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दलालों के संक्रमण से महिला अस्पताल बीमार
Updated Wed, 06 Sep 2017 01:52 AM IST
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आशुतोष मिश्र
गोरखपुर।
एक रुपये में इलाज मुहैया कराने की सरकारी कोशिशों पर दलाल भारी पड़ रहे हैं। मुमकिन है अस्पताल परिसर में आपके मोबाइल का नेटवर्क धोखा दे जाए लेकिन दलालों के नेटवर्क से आप शायद ही बच पाएं। इसमें फंसकर रोजाना कई मरीज ठगे जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं। अस्पताल में लैब होने के बावजूद ये दलाल मरीजों को निजी पैथोलाजी में ले जाकर उनका आर्थिक दोहन करते हैं। निजी पैथोलाजी से जुड़े इन दलालों की यहां के स्टाफ और ऊपर के लोगों से भी जबरदस्त साठगांठ है और इनकी पहुंच और हनक ओपीडी से लेकर वार्डों तक में दिखती है। इससे न सिर्फ मरीजों की जेब ढीली हो रही है बल्कि अस्पताल प्रशासन और शासन की साख पर भी बट्टा लग रहा है। ऐसे में दलालों के संक्रमण से बीमार महिला अस्पताल को ‘कड़वी दवा’ की दरकार है।
मियां बाजार उत्तरी फाटक से शालू डिलेवरी कराने के लिए यहां भर्ती हैं। शालू ने बताया कि डॉक्टर ने भर्ती करने से पहले कुछ जांचें लिखीं। जांचें अस्पताल की पैथोलॉजी से कराईं। जब जांच रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास पहुंचे तो बाहर से दोबारा जांच कराने के लिए कह दिया गया। कारण पूछने पर बाहर की जांच रिपोर्ट को सटीक और स्पष्ट होने की बात कही गई। डॉक्टर ने जब बाहर से जांच कराए बिना ऑपरेशन करने से इन्कार कर दिया तो मजबूरी में मरीज ने जांचें उनके बताए मुताबिक पैथोलॉजी से कराईं। बसंतपुर की रिंकी महिला अस्पताल में डिलेवरी के बाद से ही भर्ती हैं। प्रसव से पहले डॉक्टर ने जांचें लिखीं। बताया गया कि जांच बाहर करानी होगी, दवाएं यहीं मिल जाएंगी। मजबूरी में बाहर से जांच करानी पड़ी, तब जाकर ऑपरेशन हुआ।
205 में से 141 बेड ही चालू हालत में
अव्यवस्था का आलम ये है कि 205 बेड वाले महिला अस्पताल की क्षमता ब़ढ़ने के बजाय घट गई है, जबकि मरीजों की तादाद लगातार बढ़ रही है। करीब दो साल पहले स्वास्थ्य विभाग की ओर से सात मंजिला भवन का निर्माण शुरू हुआ तो महिला अस्पताल के रैंप क्षतिग्रस्त हो गए। इसके चलते 64 बेड उपयोग के लायक नहीं रह गए।1908 में स्थापित महिला अस्पताल मरीजों के बोझ से कराह रहा है। शहर का दायरा तब से अब तक दस गुना से ज्यादा बढ़ चुका है, जबकि महिलाओं के इलाज के लिए बना यह अस्पताल अब भी इकलौता है। अस्पताल में न बेड बढ़े न डॉक्टरों और पैरा मेडिकल स्टाफ की संख्या। हालांकि, महिला अस्पताल प्रशासन जल्द ही बेकार पड़े बेडों को उपयोग लायक बनाकर मौजूदा बेड क्षमता को मेंटेन करने की बात कह रहा है। लेकिन ई-टेंडरिंग की नई व्यवस्था के जरिए ये मुमकिन होने के चलते इसमें देर हो रही है।
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एसएनसीयू बना, नहीं हो सका शुरू
