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छत पर आशियाना और रोटी दूसरों के रहमोकरम पर

Mon, 28 Aug 2017 01:32 AM IST
Updated Mon, 28 Aug 2017 01:32 AM IST
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छत पर आशियाना और रोटी दूसरों के रहमोकरम पर

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राजन राय
गोरखपुर। डोमिनगढ़ इलाके से चार किलोमीटर दूर बसा उत्तरासोत गांव बाढ़ से चारों तरफ से घिरा है। सप्ताह भर में पानी करीब दो फीट कम हुआ है लेकिन यहां के लोगों की दुश्वारियां कम नहीं हुई है। छतों पर तंबू तानकर आशियाना बनाने वाले ज्यादातर लोगों की दो जून की रोटी का इंतजाम दूसरों के रहमोकरम पर है।
गांव में करीब 500 घर हैं और आबादी पांच हजार के आसपास। अब भी 200 से ज्यादा घरों तक पहुंच पाना मुमकिन नहीं है। रास्ते में कमर भर पानी है। गांव के बाहर तीन सरकारी नाव लगी हैं, जो लोगों को बांध तक पहुंचाने में मददगार हैं। बांध पर भी कई घरों के लोगों ने शरण ली है। गांव में जुगाड़ की नाव (ड्रम, ट्यूब से तैयार) ही सहारा है। गांव में अधिकांश लोगों का मेहनत, मजदूरी कर परिवार चलाते हैं, लेकिन बाढ़ के चलते पेंट, पालिस और प्लंबर के पेशे वाले सात दिनों से गांव में ही कैद होकर रह गए हैं। गांव के भोला पानी में चलकर पत्नी और घर आई रिश्तेदार की बेटी को शहर में एक रिश्तेदार के यहां भेजने जा रहे थे। बोले, अब खाने-पीने को कुछ नहीं है। रोजाना इंतजार करना पड़ता है कि लोग लंच पैकेट या भूजा, लाई लेकर आएंगे तो खाया जाएगा। अकेले रहेंगे तो किसी तरह जी लेंगे।
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ग्रामीण रामसूरत राहत सामग्री के वितरण में भेदभाव का आरोप लगाते हैं। वह कहते हैं, रोजाना बोट से एक ही इलाके में मदद दी जा रही है। झोपड़ी गिर गई है, पूरा घर सड़क पर है। दूसरों के भरोसे दो जून की रोटी का इंतजाम हो रहा है। कुछ दूर आगे बढ़ने पर लालजी का घर मिलता है। उनके घर की सुशीला ने बताया कि साहब, आप ही बताएं कि भूजा और बिस्किट से पेट भरेगा। लंच पैकेट आता तो है लेकिन हम लोगों को नहीं मिलता। गांव की शारदा बताती हैं, खेती और घर में रखा अनाज बाढ़ में बर्बाद हो गया। पूड़ी-सब्जी दिन में एक बार मिलती है उससे ही भूख शांत कर लेते हैं। वहीं पश्चिम टोला के शिवसागर व महेश चंद ने बताया कि बिजली की सप्लाई आने से राहत मिली है। बेटे से कहकर शहर से घरेलू सामान मंगाया है। कब तक दूसरों के भरोसे रहेंगे।
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हमें तो कई मदद नहीं मिली
मंझरिया गांव (हरिजन टोला) के संत प्रसाद रेलवे ट्रैक के किनारे ही गांव के मुहाने पर खटिया डालकर बैठे थे। बोले, बाबू हम लोगों का टोला सबसे आखिरी में है। यहां कोई मदद देने नहीं आया। बोट भी आती है तो नदी की ओर से गांव के दक्षिणी इलाके के लोगों को राहत सामग्री दी जाती है। हम लोग खाना खुद बनाते हैं। पानी कम हुआ है तो लड़के बाजार कर सामान लेकर आए हैं। संत प्रसाद के पास ही बैठे सेमरा गांव के राज किशोर ने बताया कि गांव में करीब 150 घरों में पानी घुसा है। रेलवे ट्रैक के उत्तरी छोर पर गांव होने के चलते यहां सरकारी बोट भी नहीं पहुंच पा रही है।

