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साहित्य ही क्या जो प्रतिपक्ष न तैयार करे : प्रो. सुधा

Wed, 18 Dec 2019 01:00 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 18 Dec 2019 01:00 AM IST
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gorakhpur univercity hindi dipartment
गोरखपुर विश्वविद्यालय के संवाद भवन में प्रेमचंद साहित्य संस्‍थान और साखी द्वारा आयोजित अंतर्र?
साहित्य ही क्या जो प्रतिपक्ष न तैयार करे : प्रो. सुधा
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गोरखपुर। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. सुधा सिंह ने कहा कि साहित्य का काम प्रतिपक्ष तैयार करना है। प्रचलित मानदंडों को तोड़ना है। साहित्य अगर अपना प्रतिपक्ष तैयार न कर सके और प्रचलित मानदंडों को भी न तोड़ सके तो उसकी सार्थकता साबित नहीं होती। प्रो. सिंह प्रेमचंद साहित्य संस्थान, गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के सहयोग से आयोजित ‘सौ साल बाद सेवासदन : स्त्री मुक्ति का भारतीय पाठ’ पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन ‘सेवासदन और भारतीय स्त्री का कल, आज और कल’ विषय पर बोल रही थीं। उन्होंने कहा कि तुलसीदास की रत्नावली पतिव्रता स्त्री के पक्ष में है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद स्त्री के असंतोष की चर्चा करते हुए विवाह में समानता, तलाक का समान कानून, संपत्ति के अधिकार की चर्चा करते हैं जो बहुत महत्वपूर्ण है।
सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ. संध्या सिंह ने कहा कि मैं ‘सेवासदन’ की सुमन से ज्यादा सहानुभूति नहीं रख पाती हूं। आज के समय में उतना बंधन नहीं है। गोविवि हिंदी विभाग में प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने कहा कि सेवासदन गोरखपुर में जरूर लिखा गया लेकिन इसकी पृष्ठिभूमि बनारस है। वाराणसी की डॉ. वंदना चौबे ने कहा कि सेवा सदन की स्त्री सुमन मुक्त है, परेशान पुरुष पात्र है। वे इसलिए परेशान हैं, क्योंकि उनके बने बनाए ढांचे को चोट पहुंच रही है। कहा कि भारतीय आधुनिकता एकदम अलग है। उसमें परंपरा से टकराहट है। समापन सत्र में मुख्य वक्तव्य बीएचयू के प्रोफेसर अवधेश प्रधान ने दिया। इस सत्र में विशिष्ट व्यक्तव्य प्रो. सदानंद शाही ने दिया। संगोष्ठी में प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र पढ़े। प्रेमचंद साहित्य संस्थान की वरिष्ठ सदस्य सुधाराज लक्ष्मी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
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वेश्यावृत्ति पर उपन्यास नहीं है सेवासदन : मदन मोहन
गोरखपुर। संगोष्ठी के पहले सत्र में वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि सेवासदन एक ऐसी कृति है जिसमें प्रेमचंद स्वयं छूट देते हैं कि सभी अपने द्वार खोज सकें। प्रेमचंद की रचनाओं को आप सिर्फ आनंद या चलताऊ तरीके से नहीं पढ़ सकते हैं। सेवासदन वेश्यावृत्ति पर उपन्यास नहीं है। संचालन कर रहे गोविवि के हिंदी विभाग में प्रो प्रत्यूष दुबे ने कहा कि सेवासदन की समीक्षा गोरखपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ‘स्वदेश’ में प्रकाशित हुई थी। वरिष्ठ आलोचक रघुवंश मणि ने कहा कि प्रेमचंद के उपन्यास सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित है। श्रीलंका से आईं रसांगी नायक्कर ने भी अपने विचार रखे।
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