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दिन कट जा रहा, रात का सन्नाटा पड़ रहा भारी
Updated Wed, 23 Aug 2017 02:19 AM IST
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अरुण चन्द
गोरखपुर। पांच दिन हो गए बाढ़ से घिरे। पानी कम होने का क्रम भी जारी है, मगर अब भी मानीराम के आसपास के प्रभावित इलाकों में खौफ तारी है। रात को कानों तक जरा सी आवाज पहुंचते ही लोग चौंककर उठ जा रहे हैं। डर सता रहा है कि कहीं दोबारा तो पानी नहीं बढ़ने लगा। राहत सामग्री लेकर आती-जाती एनडीआरएफ और पीएसी की नावों की आहट से हर घर से आवाज उठती है। नाव के गुजर जाने के बाद हाथ लगे खाने के पैकेट व अन्य मदद के काफी-नाकाफी होने को लेकर घंटों छिड़ी बहस के बीच दिन तो कट जा रहा है, मगर पानी में फंसे हजारों लोगों के लिए रात काटना मुश्किल हो रहा है।
पीएसी की बोट देखकर कंधे तक पानी में घुसकर मदद मांगने दौड़ी मारवाणी कोठी की इंद्रावती की आंखें तब डबडबा आई जब पीएसी के रामबहादुर पूछ बैठे कि अम्मा कैसी हैं। दो मिनट बाद खुद को संभालते हुए बोली बाबू जो नुकसान हुआ सो हुआ, मगर अब वक्त नहीं कट रहा। रात के सन्नाटे की सायं-सायं और लहरों की आवाज डराती है। कभी सोचा न था ऐसा वक्त आएगा। पानी के और पाउच के लिए पीएसी जवानों से चिरौरी करती विशुनपुरा की स्मृति कहती हैं सबसे ज्यादा दिक्कत पानी की है। दो दिन पहले पड़ोस के लखना की तबीयत रात कोखराब हो गई। आसपास के पांचों घरों के लोग डर गए कि मदद कहां से मांगी जाए। पूरी रात लोग जगे रहे। सुबह हुई तो लोग नाव से उसे अस्पताल ले गए। दो सिलेंडर लेकर लौट रहे अमित, राहुल, अभिमन्यु और बलिराम ने बताया कि सिलेंडर मोहरीपुर से भराकर लौट रहे हैं। उनका घर दो तल का है। गांव के कई घरों के लोग वहीं आसरा लिए हैं। बोले, कौन अपना-कौन पराया। ऐसे वक्त में किसी को जाने के लिए हम कैसे कह सकते हैं।
उधर, लेखपाल रामकुमार गुप्ता के फोन पर घुलहवा बंधे के पास नाव से पार कराने में मदद के लिए पहुंचे गायघाट के प्रधान तेजनाथ पानी में घिरे गांव वालों की पीड़ा बयां करने लगे। बोले गांव के लोग हैं। दिनभर हाड़ तोड़ मेहनत करते हैं। शाम को खटिया पर गिरते ही आंख लग जाती है। जब से बाढ़ आई है एक ही जगह छत पर बैठे-बैठे लोगों की हालत खराब हो गई है। दिन तो किसी तरह कट जा रहा, मगर रात का वक्त काटे नहीं कट रहा। थोड़ी आंख लग भी रही है तो जरा सी आवाज पर चौंककर लोग उठ जा रहे हैं। किसी के जेहन में अब भी बांध कटने वाली रात का खौफ है तो किसी को परिवार और घर की चिंता। सांप-बिच्छू का डर अलग से।
गोरखपुर। पांच दिन हो गए बाढ़ से घिरे। पानी कम होने का क्रम भी जारी है, मगर अब भी मानीराम के आसपास के प्रभावित इलाकों में खौफ तारी है। रात को कानों तक जरा सी आवाज पहुंचते ही लोग चौंककर उठ जा रहे हैं। डर सता रहा है कि कहीं दोबारा तो पानी नहीं बढ़ने लगा। राहत सामग्री लेकर आती-जाती एनडीआरएफ और पीएसी की नावों की आहट से हर घर से आवाज उठती है। नाव के गुजर जाने के बाद हाथ लगे खाने के पैकेट व अन्य मदद के काफी-नाकाफी होने को लेकर घंटों छिड़ी बहस के बीच दिन तो कट जा रहा है, मगर पानी में फंसे हजारों लोगों के लिए रात काटना मुश्किल हो रहा है।
पीएसी की बोट देखकर कंधे तक पानी में घुसकर मदद मांगने दौड़ी मारवाणी कोठी की इंद्रावती की आंखें तब डबडबा आई जब पीएसी के रामबहादुर पूछ बैठे कि अम्मा कैसी हैं। दो मिनट बाद खुद को संभालते हुए बोली बाबू जो नुकसान हुआ सो हुआ, मगर अब वक्त नहीं कट रहा। रात के सन्नाटे की सायं-सायं और लहरों की आवाज डराती है। कभी सोचा न था ऐसा वक्त आएगा। पानी के और पाउच के लिए पीएसी जवानों से चिरौरी करती विशुनपुरा की स्मृति कहती हैं सबसे ज्यादा दिक्कत पानी की है। दो दिन पहले पड़ोस के लखना की तबीयत रात कोखराब हो गई। आसपास के पांचों घरों के लोग डर गए कि मदद कहां से मांगी जाए। पूरी रात लोग जगे रहे। सुबह हुई तो लोग नाव से उसे अस्पताल ले गए। दो सिलेंडर लेकर लौट रहे अमित, राहुल, अभिमन्यु और बलिराम ने बताया कि सिलेंडर मोहरीपुर से भराकर लौट रहे हैं। उनका घर दो तल का है। गांव के कई घरों के लोग वहीं आसरा लिए हैं। बोले, कौन अपना-कौन पराया। ऐसे वक्त में किसी को जाने के लिए हम कैसे कह सकते हैं।
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उधर, लेखपाल रामकुमार गुप्ता के फोन पर घुलहवा बंधे के पास नाव से पार कराने में मदद के लिए पहुंचे गायघाट के प्रधान तेजनाथ पानी में घिरे गांव वालों की पीड़ा बयां करने लगे। बोले गांव के लोग हैं। दिनभर हाड़ तोड़ मेहनत करते हैं। शाम को खटिया पर गिरते ही आंख लग जाती है। जब से बाढ़ आई है एक ही जगह छत पर बैठे-बैठे लोगों की हालत खराब हो गई है। दिन तो किसी तरह कट जा रहा, मगर रात का वक्त काटे नहीं कट रहा। थोड़ी आंख लग भी रही है तो जरा सी आवाज पर चौंककर लोग उठ जा रहे हैं। किसी के जेहन में अब भी बांध कटने वाली रात का खौफ है तो किसी को परिवार और घर की चिंता। सांप-बिच्छू का डर अलग से।
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