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समाजवादी गढ़ में ईवीएम से गायब रहे साइकिल निशान 17-38-58
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समाजवादी गढ़ में ईवीएम से गायब रहेगी ‘साइकिल’
तीनों लोकसभा सीटों पर गठबंधन से लड़ रहे बसपा उम्मीदवार
जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह जैसे समाजवादी नेताओं की कर्मभूमि रही देवरिया
सोशलिस्ट पार्टी ने ही दिया था जिले को पहला सांसद
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। पूर्वांचल की सियासत में देवरिया की पहचान समाजवादी गढ़ के रुप में रही है। जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह सरीखे तमाम समाजवादी नेताओं का यहां से सीधा जुड़ाव रहा है। समाजवादी पार्टी के कई बड़े पदों पर आज भी देवरिया के लोग ही काबिज हैं, मगर लोकसभा के इस चुनावी समर में यह पहला मौका है, जब सपा मैदान से ही ‘गायब’ है। जिले के अंतर्गत आने वाली तीनों लोकसभा सीटों में कहीं भी सपा प्रत्यक्ष रुप से चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही। कार्यकर्ता भले ही गठबंधन के दूसरे साथी बसपा के समर्थन में पार्टी का झंडा-डंडा लेकर आवाज बुलंद करने में लगे हैं, मगर ईवीएम में ‘साइकिल’ निशान नहीं होने की कसक उन्हें साल रही है।
वर्ष 1992 में सपा की स्थापना के बाद के हर चुनाव में समाजवादी धड़े के लोगों ने बढ़-चढ़कर प्रत्यक्ष रुप से हिस्सेदारी निभाई है। सपा के सिंबल पर मोहन सिंह देवरिया सदर सीट से तीन दफा सांसद चुने गए। छोटे लोहिया के रुप में मशहूर जनेश्वर मिश्र सलेमपुर से चुनाव लड़ चुके हैं। सलेमपुर से ही चार बार सांसद रहे हरिकेवल प्रसाद भी लंबे समय तक सपा से जुड़कर राजनीति करते रहे। राजनीतिक विरोधी भी इससे इन्कार नहीं करते कि जिले में आज भी सपा का मजबूत कॉडर है, बावजूद इस बार मैदान में कहीं भी सपा प्रत्यक्ष रूप से नहीं है। गठबंधन के चलते जिले के अंतर्गत आने वाली तीनों लोकसभा सीट बसपा के हिस्से में गई है। लिहाजा पार्टी के नेता झंडा-बैनर लेकर प्रचार तो कर रहे हैं, लेकिन वोट साइकिल के लिए नहीं मांग रहे हैं। यही कारण है कि उनके प्रचार में वह जोश और उत्साह नजर नहीं आ रहे। नाम न छापने की शर्त पर सपा नेताओं का कहना था कि अरसे से वह साइकिल पर मुहर लगाते और ईवीएम का बटन दबाते आ रहे हैं, मगर यह पहली बार होगा, जब ईवीएम में यह निशान ही नहीं रहेगा।
पहले चुनाव से ही था समाजवादी विचारधारा का प्रभाव
चाहे वर्ष 1952 का पहला चुनाव हो या 2014 का पिछला चुनाव। समाजवादी विचारधारा देवरिया सीट पर शुरू से हावी रही है। पहले चुनाव में ही समाजवादी रामजी वर्मा ने देवरिया पूर्वी से कांग्रेस को शिकस्त देकर सोशलिस्ट पार्टी का परचम लहराया था। तब यहां से तीन सांसद चुने जाते थे। दूसरे चुनाव में भी सोशलिस्ट ने बाजी मारी। मजबूत गढ़ होने के कारण ही तत्कालीन प्रजावादी सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक मेहता ने संसद पहुंचने के लिए देवरिया सीट को चुना था। हालांकि जाति को लेकर फैलाई गई एक अफवाह के चलते वह मात खा गए। इसके बाद के चुनावों में भी सोशलिस्ट, गैर कांग्रेसी दलों का वर्चस्व रहा है, जिसका नेतृत्व समाजवादी विचारधारा के नेता उग्रसेन सिंह, रामायन राय जैसे नेताओं ने किया।
