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‘दिल से लिखता हूं, तभी बच्चे के साथ बुजुर्ग भी थिरकते हैं’
अमर उजाला/गाोरख्ापुर
Updated Sun, 07 Oct 2018 09:52 PM IST
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मनोज मुंतशिर।
- फोटो : amar ujala
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गोरखपुर। गीतकार और कहानीकार मनोज मुंतशिर ने रविवार को गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट ‘शब्द-संवाद’ की महफिल लूट ली। युवाओं के बीच अपनी सफलता की कहानी सुनाई। कहा कि गौरीगंज अमेठी में भैंस की पूंछ मरोड़कर पला-बढ़ा हूं। दिल से लिखता हूं, जो कान से होकर दिमाग और दिल को छू जाता है। ... मेरे रश्के कमर को नए अंदाज में पेश किया है। इस गीत पर छोटे बच्चे, युवा और बुजुर्ग भी थिरकते हैं।
सेंट एंड्रयूज डिग्री कॉलेज में पिता शिव प्रताप शुक्ला और मां प्रेमा शुक्ला के साथ आए मनोज मुंतशिर ने युवाओं का हौसला बढ़ाया। कहा कि जब तक कोई बैठने को न कहे तब तक खड़े रहें। मुकाम हासिल करें, फिर बराबर में बैठने की कोशिश करें। यही मैंने किया है। मुंबई मायानगरी है। ग्लैमर के चक्कर में न पड़ें। आपके पास कुछ कहने और बताने को हो, तभी मुंबई जाएं। आप जितना पढ़ेंगे, उतना ही अच्छा लिखेंगे। पढ़ना भरना और लिखना छलकना है। भाषा वही अच्छी है, जो सामान्य व्यक्ति की समझ में आए। अब गाने में भी इसी पैटर्न पर लिखे जा रहे हैं। उन्होंने नए गीतकारों को उर्दू पढ़ने और समझने की सलाह दी।
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सेंट एंड्रयूज डिग्री कॉलेज में पिता शिव प्रताप शुक्ला और मां प्रेमा शुक्ला के साथ आए मनोज मुंतशिर ने युवाओं का हौसला बढ़ाया। कहा कि जब तक कोई बैठने को न कहे तब तक खड़े रहें। मुकाम हासिल करें, फिर बराबर में बैठने की कोशिश करें। यही मैंने किया है। मुंबई मायानगरी है। ग्लैमर के चक्कर में न पड़ें। आपके पास कुछ कहने और बताने को हो, तभी मुंबई जाएं। आप जितना पढ़ेंगे, उतना ही अच्छा लिखेंगे। पढ़ना भरना और लिखना छलकना है। भाषा वही अच्छी है, जो सामान्य व्यक्ति की समझ में आए। अब गाने में भी इसी पैटर्न पर लिखे जा रहे हैं। उन्होंने नए गीतकारों को उर्दू पढ़ने और समझने की सलाह दी।
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अब युवाओं के लिए लिखे जा रहे गाने
मनोज ने कहा कि अब गाने 13 से 33 वर्ष के लोगों के लिए लिखे जा रहे हैं। इसका दु:ख है लेकिन निर्माता-निर्देशक इससे कम या फिर उससे ऊपर की उम्र वालों के लिए गीत लिखने की बात नहीं करते। माना जा रहा है, इसी उम्र के लोग गाने को सुनते और उसपर थिरकते हैं।
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