महिला अस्पताल में नवजात के बेहतर इलाज के लिए शासन के आदेश पर एसएनसीयू (सिक न्यू बार्न केयर यूनिट) बनी। इसमें 12 वार्मर भी लगाए गए। लाखों रुपये खर्च करके यहां नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) जैसी सुविधा देने का प्रयास किया गया, लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने यहां के लिए स्टाफ की तैनाती नहीं की। इसके चलते यहां नवजातों को बेहतर इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही है। एसएनसीयू सक्रिय होता तो कई नवजात मेडिकल कॉलेज रेफर नहीं होते।
डॉक्टरों की कमी बढ़ा रही परेशानी
महिला अस्पताल में डॉक्टरों के 18 पद स्वीकृत हैं, लेकिन तैनाती सिर्फ 10 की है। छह चिकित्सक संविदा पर तैनात हैं। स्वीकृत पदों की संख्या में दशकों से कोई बदलाव नहीं हुआ है, जबकि इस बीच मरीजों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। ऐसे हाल में मरीजों को यहां बेहतर इलाज नहीं मिल पा रहा है। आलम यह है कि आयुर्वेद के दो डॉक्टर यहां ओपीडी में मरीजों को दवाएं लिख रहे हैं। स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों के छह पद यहां काफी समय से खाली चल रहे हैं।
पैथोलॉजी में भी स्टाफ की कमी
महिला अस्पताल की लैब में पैथोलॉजिस्ट की भी कमी है। हालांकि स्वीकृत पद एक ही है, लेकिन इसके सहारे व्यवस्था संचालित करना संभव नहीं है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने इसलिए यहां चार अन्य पैथोलॉजिस्ट को संबद्ध कर रखा है। स्टाफ नर्स के 20 स्वीकृत पदों में से एक खाली है। इसके अलावा संविदा की 14 नर्सों की तैनाती महिला अस्पताल में है।
अल्ट्रासाउंड में लंबी वेटिंग
जिले में सभी गर्भवतियों की अल्ट्रासाउंड जांच महिला अस्पताल के अल्ट्रासाउंड सेंटर में ही होती है। ऐसे में यहां लोड काफी ज्यादा है, लेकिन स्टाफ कम। सिर्फ एक रेडियोलॉजिस्ट होने के चलते हर रोज सिर्फ 50 अल्ट्रासाउंड ही हो पाते हैं, जबकि इससे ज्यादा मरीज अल्ट्रासाउंड के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में महिला अस्पताल के अल्ट्रासाउंड सेंटर में वेटिंग लिस्ट बढ़ती जा रही है। पुराने मरीज को प्राथमिकता पर रखकर अल्ट्रासाउंड किया जाता है। लंबी वेटिंग देखकर कई मरीज निजी सेंटरों पर जांच कराने को मजबूर हैं।
कमीशनखोरी बढ़ा रही परेशानी
महिला अस्पताल की ओपीडी के ऊपर लैब है। इसमें हार्मोनल जांचों को छोड़कर लगभग सभी जरूरी जांचें होती हैं। इसके बाद भी अस्पताल से हर रोज काफी संख्या में मरीज वहीं जांचें बाहर से निजी पैथोलॉजी में कराने के लिए मजबूर हैं जो ओपीडी के ऊपर की लैब में होती हैं। अस्पताल की लैब से जुड़े एक कर्मचारी ने बताया कि कमीशनखोरी के चलते मरीजों को गुमराह करके बाहर की पैथोलॉजी में भेज दिया जाता है। सूत्रों की माने तो इस खेल में डॉक्टर से लेकर कुछ कर्मचारी तक संलिप्त हैं।
एंबुलेंस पार्किंग की जगह नहीं खाली
महिला अस्पताल में एंबुलेंस पार्किंग की जगह पर बाइकें खड़ी रहती हैं। दरअसल, पार्किंग के लिए जगह कम होने से गेट के भीतर जहां-तहां गाड़ियां खड़ी की जाती हैं। इसके चलते अक्सर यहां ऐसे हालात रहते हैं कि एंबुलेंस भी गेट के भीतर ला पाना कठिन होता है। एंबुलेंस पार्किंग की तरह की विकलांग पार्किंग की जगह पर भी बाइक का कब्जा रहता है। ऐसे में ट्राइसिकिल लेकर आए विकलांग परेशान होते हैं। उन्हें दूर कहीं पार्किंग की जगह तलाश कर अपनी ट्राइसिकिल खड़ी करनी पड़ती है।
कोट-
दलालों को चिह्नित करके उनकी धरपकड़ की जाएगी। पिछले दिनों दो दलालों को पकड़ा गया था। वहीं, मरीजों की सुविधा के लिए ओपीडी और इंडोर के लिए अलग दवा वितरण की व्यवस्था लागू की गई है। इसके तहत ओपीडी में दो टीवी लगाई गई है। इसकी स्क्रीन पर ड्रग स्टोर में मौजूद दवाओं की सूची चलती रहेगी। इससे मरीज अस्पताल में मौजूद दवाओं की जानकारी पा सकेंगे। इसके साथ ही महिला स्वास्थ्य से जुड़ी चीजें भी इस पर प्रसारित होंगी। महिला अस्पताल के लेबर रूम का नवीनीकरण करा रहे हैं। गद्दे, चादर नई लगवाई गई हैं। पार्टीशन कराया गया है। तीन एसी भी मंगाए गए हैं। पहले छह टेबल थी। इसकी जगह अब बड़े साइज की 10 टेबल लेबर रूम में लगाई गई हैं।
- डॉ. डीके सोनकर, एसआईसी
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स्पीकअप
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अस्पताल की रिपोर्ट को नहीं माना
अपने रिश्तेदार की डिलेवरी कराने महिला अस्पताल आए थे। डॉक्टर ने कुछ जांच कराने के लिए कहा। इस पर रिश्तेदार महिला अस्पताल के लैब ले गए। जांच कराई। रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास गए तो उन्होंने इसे न मानते हुए निजी पैथोलॉजी में जांच कराने के लिए कहा। मजबूरी में निजी पैथोलॉजी से जांच कराई।
- झीनक, मियां बाजार
डॉक्टर ने जांच कराने बाहर भेजा
महिला अस्पताल में पत्नी को डिलेवरी के लिए लेकर आया। डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए कहा। कुछ जांच लिखी। इसके साथ ही उन्होंने इन जांचों के लिए बाहर की एक निजी पैथोलॉजी जाने का सुझाव दिया। जब उनसे पूछा कि क्या यह जांचें अस्पताल में नहीं होंगी तो उन्होंने निजी पैथोलॉजी की जांच को सटीक बताया।
- शैलेंद्र कुमार निषाद, बसंतपुर
गोरखपुर।
एक रुपये में इलाज मुहैया कराने की सरकारी कोशिशों पर दलाल भारी पड़ रहे हैं। मुमकिन है अस्पताल परिसर में आपके मोबाइल का नेटवर्क धोखा दे जाए लेकिन दलालों के नेटवर्क से आप शायद ही बच पाएं। इसमें फंसकर रोजाना कई मरीज ठगे जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं। अस्पताल में लैब होने के बावजूद ये दलाल मरीजों को निजी पैथोलाजी में ले जाकर उनका आर्थिक दोहन करते हैं। निजी पैथोलाजी से जुड़े इन दलालों की यहां के स्टाफ और ऊपर के लोगों से भी जबरदस्त साठगांठ है और इनकी पहुंच और हनक ओपीडी से लेकर वार्डों तक में दिखती है। इससे न सिर्फ मरीजों की जेब ढीली हो रही है बल्कि अस्पताल प्रशासन और शासन की साख पर भी बट्टा लग रहा है। ऐसे में दलालों के संक्रमण से बीमार महिला अस्पताल को ‘कड़वी दवा’ की दरकार है।
मियां बाजार उत्तरी फाटक से शालू डिलेवरी कराने के लिए यहां भर्ती हैं। शालू ने बताया कि डॉक्टर ने भर्ती करने से पहले कुछ जांचें लिखीं। जांचें अस्पताल की पैथोलॉजी से कराईं। जब जांच रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास पहुंचे तो बाहर से दोबारा जांच कराने के लिए कह दिया गया। कारण पूछने पर बाहर की जांच रिपोर्ट को सटीक और स्पष्ट होने की बात कही गई। डॉक्टर ने जब बाहर से जांच कराए बिना ऑपरेशन करने से इन्कार कर दिया तो मजबूरी में मरीज ने जांचें उनके बताए मुताबिक पैथोलॉजी से कराईं। बसंतपुर की रिंकी महिला अस्पताल में डिलेवरी के बाद से ही भर्ती हैं। प्रसव से पहले डॉक्टर ने जांचें लिखीं। बताया गया कि जांच बाहर करानी होगी, दवाएं यहीं मिल जाएंगी। मजबूरी में बाहर से जांच करानी पड़ी, तब जाकर ऑपरेशन हुआ।
