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दवा लाने पर हो रहा उपचार
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Fri, 29 Apr 2016 08:18 PM IST
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मेडिकल कॉलेज
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मेडिकल कॉलेज में दवाओं की किल्लत अब इमरजेंसी तक पहुंच चुकी है। आलम यह कि इमरजेंसी में मरीज के आने के बाद तीमारदार दवाएं खरीदकर ला रहे हैं उसके बाद ही मरीज का उपचार शुरू हो पा रहा है। गरीब तीमारदार इलाज के लिए रुपये के इंतजाम में ही कर्जदार हो रहे हैं।
करीब तीन महीने से मेडिकल कॉलेज की यह स्थिति बनी हुई है। अस्पताल प्रशासन लगातार दावा कर रहा है कि जल्द ही दवाएं मंगा ली जाएंगी मगर ऐसा तीन महीने में नहीं हो सका है। अब तो अस्पताल का मेडिकल स्टोर सिर्फ खुलता और बंद होता है।
इमरजेंसी में हालात यह है कि मरीज को लगने वाले इंजेक्शन, सिरिंज, इंट्रा कैथ तक नहीं है। बुखार, सर्दी-जुखाम तक की दवाओं के लिए मरीज को रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। मेडिकल कॉलेज की ओर से कई बार रिमाइंडर भेजा जा चुका है। दवा सप्लाई करने वाली कंपनी ने हाथ खड़े कर दिए हैं। एक एक कर दवाएं खत्म हो रही हैं। दूसरी ओर कंपनी की ओर से दवाओं की सप्लाई नहीं की जा रही है। ओपीडी का भी बुरा हाल है।
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यहां आने वाले मरीजों को मैट्रोजील, दर्द, बुखार तक की दवा नहीं मिल पा रही है। दवाएं तीमारदारों को बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। ऐसे में जो गरीब मरीज है उनके तीमारदार अपने रिश्तेदारों से कर्ज लेकर इलाज कराने को विवश है। एक ओर सरकार मरीजों को मुफ्त और सस्ते इलाज का दावा कर रही है तो दूसरी ओर एक सिरिंज तक मरीजों को बाहर से खरीदना पड़ रहा है।
कर्ज लेकर शुरू कराया इलाज
पिता राजमुनि हादसे में घायल हो गए। आनन फानन उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज लाया। जो रुपये थे वह तुरंत ही खत्म हो गए। एक रिश्तेदार से कर्ज लिया हूं। 27 तारीख को मरीज भर्ती कराया अब तक 4 हजार रुपये खर्च कर चुका हूं।
जुगनू, हरपुर
4500 रुपये खर्च कर चुका हूं
मेरा भतीजा सड़क हादसे में घायल हो गया। बुधवार को उपचार के लिए उसे मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया हूं। एक भी दवा अंदर से नहीं मिली है। अब तक 4500 रुपये की दवा बाहर से खरीद कर ला चुका हूं। बहुत परेशानी झेलनी पड़ रही।
हृदय लाल, रियांव
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करीब तीन महीने से मेडिकल कॉलेज की यह स्थिति बनी हुई है। अस्पताल प्रशासन लगातार दावा कर रहा है कि जल्द ही दवाएं मंगा ली जाएंगी मगर ऐसा तीन महीने में नहीं हो सका है। अब तो अस्पताल का मेडिकल स्टोर सिर्फ खुलता और बंद होता है।
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इमरजेंसी में हालात यह है कि मरीज को लगने वाले इंजेक्शन, सिरिंज, इंट्रा कैथ तक नहीं है। बुखार, सर्दी-जुखाम तक की दवाओं के लिए मरीज को रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। मेडिकल कॉलेज की ओर से कई बार रिमाइंडर भेजा जा चुका है। दवा सप्लाई करने वाली कंपनी ने हाथ खड़े कर दिए हैं। एक एक कर दवाएं खत्म हो रही हैं। दूसरी ओर कंपनी की ओर से दवाओं की सप्लाई नहीं की जा रही है। ओपीडी का भी बुरा हाल है।
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यहां आने वाले मरीजों को मैट्रोजील, दर्द, बुखार तक की दवा नहीं मिल पा रही है। दवाएं तीमारदारों को बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। ऐसे में जो गरीब मरीज है उनके तीमारदार अपने रिश्तेदारों से कर्ज लेकर इलाज कराने को विवश है। एक ओर सरकार मरीजों को मुफ्त और सस्ते इलाज का दावा कर रही है तो दूसरी ओर एक सिरिंज तक मरीजों को बाहर से खरीदना पड़ रहा है।
कर्ज लेकर शुरू कराया इलाज
पिता राजमुनि हादसे में घायल हो गए। आनन फानन उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज लाया। जो रुपये थे वह तुरंत ही खत्म हो गए। एक रिश्तेदार से कर्ज लिया हूं। 27 तारीख को मरीज भर्ती कराया अब तक 4 हजार रुपये खर्च कर चुका हूं।
जुगनू, हरपुर
4500 रुपये खर्च कर चुका हूं
मेरा भतीजा सड़क हादसे में घायल हो गया। बुधवार को उपचार के लिए उसे मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया हूं। एक भी दवा अंदर से नहीं मिली है। अब तक 4500 रुपये की दवा बाहर से खरीद कर ला चुका हूं। बहुत परेशानी झेलनी पड़ रही।
हृदय लाल, रियांव