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दुनिया का श्रेष्ठतम ज्ञान भंडार संस्कृत में : हृदयनारायण दीक्षित
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दुनिया का श्रेष्ठतम ज्ञान भंडार संस्कृत में : हृदयनारायण दीक्षित
गोरखपुर। महंत दिग्विजयनाथ एवं अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह के कार्यक्रम में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं संस्कृति’ पर आयोजित सम्मेलन में विधानसभा अध्यक्ष हृदयनाथ दीक्षित ने कहा कि दुनिया का श्रेष्ठतम ज्ञान संस्कृत में है। संस्कृत माता तथा संस्कृति उसकी पुत्री है। दोनों का प्रभाव साथ-साथ पड़ता है। यहां के राष्ट्रवाद में संस्कृति महत्वपूर्ण है। जबकि अन्य देशों में निश्चित भूभाग और वहां का राजा महत्वपूर्ण होता है।
उन्होंने भारत के राष्ट्रवाद का जिक्र करते हुए कहा, यहां कहा जाता है कि धरती हमारी मां है। हम उसके पुत्र हैं। यही वजह है कि देश के काने-कोने में भारत मां की जय के नारे लगाए जाते हैं। वह हमारे प्राणों में बसी है। इसी वजह से भारत मां की आजादी के लिए लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति देकर एक इतिहास बनाया। यही हमारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है।
इसी क्रम में दिगंबर अखाड़ा अयोध्या के महंत सुरेशदास ने कहा कि दिग्विजयनाथ कहा करते थे, संस्कृत भाषा वृहद ज्ञान विज्ञान का भंडार है। इस देश के लोग तबतक प्रथम श्रेणी के वैज्ञानिक नहीं बन सकते जब तक कि संस्कृत में उपलब्ध प्राचीन विज्ञानों का उचित अध्ययन नहीं कर लेते। वे कहा करते थे संस्कृत भारतीय भाषाओं की जननी है। उनकी पुण्यतिथि पर संस्कृत और संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं।
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महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति प्रो. यूपी सिंह ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि संस्कृत भारतीय चेतना और सनातन स्रोत की अग्रज धारा है। सनातन संस्कृति का आधार स्तंभ है। यदि किसी को भारत और भारतीयता को समझना है तो उसे संस्कृति की शरण लेनी होगी। विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि राष्ट्रवाद किसी राष्ट्र के प्रति उसके निवासियों के हृदय में प्रेम की भावना का नाम है। यह राष्ट्रवाद केवल भावना से नहीं बल्कि उसके प्रति समर्पण से सिद्ध होता है। कार्यक्रम का शुभारंभ दोनों ब्रह्मलीन संतों को पुष्पांजलि के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन डॉ. भगवान सिंह ने किया। इस अवसर पर महंत शेरनाथ, महंत शिवनाथ, महंत मिथलेशनाथ, योगी कमलनाथ, महंत राममिलन दास आदि उपस्थित थे।
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गोरखपुर। महंत दिग्विजयनाथ एवं अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह के कार्यक्रम में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं संस्कृति’ पर आयोजित सम्मेलन में विधानसभा अध्यक्ष हृदयनाथ दीक्षित ने कहा कि दुनिया का श्रेष्ठतम ज्ञान संस्कृत में है। संस्कृत माता तथा संस्कृति उसकी पुत्री है। दोनों का प्रभाव साथ-साथ पड़ता है। यहां के राष्ट्रवाद में संस्कृति महत्वपूर्ण है। जबकि अन्य देशों में निश्चित भूभाग और वहां का राजा महत्वपूर्ण होता है।
उन्होंने भारत के राष्ट्रवाद का जिक्र करते हुए कहा, यहां कहा जाता है कि धरती हमारी मां है। हम उसके पुत्र हैं। यही वजह है कि देश के काने-कोने में भारत मां की जय के नारे लगाए जाते हैं। वह हमारे प्राणों में बसी है। इसी वजह से भारत मां की आजादी के लिए लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति देकर एक इतिहास बनाया। यही हमारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है।
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इसी क्रम में दिगंबर अखाड़ा अयोध्या के महंत सुरेशदास ने कहा कि दिग्विजयनाथ कहा करते थे, संस्कृत भाषा वृहद ज्ञान विज्ञान का भंडार है। इस देश के लोग तबतक प्रथम श्रेणी के वैज्ञानिक नहीं बन सकते जब तक कि संस्कृत में उपलब्ध प्राचीन विज्ञानों का उचित अध्ययन नहीं कर लेते। वे कहा करते थे संस्कृत भारतीय भाषाओं की जननी है। उनकी पुण्यतिथि पर संस्कृत और संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं।
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महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति प्रो. यूपी सिंह ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि संस्कृत भारतीय चेतना और सनातन स्रोत की अग्रज धारा है। सनातन संस्कृति का आधार स्तंभ है। यदि किसी को भारत और भारतीयता को समझना है तो उसे संस्कृति की शरण लेनी होगी। विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि राष्ट्रवाद किसी राष्ट्र के प्रति उसके निवासियों के हृदय में प्रेम की भावना का नाम है। यह राष्ट्रवाद केवल भावना से नहीं बल्कि उसके प्रति समर्पण से सिद्ध होता है। कार्यक्रम का शुभारंभ दोनों ब्रह्मलीन संतों को पुष्पांजलि के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन डॉ. भगवान सिंह ने किया। इस अवसर पर महंत शेरनाथ, महंत शिवनाथ, महंत मिथलेशनाथ, योगी कमलनाथ, महंत राममिलन दास आदि उपस्थित थे।