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कन्हैया का तांगा-देवरिया
Updated Tue, 19 Dec 2017 10:39 PM IST
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सुरेंद्र वत्स
रुद्रपुर। उड़ें जब-जब जुल्फें तेरी.....। 60 के दशक में आई दिलीप कुमार की फिल्म नया दौर आपने भले न देखी हो लेकिन उसका यह गीत तो सुना ही होगा। जिन्होंने देखी होगी, उन्हें रुद्रपुर-पिड़रा मार्ग पर दौड़ते कन्हैया के तांगे को देखकर फिल्म में बस के मुकाबले तांगा दौड़ाते शंकर (दिलीप कुमार) की याद जरूर आती होगी। खास बात यह कि कन्हैया एक तरह से यह दौड़ रोज जीतते हैं। टैक्सी-टेम्पो के होते हुए भी लोग यदि उनके टमटम में बैठने को लालायित दिखते हों तो यह कन्हैया की जीत ही तो है। और यह सिलसिला 40 साल से जारी है।
नया दौर अपने जमाने की हिट फिल्म थी। यह मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण मानव से रोजगार छिनने पर छिड़े संघर्ष और मशीन पर मानव के जीत की कहानी पर आधारित थी। जमींदार का बेटा जीवन बस ले आता है। यह तांगेवालों की रोजी के लिए खतरा था। जीवन शर्त लगाता है यदि तांगा बस से पहले गांव पहुंच सके तो बस बंद कर दी जाएगी। शंकर का तांगा यह दौड़ जीत लेता है। रुद्रपुर में कहानी ठीक वही नहीं है लेकिन यहां प्रतिस्पर्धा के लिए करीब 30 टैक्सी और इतने ही टेंपो तो हैं ही। तेज रफ्तार इन साधनों की भीड़ के बीच कन्हैया का इकलौता तांगा शान से खड़ा होता है। इसकी वजह भी है। रुद्रपुर-पिड़रा मार्ग की तमाम सवारियां हैं जिन्हें इसी तांगे का इंतजार रहता है। उनके लिए इसमें सफर करना अलग ही आनंद देता है।
अठन्नी से दस रुपये तक का सफर
तांगे की कमाई से परिवार चलाने वाले कन्हैया ने जब शुरुआत की थी तो प्रति सवारी अठन्नी किराया लेते थे। वर्षों रुद्रपुर से देवरिया और गौरीबाजार मार्ग पर तांगा चला। तब यहां यातायात के साधन थे। साधन बढ़े तो ये मार्ग छोड़ दिया क्योंकि यह दूरी करीब 20 किमी होती थी। बाद में नया मार्ग पकड़ा और अब दस रुपये में एक सवारी को रुद्रपुर से पिड़रा (करीब 10 किमी) पहुंचा रहे हैं। उन्होंने तांगे में भी आडियो सिस्टम भी लगा दिया है। लोग रास्ते भर गाने सुनते रहते हैं।
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रुद्रपुर। उड़ें जब-जब जुल्फें तेरी.....। 60 के दशक में आई दिलीप कुमार की फिल्म नया दौर आपने भले न देखी हो लेकिन उसका यह गीत तो सुना ही होगा। जिन्होंने देखी होगी, उन्हें रुद्रपुर-पिड़रा मार्ग पर दौड़ते कन्हैया के तांगे को देखकर फिल्म में बस के मुकाबले तांगा दौड़ाते शंकर (दिलीप कुमार) की याद जरूर आती होगी। खास बात यह कि कन्हैया एक तरह से यह दौड़ रोज जीतते हैं। टैक्सी-टेम्पो के होते हुए भी लोग यदि उनके टमटम में बैठने को लालायित दिखते हों तो यह कन्हैया की जीत ही तो है। और यह सिलसिला 40 साल से जारी है।
नया दौर अपने जमाने की हिट फिल्म थी। यह मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण मानव से रोजगार छिनने पर छिड़े संघर्ष और मशीन पर मानव के जीत की कहानी पर आधारित थी। जमींदार का बेटा जीवन बस ले आता है। यह तांगेवालों की रोजी के लिए खतरा था। जीवन शर्त लगाता है यदि तांगा बस से पहले गांव पहुंच सके तो बस बंद कर दी जाएगी। शंकर का तांगा यह दौड़ जीत लेता है। रुद्रपुर में कहानी ठीक वही नहीं है लेकिन यहां प्रतिस्पर्धा के लिए करीब 30 टैक्सी और इतने ही टेंपो तो हैं ही। तेज रफ्तार इन साधनों की भीड़ के बीच कन्हैया का इकलौता तांगा शान से खड़ा होता है। इसकी वजह भी है। रुद्रपुर-पिड़रा मार्ग की तमाम सवारियां हैं जिन्हें इसी तांगे का इंतजार रहता है। उनके लिए इसमें सफर करना अलग ही आनंद देता है।
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अठन्नी से दस रुपये तक का सफर
तांगे की कमाई से परिवार चलाने वाले कन्हैया ने जब शुरुआत की थी तो प्रति सवारी अठन्नी किराया लेते थे। वर्षों रुद्रपुर से देवरिया और गौरीबाजार मार्ग पर तांगा चला। तब यहां यातायात के साधन थे। साधन बढ़े तो ये मार्ग छोड़ दिया क्योंकि यह दूरी करीब 20 किमी होती थी। बाद में नया मार्ग पकड़ा और अब दस रुपये में एक सवारी को रुद्रपुर से पिड़रा (करीब 10 किमी) पहुंचा रहे हैं। उन्होंने तांगे में भी आडियो सिस्टम भी लगा दिया है। लोग रास्ते भर गाने सुनते रहते हैं।
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