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205 में से 141 बेड ही चालू हालत में
अव्यवस्था का आलम ये है कि 205 बेड वाले महिला अस्पताल की क्षमता ब़ढ़ने के बजाय घट गई है, जबकि मरीजों की तादाद लगातार बढ़ रही है। करीब दो साल पहले स्वास्थ्य विभाग की ओर से सात मंजिला भवन का निर्माण शुरू हुआ तो महिला अस्पताल के रैंप क्षतिग्रस्त हो गए। इसके चलते 64 बेड उपयोग के लायक नहीं रह गए।1908 में स्थापित महिला अस्पताल मरीजों के बोझ से कराह रहा है। शहर का दायरा तब से अब तक दस गुना से ज्यादा बढ़ चुका है, जबकि महिलाओं के इलाज के लिए बना यह अस्पताल अब भी इकलौता है। अस्पताल में न बेड बढ़े न डॉक्टरों और पैरा मेडिकल स्टाफ की संख्या। हालांकि, महिला अस्पताल प्रशासन जल्द ही बेकार पड़े बेडों को उपयोग लायक बनाकर मौजूदा बेड क्षमता को मेंटेन करने की बात कह रहा है। लेकिन ई-टेंडरिंग की नई व्यवस्था के जरिए ये मुमकिन होने के चलते इसमें देर हो रही है।
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महिला अस्पताल में नवजात के बेहतर इलाज के लिए शासन के आदेश पर एसएनसीयू (सिक न्यू बार्न केयर यूनिट) बनी। इसमें 12 वार्मर भी लगाए गए। लाखों रुपये खर्च करके यहां नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) जैसी सुविधा देने का प्रयास किया गया, लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने यहां के लिए स्टाफ की तैनाती नहीं की। इसके चलते यहां नवजातों को बेहतर इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही है। एसएनसीयू सक्रिय होता तो कई नवजात मेडिकल कॉलेज रेफर नहीं होते।
डॉक्टरों की कमी बढ़ा रही परेशानी
महिला अस्पताल में डॉक्टरों के 18 पद स्वीकृत हैं, लेकिन तैनाती सिर्फ 10 की है। छह चिकित्सक संविदा पर तैनात हैं। स्वीकृत पदों की संख्या में दशकों से कोई बदलाव नहीं हुआ है, जबकि इस बीच मरीजों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। ऐसे हाल में मरीजों को यहां बेहतर इलाज नहीं मिल पा रहा है। आलम यह है कि आयुर्वेद के दो डॉक्टर यहां ओपीडी में मरीजों को दवाएं लिख रहे हैं। स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों के छह पद यहां काफी समय से खाली चल रहे हैं।
पैथोलॉजी में भी स्टाफ की कमी
महिला अस्पताल की लैब में पैथोलॉजिस्ट की भी कमी है। हालांकि स्वीकृत पद एक ही है, लेकिन इसके सहारे व्यवस्था संचालित करना संभव नहीं है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने इसलिए यहां चार अन्य पैथोलॉजिस्ट को संबद्ध कर रखा है। स्टाफ नर्स के 20 स्वीकृत पदों में से एक खाली है। इसके अलावा संविदा की 14 नर्सों की तैनाती महिला अस्पताल में है।
अल्ट्रासाउंड में लंबी वेटिंग
