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अब सताने लगी है बाढ़ की भयावहता
Updated Wed, 30 Aug 2017 01:43 AM IST
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गोरखपुर।
नदियों का पानी कम होने के बाद अब लोगों को बाढ़ के साथ बह गए अरमानों की टीस सालने लगी है। कर्ज लेकर परंपरागत खेती की जगह परवल, मूंगफली की फसल से अधिक मुनाफा कमाने वाले किसानों के सपने बिखर गए हैं। किसी के सामने बेटी की शादी करने चुनौती है तो किसी को घर को संवारने की चिंता सताने लगी है। इन सबके बीच प्रशासनिक लापरवाही से मदद के लिए भेजी जाने वाली खाद्य सामग्री बाढ़ पीड़ितों तक पहुंचने के पहले ही सड़ने लगी है। ग्रामीणों को सबसे ज्यादा चिंता अब फैलने वाली बीमारी से है।
सहजनवां/ घघसरा। उफनाई राप्ती नदी के घिरने से अमसार, कुसम्हाकला, मटियारी, रिठाना, भक्सा सहित दर्जन भर गांवों में फसल तो चौपट हुई ही है, आशियाना भी बिखर गया है। भक्सा के लालजी यादव कहते हैं, गांव से मेन सड़क तक जोड़ने वाली सड़क जगह-जगह टूट चुकी है। बड़ी मुश्किल से दोपहिया वाहन चल पा रहे हैं। घर में रखा सारा सामान भीग चुका है। चिंता यह है कि साल भर के राशन का जुगाड़ कहां से करेंगे। वहीं अमसार गांव के कैलाश का कहना है कि परवल, मूंगफली की बुवाई की थी। अनुमान था कि दोगुना मुनाफा होगा लेकिन सब कुछ चौपट हो गया। रिठाना के रामलाल ने बताया कि सबसे ज्यादा दिक्कत मवेशियों के खुराक की है। सरकारी मदद से हमें दो जून की रोटी मयस्सर तो हो जा रही है लेकिन इन बेजुबानों के लिए इंतजाम करने में दिक्कत आ रही है।
बांटने को आई थी खाद्य सामग्री, रखे-रखे सड़ गई
बांसगांव। प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा बाढ़ पीड़ितों को भुगतना पड़ रहा है। वितरण की व्यवस्था लचर होने से लोगों तक समय से लंच पैकेट और खाद्य सामग्री नहीं पहुंच पा रही है और तहसीलों में ही राहत पैकेट सड़ जा रहे हैं। बलिया के रसड़ा विधानसभा क्षेत्र के विधायक उमाशंकर सिंह ने बाढ़ पीड़ितों में वितरित करने के लिए 26 अगस्त को आटा, चावल, दाल, चीनी, आलू, ब्रेड, बिस्किट, लाई, मसाला, एक-एक थाली गिलास आदि के पैकेटों से भरे दो टक खाद्यान्न तथा छोटे-छोट पैकेट में तीन ट्रक भूसा को तहसील प्रशासन को सुपुर्द कर किया था। जिम्मेदारों ने इसका वितरण नहीं कराया और पैकेटों में रखे आलू, ब्र्रेड सड़ गए। तहसीलदार मदन मोहन वर्मा का कहना है कि सामग्रियों का वितरण कराया जा रहा है। सड़क के कटने और धंसने राहत सामग्री पहुंचाने में देरी हो रही है। उधर, आमी से घिरे भुसवल, डारी, सरसोपार गांव में 12 दिन बाद भी पीड़ितों को राहत सामग्री नहीं मिली है। इन गांवों के लोग बांध और स्कूलों में शरण लिए हुए हैं। गांव की लक्ष्मीना और विंध्यवासिनी ने बताया कि उनका टीनशेड का घर गिर गया है। खाने को कुछ नहीं बचा है। भुसवल के पिंटू और धर्म राज ने बताया कि घर में अभी पानी भरा है। पशुओं के लिए भूसा नहीं है। दूसरों के भरोसे ही भोजन का इंतजाम हो पा रहा है। जबकि सरसोपार की विमला ने बताया कि अभी तक प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं मिली है।
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गंदगी व बदबू से घर में रहना मुश्किल
कैंपियरगंज। गांवों से पानी कम होते ही अब गंदगी और बदबू से मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। घरों में रह पाना मुश्किल हो गया है। बाढ़ग्रस्त गांव बहबोलिया , मिरिहिरिया , बरईपार, मूसाबर, रिगौली, भैसला, भगवानपुर, चकदहा भुजौली आदि गांवों में स्वास्थ्य विभाग न तो ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव कराया है और न ही मेडिकल कैंप लगे हैं। एलर्जी, सांस की तकलीफ, बुखार जैसी बीमारियों से लोग परेशान हैं। उपजिलाधिकारी अमरेंद्र वर्मा का कहना है राहत सामग्री जैसे ही आ रहा है वितरण कराया जा रहा है। ब्लीचिंग पाउडर के छिड़काव के लिए सीएमओ से बात की गई है। उन्होंने जल्द छिड़काव कराने को कहा है।
