फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Gorakhpur News ›   लंग कैंसर का इलाज अब गोलियों से भी

लंग कैंसर का इलाज अब गोलियों से भी

Wed, 07 Mar 2018 07:36 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर। Updated Wed, 07 Mar 2018 07:36 PM IST
विज्ञापन
लंग कैंसर का इलाज अब गोलियों से भी
Cancer
जानलेवा लंग कैंसर का इलाज अब गोलियों से भी संभव है। खास बात ये कि यह पद्धति अब तक प्रचलित कीमोथेरेपी से काफी सस्ती और सटीक है। बुधवार को एम्स से प्रशिक्षित पटना के बुद्धा कैंसर सेंटर के डॉ. अरविंद कुमार ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज के आंकोलॉजी डिपार्टमेंट में आयोजित सीएमई को संबोधित करते हुए ये बातें बताईं।
विज्ञापन


उन्होंने बताया कि पुरुषों में लंग कैंसर सबसे आम कैंसर है। अधिकतर मामलों में धूम्रपान की लत और प्रदूषण के चलते लोगों में यह बीमारी होती है। धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहने वालों को भी यह बीमारी गिरफ्त में ले लेती है। बीमारी का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसका पता तब चलता है जब यह घातक रूप ले लेती है। क्षयरोग और सीओपीडी जैसे लक्षण वाली इस बीमारी की पहचान जल्द नहीं हो पाती। बायोप्सी जैसी तकनीक के आने के बाद इसकी पहचान आसान हुई है। कीमोथेरेपी इसके इलाज की प्रचलित तकनीक है। लेकिन अब नए शोधों के बाद इलाज के लिए नया कारगर तरीका ढूंढा गया है। इसमें मरीज के जीन की जांच कर देखा जाता है कि वह म्यूटेशन पॉजिटिव है या नहीं। मरीज के म्यूटेशन पॉजिटिव होने पर नई तकनीक का इस्तेमाल इलाज के लिए किया जा सकता है। इसमें मरीज को टायरोसीन किनेज इनहैबिटर (टीकेआई) की गोलियां देकर उसे चमत्कारिक लाभ पहुंचाया जा सकता है।
विज्ञापन


एमडी पैथोलॉजी डॉ. इरम ने ब्लड कैंसर की पहचान और उसके निदान की तकनीक पर चर्चा की। ऑंकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष मेजर डॉ. एमक्यू बेग ने कैंसर के इलाज में रेडियोथेरेपी के इस्तेमाल की जानकारी दी। संचालन श्वास रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अश्विनी मिश्र ने किया। इससे पहले प्रिंसिपल डॉ. गणेश कुमार ने सीएमई का उद्घाटन किया। इस दौरान डॉ. राकेश रावत, डॉ. ज्ञानचंद मौर्य, डॉ. मामून खान समेत शहर के कई चिकित्सक मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन


काफी सस्ता है नई तकनीक से इलाज
सामान्य तौर पर कीमोथेरेपी का खर्च जहां प्रति माह करीब 15,000 रुपये पड़ता है वहीं नई विधि से इलाज में खर्च दो से ढाई हजार रुपये महीना आता है।

ईजीएफआर टेस्ट जरूरी
एपीडर्मिक ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर (ईजीएफआर) टेस्ट से जीन म्यूटेशन का पता चलता है। इस टेस्ट के म्यूटेशन पॉजिटिव मिलने पर ही टीकेआई की गोलियों का इस्तेमाल होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed