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वोट बैंक के कारण राजनीतिज्ञों ने अपनाई तुष्टिकरण की नीति
Updated Wed, 06 Sep 2017 08:59 PM IST
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गोरखपुर। दिगंबर अखाड़ा अयोध्या के महंत सुरेश दास ने कहा कि अधिकांशत: राजनेताओं ने ‘वोट बैंक’ के लिए तुष्टिकरण की नीति अपनाई। अपने स्वार्थ के लिए उन लोगों ने जातीय वैमनस्यता की खाई चौड़ी कर दी। हिंदू संस्कृति, हिंदू जीवन पद्धति एवं श्रेष्ठ सामाजिक व्यवस्था में जाति के आधार पर ऊंच-नीच एवं छुआछूत की भावना कोढ़ की तरह है। धार्मिक संकीर्णता भी हमारे समाज को रूढ़िगत बनाती है। इसलिए हमें इससे दूर रहना होगा।
सुरेश दास महराज बुधवार को ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ एवं अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित संगोष्ठी में ‘सामाजिक समरसता भारतीय संस्कृति का प्राण’ विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देश के संत, महात्मा और धर्माचार्यों ने तो स्वतंत्रता के बाद से ही सामाजिक समरसता का अभियान छेड़ दिया था। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और अवेद्यनाथ ने तो व्यापक जन जागरूकता का अभियान चलाया था। दुर्भाग्य की बात है कि अधिकांश राजनेताओं ने वोट की खातिर तुष्टिकरण की नीति अपनाई। उन्होंने कहा कि हिंदू संस्कृति कण-कण में भगवान का दर्शन कराती है। जहां अद्वैत वेदांत का दर्शन गूंजा, उस संस्कृति में छुआछूत एवं धार्मिक संकीर्णता जैसी अमानवीय रूढ़िगत व्यवस्था की स्वीकृति कैसे की जा सकती है? हिंदू समाज अपनी संस्कृति को पहचाने और सामाजिक विकृति का त्याग करे।
संस्कृत उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री अतुल भाई कोठारी ने कहा कि देश की सभी समस्याओं के समाधान का मूल सामाजिक समरसता में निहित है। हम उस आध्यात्मिक संस्कृति के वारिस हैं जिसके कण-कण में परमात्मा का वास तथा सभी में उनका अंश माना है। ऐसे में जातिवाद, प्रांतवाद, स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब, ऊंच-नीच जैसे भेदभाव हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं हो सकता।
सुरेश दास महराज बुधवार को ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ एवं अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित संगोष्ठी में ‘सामाजिक समरसता भारतीय संस्कृति का प्राण’ विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देश के संत, महात्मा और धर्माचार्यों ने तो स्वतंत्रता के बाद से ही सामाजिक समरसता का अभियान छेड़ दिया था। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और अवेद्यनाथ ने तो व्यापक जन जागरूकता का अभियान चलाया था। दुर्भाग्य की बात है कि अधिकांश राजनेताओं ने वोट की खातिर तुष्टिकरण की नीति अपनाई। उन्होंने कहा कि हिंदू संस्कृति कण-कण में भगवान का दर्शन कराती है। जहां अद्वैत वेदांत का दर्शन गूंजा, उस संस्कृति में छुआछूत एवं धार्मिक संकीर्णता जैसी अमानवीय रूढ़िगत व्यवस्था की स्वीकृति कैसे की जा सकती है? हिंदू समाज अपनी संस्कृति को पहचाने और सामाजिक विकृति का त्याग करे।
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संस्कृत उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री अतुल भाई कोठारी ने कहा कि देश की सभी समस्याओं के समाधान का मूल सामाजिक समरसता में निहित है। हम उस आध्यात्मिक संस्कृति के वारिस हैं जिसके कण-कण में परमात्मा का वास तथा सभी में उनका अंश माना है। ऐसे में जातिवाद, प्रांतवाद, स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब, ऊंच-नीच जैसे भेदभाव हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं हो सकता।
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