नदियों का पानी कम होने के बाद अब लोगों को बाढ़ के साथ बह गए अरमानों की टीस सालने लगी है। कर्ज लेकर परंपरागत खेती की जगह परवल, मूंगफली की फसल से अधिक मुनाफा कमाने वाले किसानों के सपने बिखर गए हैं। किसी के सामने बेटी की शादी करने चुनौती है तो किसी को घर को संवारने की चिंता सताने लगी है। इन सबके बीच प्रशासनिक लापरवाही से मदद के लिए भेजी जाने वाली खाद्य सामग्री बाढ़ पीड़ितों तक पहुंचने के पहले ही सड़ने लगी है। ग्रामीणों को सबसे ज्यादा चिंता अब फैलने वाली बीमारी से है।
सहजनवां/ घघसरा। उफनाई राप्ती नदी के घिरने से अमसार, कुसम्हाकला, मटियारी, रिठाना, भक्सा सहित दर्जन भर गांवों में फसल तो चौपट हुई ही है, आशियाना भी बिखर गया है। भक्सा के लालजी यादव कहते हैं, गांव से मेन सड़क तक जोड़ने वाली सड़क जगह-जगह टूट चुकी है। बड़ी मुश्किल से दोपहिया वाहन चल पा रहे हैं। घर में रखा सारा सामान भीग चुका है। चिंता यह है कि साल भर के राशन का जुगाड़ कहां से करेंगे। वहीं अमसार गांव के कैलाश का कहना है कि परवल, मूंगफली की बुवाई की थी। अनुमान था कि दोगुना मुनाफा होगा लेकिन सब कुछ चौपट हो गया। रिठाना के रामलाल ने बताया कि सबसे ज्यादा दिक्कत मवेशियों के खुराक की है। सरकारी मदद से हमें दो जून की रोटी मयस्सर तो हो जा रही है लेकिन इन बेजुबानों के लिए इंतजाम करने में दिक्कत आ रही है।
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बांटने को आई थी खाद्य सामग्री, रखे-रखे सड़ गई
बांसगांव। प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा बाढ़ पीड़ितों को भुगतना पड़ रहा है। वितरण की व्यवस्था लचर होने से लोगों तक समय से लंच पैकेट और खाद्य सामग्री नहीं पहुंच पा रही है और तहसीलों में ही राहत पैकेट सड़ जा रहे हैं। बलिया के रसड़ा विधानसभा क्षेत्र के विधायक उमाशंकर सिंह ने बाढ़ पीड़ितों में वितरित करने के लिए 26 अगस्त को आटा, चावल, दाल, चीनी, आलू, ब्रेड, बिस्किट, लाई, मसाला, एक-एक थाली गिलास आदि के पैकेटों से भरे दो टक खाद्यान्न तथा छोटे-छोट पैकेट में तीन ट्रक भूसा को तहसील प्रशासन को सुपुर्द कर किया था। जिम्मेदारों ने इसका वितरण नहीं कराया और पैकेटों में रखे आलू, ब्र्रेड सड़ गए। तहसीलदार मदन मोहन वर्मा का कहना है कि सामग्रियों का वितरण कराया जा रहा है। सड़क के कटने और धंसने राहत सामग्री पहुंचाने में देरी हो रही है। उधर, आमी से घिरे भुसवल, डारी, सरसोपार गांव में 12 दिन बाद भी पीड़ितों को राहत सामग्री नहीं मिली है। इन गांवों के लोग बांध और स्कूलों में शरण लिए हुए हैं। गांव की लक्ष्मीना और विंध्यवासिनी ने बताया कि उनका टीनशेड का घर गिर गया है। खाने को कुछ नहीं बचा है। भुसवल के पिंटू और धर्म राज ने बताया कि घर में अभी पानी भरा है। पशुओं के लिए भूसा नहीं है। दूसरों के भरोसे ही भोजन का इंतजाम हो पा रहा है। जबकि सरसोपार की विमला ने बताया कि अभी तक प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं मिली है।
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गंदगी व बदबू से घर में रहना मुश्किल
कैंपियरगंज। गांवों से पानी कम होते ही अब गंदगी और बदबू से मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। घरों में रह पाना मुश्किल हो गया है। बाढ़ग्रस्त गांव बहबोलिया , मिरिहिरिया , बरईपार, मूसाबर, रिगौली, भैसला, भगवानपुर, चकदहा भुजौली आदि गांवों में स्वास्थ्य विभाग न तो ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव कराया है और न ही मेडिकल कैंप लगे हैं। एलर्जी, सांस की तकलीफ, बुखार जैसी बीमारियों से लोग परेशान हैं। उपजिलाधिकारी अमरेंद्र वर्मा का कहना है राहत सामग्री जैसे ही आ रहा है वितरण कराया जा रहा है। ब्लीचिंग पाउडर के छिड़काव के लिए सीएमओ से बात की गई है। उन्होंने जल्द छिड़काव कराने को कहा है।