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सामाजिक बदलाव की बुनियाद है साहित्य : हरिवंश
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Sun, 07 Oct 2018 01:52 AM IST
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शब्द संवाद
- फोटो : amar ujala
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गोरखपुर। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कहा कि साहित्य सामाजिक बदलाव की बुनियाद है। यह जाति, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर काम करने की सीख देता है। यह देश, समाज और प्रकृति की पीड़ा को भी दर्शाता है।
राज्यसभा के उपसभापति ने शनिवार को सेंट एंड्रयूज डिग्री कॉलेज के सभागार में दो दिवसीय गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट ‘शब्द-संवाद’ का उद्घाटन किया। कहा कि देश की आजादी में साहित्य, मुनादी कविताओं का बड़ा योगदान है। इससे आंदोलनकारियों को ताकत मिली और अंग्रेजों को देश छोड़ना पड़ा। सत्ता, बाजार और व्यापार मनुष्य को जोड़ने का काम नहीं कर सकते। दुनिया को बदलने के ज्यादातर माध्यम फेल हो चुके हैं। अब साहित्य का ही सहारा है। साहित्य के जरिये व्यवस्था और लोगों का मन बदलने का काम आसानी से किया जा सकता है। महायोगी और महापुरुषों के इस शहर में साहित्य समागम का होना शुभ संकेत है। इस मौके पर लेखिका नासिरा शर्मा, आयोजन मंडल के संयोजक डॉ. रजनीकांत श्रीवास्तव, प्रो. हर्ष सिन्हा, वरिष्ठ सर्जन डॉ. हर्षवर्धन, डॉ. उत्कर्ष कुमार, डॉ. संजय कुमार, डॉ. जेके लाल, अनुपम सहाय, राजीव केतन और शैवाल शंकर श्रीवास्तव मौजूद रहे।
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राज्यसभा के उपसभापति ने शनिवार को सेंट एंड्रयूज डिग्री कॉलेज के सभागार में दो दिवसीय गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट ‘शब्द-संवाद’ का उद्घाटन किया। कहा कि देश की आजादी में साहित्य, मुनादी कविताओं का बड़ा योगदान है। इससे आंदोलनकारियों को ताकत मिली और अंग्रेजों को देश छोड़ना पड़ा। सत्ता, बाजार और व्यापार मनुष्य को जोड़ने का काम नहीं कर सकते। दुनिया को बदलने के ज्यादातर माध्यम फेल हो चुके हैं। अब साहित्य का ही सहारा है। साहित्य के जरिये व्यवस्था और लोगों का मन बदलने का काम आसानी से किया जा सकता है। महायोगी और महापुरुषों के इस शहर में साहित्य समागम का होना शुभ संकेत है। इस मौके पर लेखिका नासिरा शर्मा, आयोजन मंडल के संयोजक डॉ. रजनीकांत श्रीवास्तव, प्रो. हर्ष सिन्हा, वरिष्ठ सर्जन डॉ. हर्षवर्धन, डॉ. उत्कर्ष कुमार, डॉ. संजय कुमार, डॉ. जेके लाल, अनुपम सहाय, राजीव केतन और शैवाल शंकर श्रीवास्तव मौजूद रहे।
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शब्द अहिंसा का विकल्प: प्रो. विश्वनाथ
उद्घाटन सत्र में साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं निर्माता भी है। शब्द अहिंसा का विकल्प है। सामान्य जीवन में संवाद बना रहे तो हिंसा नहीं होगी। संवाद खत्म हुआ तो हिंसा होगी। इसी का एक उदाहरण भीड़ हिंसा है। इसमें सोशल मीडिया की भूमिका खराब है। उन्होंने कहा कि लोग 90 फीसदी बातें मिथक, परंपरा और संबंधों से सीखते हैं। इन्हीं को साहित्यकार और कवियों ने शब्दों में पिरोया। समाज निर्माण में योगदान किया। इसका गवाह देश की सभी भाषाओं में रामायण और महाभारत की कहानियां हैं। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार बढ़ा है। अब जरूरत साहित्यकार, समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी और विचारकों के आगे आने की है कि इस मुद्दे पर बदलाव कैसे लाया जाए, इस पर सबको मिलकर काम करना पड़ेगा।
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