फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Gorakhpur News ›   जहर जातिवाद का, बदल दिया एकता के अमृत में

जहर जातिवाद का, बदल दिया एकता के अमृत में

Tue, 08 Jan 2019 01:30 AM IST
ajay Kumar Gorakhpur, Uttar Pradesh, India
Gorakhpur, Uttar Pradesh, India Published by: ajay Kumar Updated Tue, 08 Jan 2019 01:30 AM IST
विज्ञापन
जहर जातिवाद का, बदल दिया एकता के अमृत में
gorakhnath temple - फोटो : gorakhnath temple
गोरखपुर। मध्ययुग में महायोगी गोरखनाथ और उनके नाथपंथ का आविर्भाव न हुआ होता तो भारतीय समाज जैसा आज है, शायद न होता। उनके दौर में जातीय श्रेष्ठतावाद का बोलबाला जाति-जाति और जाति-उपजाति के बीच जिस तरह जहर बो रहा था, वह न रुका होता तो समाज के तमाम टुकड़े होते। यूं समझें, जिस सामाजिक-राष्ट्रीय चेतना और एकता के गीत आज हम गा रहे हैं, उसके सूत्र पूर्व मध्ययुग में महायोगी के चलाए अभियान से ही बचे रह सके।
विज्ञापन


छठवीं से 12वीं शताब्दी का कालखंड भारत में तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश का भी युग था। धार्मिक व उपासना पद्धतियों के नाम पर पाखंड और आडंबर बढ़ रहे थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण जन्माधारित जाति में बदल रहे थे। जातियों में उपजातियां बढ़ रही थीं। इनके बीच ऊंच-नीच और छुआ-छूत की विकृति आ रही थी। आक्रमणों के साथ इस्लाम का प्रवेश हो रहा था। जातियों की टूट-फूट से विदेशी जातियों को भी समाज में समाने का मौका मिल रहा था। अलबरूनी के किताबुलहिंद एवं चंदबरदाई के पृथ्वीराजरासो में इस युग की जाति-व्यवस्था का विस्तृत विवरण मिलता है।
विज्ञापन

ग्रंथों में जातिभेद की गवाही

यहां जिस कालखंड की चर्चा हो रही है, वह जातियों के लिहाज से बहुत संवेदनशील था। ब्राह्यण अपनी शुद्धता-रूढ़िवादिता तथा क्षत्रिय शौर्य-पराक्रम की श्रेष्ठता के अहंकार में डूबे थे। इसे समाज पर जबरन थोप भी रहे थे। इनके द्वारा शूद्र जातियां नीच और अछूत घोषित की जा रही थीं। वैश्यों के बीच से कायस्थों का उदय हो चुका था। विखंडन और भी थे। अलबरूनी, देबल और लक्ष्मीधर ने तो लिखा ही है, जैनग्रंथ प्रशस्ति संग्रह, अभिदान चिंतामणि, देसीनमामला तथा विजयंती जैसे पुराने ग्रंथों में विभिन्न जातियों व उपजातियों के विवरण मिलते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

अभियान का असर भक्तियुग तक

जातियों, उपजातियों और उनके बीच चौड़ी होती खाई से समाज और राष्ट्र निरंतर कमजोर हो रहे थे। गुरु गोरखनाथ जाति व्यवस्था की बुराइयों के विरुद्ध डट गए। घोषित किया कि यह शास्त्र-सम्मत नहीं। बदले में योग का ऐसा सहज मार्ग दिया, जिसमें भेदभाव न था। कोई भी इसपर चलकर मोक्ष पा सकता था। महायोगी के अभियान का ही नतीजा था कि भक्ति आंदोलन में ‘नीच’ जातियों के भक्त ताल ठोंककर आगे आए।

नाथपंथ बना समरसता का पथ

नीच कही जाने वाली जातियों के लोगों को भी बड़ी संख्या में गुरु गोरखनाथ प्रवर्तित नाथपंथ में दीक्षा दी गई। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास में लिखा है कि 84 सिद्धों में मछुए, धोबी, कहार, लकड़हारे, दर्जी के अलावा और शूद्र कही जाने वाली तमाम जातियों के लोग थे। यहां तक कि बड़ी संख्या में इस्लाम के अनुयायी भी नाथपंथ में दीक्षित हुए। नाथपंथ के प्रभाव में ही सूफी मत विकसित हुआ।


 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed