{"_id":"5c3a388dbdec22736e4eb148","slug":"171547319437-gorakhpur-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"लोककल्याण ही पूजा, यही पंथ, परंपरा भी यही","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लोककल्याण ही पूजा, यही पंथ, परंपरा भी यही
Sun, 13 Jan 2019 12:27 AM IST
ajay Kumar
Gorakhpur, Uttar Pradesh, India
Gorakhpur, Uttar Pradesh, India
Published by: ajay Kumar
Updated Sun, 13 Jan 2019 12:27 AM IST
विज्ञापन
gorakhnath temple
- फोटो : gorakhnath temple
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गोरखपुर। महायोगी गोरखनाथ द्वारा स्थापित नाथपंथ का अभीष्ट लोककल्याण ही है। जहां खिचड़ी मेला लगता है, उस गोरखनाथ मंदिर के महंत और गोरक्षपीठाधीश्वर को नाथयोगी महायोगी का प्रतिनिधि और अपना आध्यात्मिक नेता मानते हैं। यही कारण है कि यहां के महंत किसी बनी बनाई लीक पर नहीं चले। युग के अनुसार अपनी भूमिका बदलते रहे पर नहीं बदली तो लोककल्याण की धुन। जब समाज को जैसी जरूरत थी, उन्होंने उसी अनुरूप अभियान छेड़े। महायोगी गोरखनाथ द्वारा प्रज्वलित अखंडदीप एवं अखंड धुनी की तरह यह परंपरा भी उनकी तपस्थली पर अखंड रही है।
‘महंत’ शब्द ‘महांत’ का रूपांतरण है। जिस स्थिति में महानता भी छोटी प्रतीत होने लगे उसे महंत कहते हैं। महंत का एक अर्थ और बताया जाता है। जब मोह का अंत कर योग के प्रभाव से उत्पन्न दया, करुणा और प्रेम का प्रकाश अस्तित्व को जगमगा दे, उस अवस्था में पूर्ण सिद्ध ‘मोहांत’ कहा जाता है। ‘महंत’ में ‘मोहांत’ की भी प्रतिध्वनि है। इससे समझा जा सकता है, यहां महंत होना साधारण काम नहीं। महंत एवं पीठाधीश्वर कठिन साधना से निर्मित होता है। यह साधना ‘तन’ और ‘मन’ दोनों की होती है। शिष्य रूप में दीक्षित होने की कसौटी भी बहुत सख्त है। जब यही शिष्य की वर्षों की साधना से पीठाधीश्वर-महंत को आश्वस्त कर देता है वे उसे महंत पद पर उसका अभिषेक करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
‘महंत’ शब्द ‘महांत’ का रूपांतरण है। जिस स्थिति में महानता भी छोटी प्रतीत होने लगे उसे महंत कहते हैं। महंत का एक अर्थ और बताया जाता है। जब मोह का अंत कर योग के प्रभाव से उत्पन्न दया, करुणा और प्रेम का प्रकाश अस्तित्व को जगमगा दे, उस अवस्था में पूर्ण सिद्ध ‘मोहांत’ कहा जाता है। ‘महंत’ में ‘मोहांत’ की भी प्रतिध्वनि है। इससे समझा जा सकता है, यहां महंत होना साधारण काम नहीं। महंत एवं पीठाधीश्वर कठिन साधना से निर्मित होता है। यह साधना ‘तन’ और ‘मन’ दोनों की होती है। शिष्य रूप में दीक्षित होने की कसौटी भी बहुत सख्त है। जब यही शिष्य की वर्षों की साधना से पीठाधीश्वर-महंत को आश्वस्त कर देता है वे उसे महंत पद पर उसका अभिषेक करते हैं।
विज्ञापन
आजादी की लड़ाई में क्रांति वेश
इतिहास साक्षी है, गोरखनाथ मंदिर के महंत-योगियों ने राष्ट्र-रक्षा, सामाजिक-समरसता, कमजोर-दलित-पीड़ित की सुरक्षा के लिए सदैव आवाज उठाई। मध्ययुगीन भारत में बाबा अमृतनाथ, परमेश्वरनाथ, बुद्धनाथ, रामचंद्रनाथ, वीरनाथ, अजबनाथ तथा पिपरिनाथ उन महंतों में उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने सामाजिक जनजागरण का अनवरत अभियान चलाया। 19वीं शताब्दी में महंत गोपालनाथ तो बीसवीं शताब्दी में योगिराज बाबा गंभीरनाथ जी और महंत दिग्विजयनाथ ने स्वतंत्रता संग्राम में भी बड़ी भूमिका निभाई।
विज्ञापन