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तीनों लोकसभा सीटों पर गठबंधन से लड़ रहे बसपा उम्मीदवार
जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह जैसे समाजवादी नेताओं की कर्मभूमि रही देवरिया
सोशलिस्ट पार्टी ने ही दिया था जिले को पहला सांसद
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। पूर्वांचल की सियासत में देवरिया की पहचान समाजवादी गढ़ के रुप में रही है। जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह सरीखे तमाम समाजवादी नेताओं का यहां से सीधा जुड़ाव रहा है। समाजवादी पार्टी के कई बड़े पदों पर आज भी देवरिया के लोग ही काबिज हैं, मगर लोकसभा के इस चुनावी समर में यह पहला मौका है, जब सपा मैदान से ही ‘गायब’ है। जिले के अंतर्गत आने वाली तीनों लोकसभा सीटों में कहीं भी सपा प्रत्यक्ष रुप से चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही। कार्यकर्ता भले ही गठबंधन के दूसरे साथी बसपा के समर्थन में पार्टी का झंडा-डंडा लेकर आवाज बुलंद करने में लगे हैं, मगर ईवीएम में ‘साइकिल’ निशान नहीं होने की कसक उन्हें साल रही है।
वर्ष 1992 में सपा की स्थापना के बाद के हर चुनाव में समाजवादी धड़े के लोगों ने बढ़-चढ़कर प्रत्यक्ष रुप से हिस्सेदारी निभाई है। सपा के सिंबल पर मोहन सिंह देवरिया सदर सीट से तीन दफा सांसद चुने गए। छोटे लोहिया के रुप में मशहूर जनेश्वर मिश्र सलेमपुर से चुनाव लड़ चुके हैं। सलेमपुर से ही चार बार सांसद रहे हरिकेवल प्रसाद भी लंबे समय तक सपा से जुड़कर राजनीति करते रहे। राजनीतिक विरोधी भी इससे इन्कार नहीं करते कि जिले में आज भी सपा का मजबूत कॉडर है, बावजूद इस बार मैदान में कहीं भी सपा प्रत्यक्ष रूप से नहीं है। गठबंधन के चलते जिले के अंतर्गत आने वाली तीनों लोकसभा सीट बसपा के हिस्से में गई है। लिहाजा पार्टी के नेता झंडा-बैनर लेकर प्रचार तो कर रहे हैं, लेकिन वोट साइकिल के लिए नहीं मांग रहे हैं। यही कारण है कि उनके प्रचार में वह जोश और उत्साह नजर नहीं आ रहे। नाम न छापने की शर्त पर सपा नेताओं का कहना था कि अरसे से वह साइकिल पर मुहर लगाते और ईवीएम का बटन दबाते आ रहे हैं, मगर यह पहली बार होगा, जब ईवीएम में यह निशान ही नहीं रहेगा।
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पहले चुनाव से ही था समाजवादी विचारधारा का प्रभाव
चाहे वर्ष 1952 का पहला चुनाव हो या 2014 का पिछला चुनाव। समाजवादी विचारधारा देवरिया सीट पर शुरू से हावी रही है। पहले चुनाव में ही समाजवादी रामजी वर्मा ने देवरिया पूर्वी से कांग्रेस को शिकस्त देकर सोशलिस्ट पार्टी का परचम लहराया था। तब यहां से तीन सांसद चुने जाते थे। दूसरे चुनाव में भी सोशलिस्ट ने बाजी मारी। मजबूत गढ़ होने के कारण ही तत्कालीन प्रजावादी सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक मेहता ने संसद पहुंचने के लिए देवरिया सीट को चुना था। हालांकि जाति को लेकर फैलाई गई एक अफवाह के चलते वह मात खा गए। इसके बाद के चुनावों में भी सोशलिस्ट, गैर कांग्रेसी दलों का वर्चस्व रहा है, जिसका नेतृत्व समाजवादी विचारधारा के नेता उग्रसेन सिंह, रामायन राय जैसे नेताओं ने किया।
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