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बखिरा के बर्तन कारीगर रामलीला में करेंगे मंचन
Updated Tue, 19 Sep 2017 11:39 PM IST
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बखिरा(संतकबीरनगर)। कस्बे के मंगल बाजार मोहल्ले में 57 वर्षों से हो रही रामलीला में इस बार फिर अपनेपन की खुशबू रहेगी। कारण कि बढ़ते खर्च को देखते हुए कमेटी बाहरी कलाकारों की बजाय इस बार स्थानीय लोगों से ही अभिनय कराने का निर्णय लिया है। अब तय हुए अधिकांश पात्रों में अधिकांश बर्तन कारीगर हैं। बर्तन कारीगर अशोक कुमार कैकेयी का, संजय कुमार भगवान श्रीराम का, राम प्रकाश लक्ष्मण का, रामचरन वर्मा रावण का, अंजनी केसरा बाणासुर का अभिनय करते नजर आएंगे। रामलीला समिति से जुड़े रामरेखा सिंह के अनुसार, 25 से 29 सितंबर तक रामलीला का मंचन होगा। कस्बे में 1960 में जगदीश कसेरा, सुदामा प्रसाद, रामलखन मैनेजर की अगुआई में रामलीला की शुरूआत हुई थी। इसके बाद वर्ष 1990 से जुग्गीलाल कसेरा, रामशरन, शिवप्रसाद, चंद्रप्रकाश, दिलीप प्रसाद कसेरा ने समिति की जिम्मेदारी संभाली। इसमें स्थानीय लोगों ने विभिन्न प्रसंगों को अभिनीत किया। उम्र हावी होने पर वर्ष 2000 मेें इस कमेटी के अधिकांश लोगों ने छुट्टी ले ली। ऐसे में पांच-छह साल तक रामलीला नहीं हुई। इसके बाद नई पीढ़ी के रामरेखा सिंह की अगुआई में दीपू, मनीष कसेरा, राजू समेत अन्य लोगों ने बाहरी कलाकारों को बुलाकर रामलीला का मंचन शुरू कराया। वक्त के साथ-साथ बाहरी कलाकारों का खर्च बढ़ता गया। ऐसे में 2016 में किसी तरह चंदा जुटाकर रामलीला का मंचन हुआ।
इस बार कमेटी के पदाधिकारियों ने बैठकर करके निर्णय लिया कि बाहरी कलाकारों की बजाय स्थानीय कलाकारों के माध्यम से ही रामलीला का मंचन कराया जाएगा। पूर्व में कैके यी का रोल निभाने वाले कलाकार अशोक कुमार ने बताया कि कस्बे के लोगों द्वारा रामलीला का मंचन पूरी तैयारी के साथ किया जाता रहा है। स्थानीय लोगों द्वारा मनोयोग से किए गए इस मंचन में अपनापन भी होता था। वक्त बदला तो स्थानीय के बजाए बाहरी लोगों द्वारा रामलीला का मंचन किया जाने लगा। कुछ भी हो, लेकिन पेशेवर कलाकारों में वह अपनापन नहीं झलकता है।
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इस बार कमेटी के पदाधिकारियों ने बैठकर करके निर्णय लिया कि बाहरी कलाकारों की बजाय स्थानीय कलाकारों के माध्यम से ही रामलीला का मंचन कराया जाएगा। पूर्व में कैके यी का रोल निभाने वाले कलाकार अशोक कुमार ने बताया कि कस्बे के लोगों द्वारा रामलीला का मंचन पूरी तैयारी के साथ किया जाता रहा है। स्थानीय लोगों द्वारा मनोयोग से किए गए इस मंचन में अपनापन भी होता था। वक्त बदला तो स्थानीय के बजाए बाहरी लोगों द्वारा रामलीला का मंचन किया जाने लगा। कुछ भी हो, लेकिन पेशेवर कलाकारों में वह अपनापन नहीं झलकता है।
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