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सामुदायिक शौचालय: बाहर से चमाचम, अंदर बदहाल
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फोटो- 20- गोंडा के कमड़ावा पंचायत में बना सामुदायिक शौचालय। संवाद
- फोटो : GONDA
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रुपईडीह (गोंडा)। सामुदायिक शौचालय पर जिले में लगभग 86 करोड़ 87 लाख 20 हजार की धनराशि खर्च होने के बाद भी गांव की जनता को उन्हें लाभ नहीं मिल पा रहा है। जनपद के 16 विकास खंड में में स्वच्छ भारत मिशन के तहत प्रत्येक गांव में सामुदायिक शौचालय चार यूनिट तथा छह यूनिट बनाने के लिए सरकार ने 86 करोड़ 87 लाख 20 हजार रुपये खर्च किए। लगभग दो वर्षों से कार्य हो रहा है। लेकिन ग्रामीणों को सामुदायिक शौचालय का लाभ नहीं मिल पा रहा है। स्वच्छ भारत मिशन सरकार की प्राथमिकता में है, लेकिन जिम्मेदार मस्त हैं।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत जिले के सभी गांवों में सामुदायिक शौचालय बनाने का लक्ष्य है। किसी गांव में चार यूनिट व किसी गांव में छह यूनिट का शौचालय बनना था। दो साल से योजना चल रही है। लेकिन सभी गांवों में सामुदायिक शौचालय निर्माणाधीन है। जबकि, विभाग के अधिकारी 75 प्रतिशत गांवों में सामुदायिक शौचालय पूर्ण होने की बात कह रहे हैं। हकीकत ये है कि 80 प्रतिशत शौचालय पूर्ण ही नहीं हैं। किसी में टैंक नहीं बना तो किसी में पानी टंकी नहीं है। किसी में सीट ही नहीं बैठी। बाहर से चमाचम दिखने वाले शौचालय के अंदर अव्यवस्थाएं हैं।
सामुदायिक शौचालय की देखरेख के लिए कर्मचारी भी नियुक्त कर दिए गए हैं। जिन्हें प्रतिमाह छह हजार रुपये मानदेय तथा प्रत्येक तीन माह पर तीन हजार रुपये की धनराशि रखरखाव के लिए खर्च किया जा रहा है। जबकि 90 प्रतिशत ग्राम पंचायतों के सामुदायिक शौचालय आज भी अधूरे पड़े हैं। सामुदायिक शौचालय की बाहर से रंगाई पुताई कराकर अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम लिखकर फोटो अपलोड करके अधिकारियों की नजर में कार्य को पूरा दिखाने का खेल आज भी जारी है।
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सामुदायिक शौचालयों का निर्माण पंचायतों में कराया गया है। समूह के माध्यम से इनका संचालन होना है। पंचायतों से इसके संबंध में रिपोर्ट मांगी जा रही है। जहां खामियां हैं उसे ठीक कराया जाएगा। अभय प्रताप रमन, जिला समन्वयक, स्वच्छ भारत मिशन
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स्वच्छ भारत मिशन के तहत जिले के सभी गांवों में सामुदायिक शौचालय बनाने का लक्ष्य है। किसी गांव में चार यूनिट व किसी गांव में छह यूनिट का शौचालय बनना था। दो साल से योजना चल रही है। लेकिन सभी गांवों में सामुदायिक शौचालय निर्माणाधीन है। जबकि, विभाग के अधिकारी 75 प्रतिशत गांवों में सामुदायिक शौचालय पूर्ण होने की बात कह रहे हैं। हकीकत ये है कि 80 प्रतिशत शौचालय पूर्ण ही नहीं हैं। किसी में टैंक नहीं बना तो किसी में पानी टंकी नहीं है। किसी में सीट ही नहीं बैठी। बाहर से चमाचम दिखने वाले शौचालय के अंदर अव्यवस्थाएं हैं।
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सामुदायिक शौचालय की देखरेख के लिए कर्मचारी भी नियुक्त कर दिए गए हैं। जिन्हें प्रतिमाह छह हजार रुपये मानदेय तथा प्रत्येक तीन माह पर तीन हजार रुपये की धनराशि रखरखाव के लिए खर्च किया जा रहा है। जबकि 90 प्रतिशत ग्राम पंचायतों के सामुदायिक शौचालय आज भी अधूरे पड़े हैं। सामुदायिक शौचालय की बाहर से रंगाई पुताई कराकर अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम लिखकर फोटो अपलोड करके अधिकारियों की नजर में कार्य को पूरा दिखाने का खेल आज भी जारी है।
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सामुदायिक शौचालयों का निर्माण पंचायतों में कराया गया है। समूह के माध्यम से इनका संचालन होना है। पंचायतों से इसके संबंध में रिपोर्ट मांगी जा रही है। जहां खामियां हैं उसे ठीक कराया जाएगा। अभय प्रताप रमन, जिला समन्वयक, स्वच्छ भारत मिशन