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दर्शनशास् त्र विभाग में चल रही गोष् ठी का समापन
Updated Sun, 17 Sep 2017 08:47 PM IST
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गोरखपुर। गोरखपुर यूनिवर्सिटी के दर्शनशास्त्र विभाग की ओर से आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का रविवार को समापन हुआ। मुख्य अतिथि आईआईटी मुंबई के सामाजिक विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. पीआर भट्ट ने कहा कि दर्शन की विधि आलोचनात्मक होती है। अत: दर्शन के जिज्ञासुओं को बेझिझक प्रश्न पूछने चाहिए। जब कई प्रश्न उठते हैं तो कई उत्तर भी निकलते हैं और जब एक ही सवाल के कई उत्तर होते हैं, तब दर्शन प्रारंभ होता है।
भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सचिव प्रो. रजनीश शुक्ल ने कहा कि यंत्रवाद और प्रयोजनवाद के समन्वय से ही विश्व की व्यवस्थित व्याख्या की जा सकती है। आईसीएचआर के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डीएन त्रिपाठी ने कहा कि यंत्र सदैव किसी प्रयोजन के लिए होता है। संगोष्ठी के तीसरे दिन कुल 13 शोध पत्र पढ़े गए। आखिरी दिन दो सत्रों की अध्यक्षता प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी और प्रो. द्वारकानाथ ने की। स्वागत भाषण हेड प्रो. डीएन यादव और संचालन प्रो. सुशील तिवारी ने किया। संगोष्ठी में प्रो. सच्चिदानंद, डॉ. रणंजय सिंह, डॉ. प्रशांत शुक्ला, डॉ. ममता सिंह, डॉ. संजय तिवारी आदि मौजूद थे।
भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सचिव प्रो. रजनीश शुक्ल ने कहा कि यंत्रवाद और प्रयोजनवाद के समन्वय से ही विश्व की व्यवस्थित व्याख्या की जा सकती है। आईसीएचआर के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डीएन त्रिपाठी ने कहा कि यंत्र सदैव किसी प्रयोजन के लिए होता है। संगोष्ठी के तीसरे दिन कुल 13 शोध पत्र पढ़े गए। आखिरी दिन दो सत्रों की अध्यक्षता प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी और प्रो. द्वारकानाथ ने की। स्वागत भाषण हेड प्रो. डीएन यादव और संचालन प्रो. सुशील तिवारी ने किया। संगोष्ठी में प्रो. सच्चिदानंद, डॉ. रणंजय सिंह, डॉ. प्रशांत शुक्ला, डॉ. ममता सिंह, डॉ. संजय तिवारी आदि मौजूद थे।
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