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छुआछूत को नहीं मानते थे महंत अवेद्यनाथ : प्रो रजनीश
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Wed, 08 Aug 2018 01:48 AM IST
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गोरखनाथ मंदिर
- फोटो : SELF
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गोरखपुर। दार्शनिक अनुसंधान परिषद् एवं भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के सदस्य सचिव प्रो. रजनीश शुक्ल ने कहा कि महंत अवेद्यनाथ सामाजिक समरसता एवं भारत माता के जगत जननी स्वरूप के उपासक थे। वे छुआछूत को नहीं मानते थे। समरस समाज की रचना ही उनके जीवन का उद्देश्य था। सही मायने में वे राष्ट्रीयता के अनन्य साधक थे। ये बातें प्रो. शुक्ल ने महाराणा प्रताप पीजी कॉलेज, जंगल धूसड़ में राष्ट्रसंत महंत अवेद्यनाथ साप्ताहिक स्मृति व्याख्यान माला के उद्घाटन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि कहीं।
प्रो. शुक्ल ने कहा कि देश को स्वतंत्र कराने में एक ओर युवा शहीद होने के लिए उतावले थे तो वहीं राष्ट्र में युवाओं का निर्माण कैसे हो, इसे लेकर भी प्रयास प्रारंभ हो गए थे। महंत अवेद्यनाथ का विराट व्यक्तित्व एक ऐसे मनीषी का भव्य स्वरूप है जिसमें धर्म के साक्षात दर्शन होते हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के बहाने पंथों के नाम पर बैठे धर्मगुरुओं को एक मंच पर लाकर उन्होंने राष्ट्रीय स्वाभिमान तथा संास्कृतिक राष्ट्रवाद का शंखनाद किया।
अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय इलाहाबाद के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने कहा कि महंत अवेद्यनाथ अपने युग के एक ऐसे महानायक थे जिन्होंने राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में एक साथ पुनर्जागरण का उद्घोष किया। प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि महंत अवेद्यनाथ की शिक्षा नीति जमीन से जुड़ी थी।
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उन्होंने वंचितों, पीड़ितों के कल्याण का मार्ग उन्हें शिक्षित करने एवं स्वस्थ रखने में देखा तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में योग, अध्यात्म, शिक्षा एवं चिकित्सा की त्रिवेणी बहाई। समारोह में डॉ अविनाश चंद, प्रो. राजेश सिंह, प्रो. विनोद सिंह, प्रो. रविशंकर सिंह, प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी, प्रो. मानवेंद्र प्रताप सिंह, प्रो. सुमित्रा सिंह, डॉ. अवधेश अग्रवाल, डॉ. संतोष सिंह, प्रो. महेश कुमार शरण, डॉ. बीएन सिंह, महेंद्र सिंह, योगेंद्र सिंह, नरसिंह बहादुर चंद आदि उपस्थित थे।
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प्रो. शुक्ल ने कहा कि देश को स्वतंत्र कराने में एक ओर युवा शहीद होने के लिए उतावले थे तो वहीं राष्ट्र में युवाओं का निर्माण कैसे हो, इसे लेकर भी प्रयास प्रारंभ हो गए थे। महंत अवेद्यनाथ का विराट व्यक्तित्व एक ऐसे मनीषी का भव्य स्वरूप है जिसमें धर्म के साक्षात दर्शन होते हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के बहाने पंथों के नाम पर बैठे धर्मगुरुओं को एक मंच पर लाकर उन्होंने राष्ट्रीय स्वाभिमान तथा संास्कृतिक राष्ट्रवाद का शंखनाद किया।
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अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय इलाहाबाद के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने कहा कि महंत अवेद्यनाथ अपने युग के एक ऐसे महानायक थे जिन्होंने राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में एक साथ पुनर्जागरण का उद्घोष किया। प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि महंत अवेद्यनाथ की शिक्षा नीति जमीन से जुड़ी थी।
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उन्होंने वंचितों, पीड़ितों के कल्याण का मार्ग उन्हें शिक्षित करने एवं स्वस्थ रखने में देखा तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में योग, अध्यात्म, शिक्षा एवं चिकित्सा की त्रिवेणी बहाई। समारोह में डॉ अविनाश चंद, प्रो. राजेश सिंह, प्रो. विनोद सिंह, प्रो. रविशंकर सिंह, प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी, प्रो. मानवेंद्र प्रताप सिंह, प्रो. सुमित्रा सिंह, डॉ. अवधेश अग्रवाल, डॉ. संतोष सिंह, प्रो. महेश कुमार शरण, डॉ. बीएन सिंह, महेंद्र सिंह, योगेंद्र सिंह, नरसिंह बहादुर चंद आदि उपस्थित थे।