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बगैर मिट्टी के ही होगी खेती
Updated Tue, 19 Sep 2017 11:43 PM IST
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बस्ती में बगैर मिट्टी खेती की तैयारी
बस्ती। यकीन नहीं होगा, मगर यह बिल्कुल सही है कि बगैर मिट्टी के खेती हो सकती है। इस तकनीक को लेकर औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र के कृषि वैज्ञानिक प्रयोग में लाने की योजना को अमली जामा पहनाने में जुटे हैं। इजराइल तकनीक की इस खेती को विकसित करने का प्रशिक्षण संयुक्त निदेशक औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र डॉ. आरके तोमर ने प्राप्त कर लिया है। अब इसका विस्तार अपने जिले में करने के लिए किसानों को प्रशिक्षित करेंगे।
इजराइल में उपजाऊ भूमि न के बराबर है। मगर वहां के किसान खेती से करोड़ों रुपये तो कमाते ही हैं। गुणवत्तायुक्त फसल भी पैैदा करते हैं। इस तकनीक का विस्तार अब अपने जिले में भी होने वाला है। स्वायल लेस एग्रीकल्चर को बढ़ावा देने के लिए इस पर काम शुरू हो गया है। हालांकि, इसे अभी धरातल पर उतरने में समय लगेगा। मगर बगैर मिट्टी खेती की अपने जिले से बुनियाद पड़ चुकी है। मिट्टीविहीन खेती के लिए किसानों को कोकोपिट, कंपोस्ट और वर्मी कोलाइट का मिश्रण बनाना होगा। मिश्रण को जमीन के डेढ़ दो फिट ऊपर लेयर बनाना होता है। उक्त मिश्रण के खेत में खीरा, टमाटर, शिमला मिर्च, बैगन के अलावा महंगेे फूलों की खेती की जा सकेगी। इन फसलों को पोषण के लिए ड्रिप एरिगेशन के माध्यम से पानी और पोषक तत्वों को जरूरत के मुताबिक समय-समय पर दिया जाएगा। इससे यह विकसित होकर फल देंगे। उक्त फसलों के बीज पाली बैग में ही बोए जाएंगे। इन फसलों की खासियत यह होती है कि इसमें मिट्टी जनित रोग और कीट प्रभावित नहीं कर सकते। यह मिट्टी तीन साल तक लगातार प्रयोग में किसान ला सकेंगे।
औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र के संयुक्त निदेशक डॉ. आरके तोमर ने कहा कि मिट्टीविहीन खेती मिट्टी जनित रोगों को देखते हुए कारगर साबित होगी। यह खेती इजराइल की तकनीक है, क्योंकि वहां उपजाऊ भूमि की कमी है। कहते हैं कि इस खेती के विकास से जहां जमीन की कमी को पूरा किया जा सकता है वहीं अनावश्यक रूप से व्यय होने वाले पानी और पोषक तत्वों को भी बचाया जा सकता है। कहा कि अपने जिले में भी इसे विस्तारित किया जाएगा। किसानों को प्रशिक्षण के अलावा बेहतर अनुदान का लाभ भी योजना में शामिल होने पर सरकार देगी।
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बस्ती। यकीन नहीं होगा, मगर यह बिल्कुल सही है कि बगैर मिट्टी के खेती हो सकती है। इस तकनीक को लेकर औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र के कृषि वैज्ञानिक प्रयोग में लाने की योजना को अमली जामा पहनाने में जुटे हैं। इजराइल तकनीक की इस खेती को विकसित करने का प्रशिक्षण संयुक्त निदेशक औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र डॉ. आरके तोमर ने प्राप्त कर लिया है। अब इसका विस्तार अपने जिले में करने के लिए किसानों को प्रशिक्षित करेंगे।
इजराइल में उपजाऊ भूमि न के बराबर है। मगर वहां के किसान खेती से करोड़ों रुपये तो कमाते ही हैं। गुणवत्तायुक्त फसल भी पैैदा करते हैं। इस तकनीक का विस्तार अब अपने जिले में भी होने वाला है। स्वायल लेस एग्रीकल्चर को बढ़ावा देने के लिए इस पर काम शुरू हो गया है। हालांकि, इसे अभी धरातल पर उतरने में समय लगेगा। मगर बगैर मिट्टी खेती की अपने जिले से बुनियाद पड़ चुकी है। मिट्टीविहीन खेती के लिए किसानों को कोकोपिट, कंपोस्ट और वर्मी कोलाइट का मिश्रण बनाना होगा। मिश्रण को जमीन के डेढ़ दो फिट ऊपर लेयर बनाना होता है। उक्त मिश्रण के खेत में खीरा, टमाटर, शिमला मिर्च, बैगन के अलावा महंगेे फूलों की खेती की जा सकेगी। इन फसलों को पोषण के लिए ड्रिप एरिगेशन के माध्यम से पानी और पोषक तत्वों को जरूरत के मुताबिक समय-समय पर दिया जाएगा। इससे यह विकसित होकर फल देंगे। उक्त फसलों के बीज पाली बैग में ही बोए जाएंगे। इन फसलों की खासियत यह होती है कि इसमें मिट्टी जनित रोग और कीट प्रभावित नहीं कर सकते। यह मिट्टी तीन साल तक लगातार प्रयोग में किसान ला सकेंगे।
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औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र के संयुक्त निदेशक डॉ. आरके तोमर ने कहा कि मिट्टीविहीन खेती मिट्टी जनित रोगों को देखते हुए कारगर साबित होगी। यह खेती इजराइल की तकनीक है, क्योंकि वहां उपजाऊ भूमि की कमी है। कहते हैं कि इस खेती के विकास से जहां जमीन की कमी को पूरा किया जा सकता है वहीं अनावश्यक रूप से व्यय होने वाले पानी और पोषक तत्वों को भी बचाया जा सकता है। कहा कि अपने जिले में भी इसे विस्तारित किया जाएगा। किसानों को प्रशिक्षण के अलावा बेहतर अनुदान का लाभ भी योजना में शामिल होने पर सरकार देगी।
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