को अवशोषित और परावर्तित करने की क्षमता, मौसम के बदलाव में उनकी भूमिका और मौसमवार कणों के विकास और बदलते स्वरूप का आकलन करेंगे।