जिले में सभी गर्भवतियों की अल्ट्रासाउंड जांच महिला अस्पताल के अल्ट्रासाउंड सेंटर में ही होती है। ऐसे में यहां लोड काफी ज्यादा है, लेकिन स्टाफ कम। सिर्फ एक रेडियोलॉजिस्ट होने के चलते हर रोज सिर्फ 50 अल्ट्रासाउंड ही हो पाते हैं, जबकि इससे ज्यादा मरीज अल्ट्रासाउंड के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में महिला अस्पताल के अल्ट्रासाउंड सेंटर में वेटिंग लिस्ट बढ़ती जा रही है। पुराने मरीज को प्राथमिकता पर रखकर अल्ट्रासाउंड किया जाता है। लंबी वेटिंग देखकर कई मरीज निजी सेंटरों पर जांच कराने को मजबूर हैं।
कमीशनखोरी बढ़ा रही परेशानी
महिला अस्पताल की ओपीडी के ऊपर लैब है। इसमें हार्मोनल जांचों को छोड़कर लगभग सभी जरूरी जांचें होती हैं। इसके बाद भी अस्पताल से हर रोज काफी संख्या में मरीज वहीं जांचें बाहर से निजी पैथोलॉजी में कराने के लिए मजबूर हैं जो ओपीडी के ऊपर की लैब में होती हैं। अस्पताल की लैब से जुड़े एक कर्मचारी ने बताया कि कमीशनखोरी के चलते मरीजों को गुमराह करके बाहर की पैथोलॉजी में भेज दिया जाता है। सूत्रों की माने तो इस खेल में डॉक्टर से लेकर कुछ कर्मचारी तक संलिप्त हैं।
एंबुलेंस पार्किंग की जगह नहीं खाली
महिला अस्पताल में एंबुलेंस पार्किंग की जगह पर बाइकें खड़ी रहती हैं। दरअसल, पार्किंग के लिए जगह कम होने से गेट के भीतर जहां-तहां गाड़ियां खड़ी की जाती हैं। इसके चलते अक्सर यहां ऐसे हालात रहते हैं कि एंबुलेंस भी गेट के भीतर ला पाना कठिन होता है। एंबुलेंस पार्किंग की तरह की विकलांग पार्किंग की जगह पर भी बाइक का कब्जा रहता है। ऐसे में ट्राइसिकिल लेकर आए विकलांग परेशान होते हैं। उन्हें दूर कहीं पार्किंग की जगह तलाश कर अपनी ट्राइसिकिल खड़ी करनी पड़ती है।
कोट-
दलालों को चिह्नित करके उनकी धरपकड़ की जाएगी। पिछले दिनों दो दलालों को पकड़ा गया था। वहीं, मरीजों की सुविधा के लिए ओपीडी और इंडोर के लिए अलग दवा वितरण की व्यवस्था लागू की गई है। इसके तहत ओपीडी में दो टीवी लगाई गई है। इसकी स्क्रीन पर ड्रग स्टोर में मौजूद दवाओं की सूची चलती रहेगी। इससे मरीज अस्पताल में मौजूद दवाओं की जानकारी पा सकेंगे। इसके साथ ही महिला स्वास्थ्य से जुड़ी चीजें भी इस पर प्रसारित होंगी। महिला अस्पताल के लेबर रूम का नवीनीकरण करा रहे हैं। गद्दे, चादर नई लगवाई गई हैं। पार्टीशन कराया गया है। तीन एसी भी मंगाए गए हैं। पहले छह टेबल थी। इसकी जगह अब बड़े साइज की 10 टेबल लेबर रूम में लगाई गई हैं।
- डॉ. डीके सोनकर, एसआईसी
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स्पीकअप
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अस्पताल की रिपोर्ट को नहीं माना
अपने रिश्तेदार की डिलेवरी कराने महिला अस्पताल आए थे। डॉक्टर ने कुछ जांच कराने के लिए कहा। इस पर रिश्तेदार महिला अस्पताल के लैब ले गए। जांच कराई। रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास गए तो उन्होंने इसे न मानते हुए निजी पैथोलॉजी में जांच कराने के लिए कहा। मजबूरी में निजी पैथोलॉजी से जांच कराई।
- झीनक, मियां बाजार
डॉक्टर ने जांच कराने बाहर भेजा
महिला अस्पताल में पत्नी को डिलेवरी के लिए लेकर आया। डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए कहा। कुछ जांच लिखी। इसके साथ ही उन्होंने इन जांचों के लिए बाहर की एक निजी पैथोलॉजी जाने का सुझाव दिया। जब उनसे पूछा कि क्या यह जांचें अस्पताल में नहीं होंगी तो उन्होंने निजी पैथोलॉजी की जांच को सटीक बताया।
- शैलेंद्र कुमार निषाद, बसंतपुर