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आग की घटनाएं बढ़ीं, बर्न वार्ड बदहाल
Gorakhpur
Updated Fri, 04 Apr 2014 05:30 AM IST
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गोरखपुर। तेज हवाओं के चलने से आग की घटनाएं बढ़ी हैं लेकिन मेडिकल कॉलेज एक बार फिर पुराने इंतजामों के भरोसे ही इससे निबटने को तैयार है। सर्जरी विभाग के सहारे चलने वाले इस वार्ड में न तो किसी बड़ी घटना से निपटने के लिए पर्याप्त डॉक्टर हैं और न ही पर्याप्त बेड। जबरन बनाए गए 12 बेड के वार्ड की व्यवस्था महज एक प्लास्टिक सर्जन के हवाले है।
पहले तो कॉलेज में जले मरीजों का इलाज सर्जरी विभाग में ही किया जाता था लेकिन दो वर्ष पहले ऐसे मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए कॉलेज ने जिला प्रशासन से मदद मांगा। प्रशासन ने मदद की और सर्जरी वार्ड में ही 12 बेड को शीशे से घेरकर कर वातानुकूलित कर दिया गया। लेकिन समूचे वार्ड की जिम्मेदारी एकमात्र एकमात्र प्लास्टिक सर्जन डॉ. नीरज नथानी पर ही रही। पिछले दिनों केंद्र के मांगने पर जब कॉलेज प्रशासन ने 20 बेड के बर्न वार्ड का प्रस्ताव भेजा तो एक उम्मीद जगी लेकिन मंजूरी न मिलने से निराशा हाथ लगी। मौसम के बदलते रुख से आग लगने की घटनाएं बढ़ी हैं तो मेडिकल कॉलेज में बर्न मरीजों की तदाद भी। जहां पहले हफ्ते में एक से दो मरीज आए, वहीं इधर उनकी संख्या बढ़कर तीन से चार हो गई है। हालांकि कॉलेज प्रशासन का दावा है कि उसके पास पर्याप्त इंतजाम हैं लेकिन यह दावे कितने खोखले हैं, इसे समझने के लिए यहां का आधा-अधूरा इंतजाम काफी है।
जिला अस्पताल का बर्न वार्ड भी खस्ताहाल
जिला अस्पताल में भी बर्न वार्ड बदहाल है और मरीज बेहाल। पिछले दिनों जब एडी हेल्थ डॉ. डीएन त्रिपाठी ने अस्पताल के बर्न वार्ड का निरीक्षण किया तो खराब स्थिति पर नाराजगी जताई और इसे 30 मार्च तक दुरुस्त करने का निर्देश दिया। बावजूद इसके अस्पताल प्रशासन चौकस नहीं हुआ। अभी भी वार्ड की एक एसी खराब है। मरीजों की माने तो कई दवाएं भी अस्पताल में नहीं मिल रहीं, खासकर महंगी दवाएं। इस बाबत जब एसआईसी से बात करनी की कोशिश की गई, उनका मोबाइल नहीं उठा। जब इसकी सूचना एडी को दी गई तो उन्होेंने सख्त लहजे में कहा कि इसे लेकर एसआईसी से पूछताछ होगी। गर्मी के मौसम हर हाल में व्यवस्था ठीक रखनी होगी। ऐसा न होने पर कार्रवाई तय है।
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पहले तो कॉलेज में जले मरीजों का इलाज सर्जरी विभाग में ही किया जाता था लेकिन दो वर्ष पहले ऐसे मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए कॉलेज ने जिला प्रशासन से मदद मांगा। प्रशासन ने मदद की और सर्जरी वार्ड में ही 12 बेड को शीशे से घेरकर कर वातानुकूलित कर दिया गया। लेकिन समूचे वार्ड की जिम्मेदारी एकमात्र एकमात्र प्लास्टिक सर्जन डॉ. नीरज नथानी पर ही रही। पिछले दिनों केंद्र के मांगने पर जब कॉलेज प्रशासन ने 20 बेड के बर्न वार्ड का प्रस्ताव भेजा तो एक उम्मीद जगी लेकिन मंजूरी न मिलने से निराशा हाथ लगी। मौसम के बदलते रुख से आग लगने की घटनाएं बढ़ी हैं तो मेडिकल कॉलेज में बर्न मरीजों की तदाद भी। जहां पहले हफ्ते में एक से दो मरीज आए, वहीं इधर उनकी संख्या बढ़कर तीन से चार हो गई है। हालांकि कॉलेज प्रशासन का दावा है कि उसके पास पर्याप्त इंतजाम हैं लेकिन यह दावे कितने खोखले हैं, इसे समझने के लिए यहां का आधा-अधूरा इंतजाम काफी है।
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जिला अस्पताल का बर्न वार्ड भी खस्ताहाल
जिला अस्पताल में भी बर्न वार्ड बदहाल है और मरीज बेहाल। पिछले दिनों जब एडी हेल्थ डॉ. डीएन त्रिपाठी ने अस्पताल के बर्न वार्ड का निरीक्षण किया तो खराब स्थिति पर नाराजगी जताई और इसे 30 मार्च तक दुरुस्त करने का निर्देश दिया। बावजूद इसके अस्पताल प्रशासन चौकस नहीं हुआ। अभी भी वार्ड की एक एसी खराब है। मरीजों की माने तो कई दवाएं भी अस्पताल में नहीं मिल रहीं, खासकर महंगी दवाएं। इस बाबत जब एसआईसी से बात करनी की कोशिश की गई, उनका मोबाइल नहीं उठा। जब इसकी सूचना एडी को दी गई तो उन्होेंने सख्त लहजे में कहा कि इसे लेकर एसआईसी से पूछताछ होगी। गर्मी के मौसम हर हाल में व्यवस्था ठीक रखनी होगी। ऐसा न होने पर कार्रवाई तय है।
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