हेलीकाप्टर से गिराई गई राहत सामग्री
गोरखपुर। दोपहर करीब ढाई बजे एक हेलीकाप्टर जैसे ही मंडराया, बांध पर मौजूद उत्तरासोत, टिकरिया, जमुआर के लोगों ने हाथ हिलाना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में हेलीकाप्टर नीचे आया और लंच पैकेट गिराया गया। इसके बाद हेलीकाप्टर गांव की ओर रुख करते हुए घुनघुनकोठा, मंझरिया की की ओर चला गया और वहां भी लंच पैकेट, भूजा-बिस्किट के पैकेट गिराए गए।

सुनामी की तरह लहरें...आधे घंटे में सब बर्बाद
गोरखपुर। भले ही गाहासाड़-उत्तरी कोलिया बांध सात दिन पहले कटा हो, लेकिन बाढ़ की विभीषिका का सामना करने वाले ग्रामीण अब भी खौफनाक मंजर से उबर नहीं पा रहे हैं। बाढ़ की चर्चा शुरू होेते ही तबाही का वह दृश्य उनके आंखों के सामने कौंधने लग रहा है। उत्तरासोत गांव के लाल चंद गुप्ता बताते हैं, सप्ताह भर पहले सुबह के पांच बजे थे। शोर सुनकर आंख खुली तो देखा गांव में लोग इधर-उधर भाग रहे हैं। घर से बाहर जब खेत की ओर नजर गई तो सुनामी की तरह उठती लहरें दिखीं। कुछ देर तक समझ ही नहीं सका कि करूं क्या। फिर बेटे और पत्नी को लेकर सामान छत पर चढ़ाने लगा। करीब आधे घंटे भी नहीं हुए थे कि राप्ती के सैलाब में गांव डूब गया और सब कुछ आंखों के सामने ही बर्बाद हो गया।

यह दर्दनाक दास्तां उत्तरासोत में बाढ़ से घिरे उत्तरासोत व मंझरिया गांव के कई लोगों ने बयां की। रेल की पटरियां के बगल पगड़ंडी से होकर ‘अमर उजाला’ की टीम टूटी सड़कों और पानी से होकर गांव में पहुंची तो वहां के लोग दहशतजदां दिखे। उत्तरासोत गांव के ही राजदेव निषाद कहते हैं, सामान हटाने के लिए वक्त ही नहीं मिला। गांव में कई बार बाढ़ आई है लेकिन इस बाढ़ को देखकर रूह कांप गई। कभी तीन से चार फीट तो कभी पांच फीट से ज्यादा ऊंची लहरें उठ रही थीं। जिस जगह बांध टूटा है उसके सामने का गांव होने से पानी बड़ी तेजी से गांव में घुसा। पानी की रफ्तार देखकर अनाज, भूसा, जलौनी लकड़ी, गोइंठा यह सब तो नीचे ही छोड़कर छत पर आ गए। गांव में ही बीच के टोले की शारदा कहती हैं, मेरा कच्चा घर गिरा गया। कुछ अनाज और भूसा था, पता नहीं बचा है कि बह गया। साहब, मेरा तो सब कुछ बर्बाद हो गया। सरकार से कुछ मदद दिलवा दीजिए। मंझरिया गांव के संत प्रसाद प्रशासन पर नाराजगी जताते हुए कहते हैं, बाबू बांध जानबूझकर काटा गया है। सारा पानी हम लोगों के गांव में आ जाएगा और उधर नौसड़ के पास बांध कटने नहीं पाएगा। गनीमत थी कि बांध सुबह जब कटा तो लोग जगे थे वर्ना जिस तरह बहाव था, रात में पानी आतो तो बहुत लोग बह जाते।
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