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आस्था का केंद्र है रहिया देवी मंदिर
अमर उजाला/बलरामपुर
Updated Sun, 10 Apr 2016 11:30 PM IST
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मंदिर में स्थपित मूर्ति
- फोटो : अमर उजाला
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सोहेलवा जंगल स्थित रहिया देवी मंदिर थारू जनजाति की आस्था का प्रमुख केंद्र है। रहिया देवी को थारू जनजाति के लोग कुल देवी के रूप में पूजने के साथ क्षेत्रीय लोग वनदेवी के रूप में पूजा करते हैं। बताते हैं कि यह क्षेत्र पहले दारा शिकोह की राजधानी हुआ करता था इसीलिए बगल में बह रही नदी को दारा पहाड़ी नदी के रुप में जाना जाता है।
दुर्गम रास्तों के चलते आम दिनों में भीड़ कम होती है लेकिन नवरात्र के समय मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर में रहिया देवी के साथ काल भैरव, पंचमुखी हनुमान एवं अन्नपूर्णा देवी की पूजा-अर्चना के लिए नेपाल से भी श्रद्धालु यहां आते हैं।
बताया जाता हैं कि इस मंदिर का निर्माण थारु जनजाति के सरदारों द्वारा सैकड़ों वर्ष पूर्व कराया गया था। मंदिर का जीर्णोद्धार 2001 में कराया गया था।
थारु जनजाति के लोग रहिया देवी को कुल देवी मानते हैं। परंपरा के अनुसार थारु जनजाति के लोग अपने सभी शुभ कार्य रहिया देवी के दर्शन कर शुरू करते हैं। शादी-विवाह के बाद देवी का आशीर्वाद लेने भी मंदिर जरुर आते हैं।
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मुण्डन, कर्ण-छेदन व जनेऊ संस्कार भी मंदिर में ही होता है। नवरात्र में नौ दिन तक यहां मेला लगता है। मेले में थारु जनजाति के लोग बड़ी संख्या में हिस्सा लेते हैं। नौ दिन श्रद्धालु विधि विधान के साथ देवी की पूजा अर्चना करते हैं।
रात में होने वाले भंडारे में थारु जनजाति के लोग प्रसाद ग्रहण करने आते हैं। मंदिर के व्यवस्थापक हीरा लाल यादव के मुताबिक मंदिर की व्यवस्था में स्थानीय लोगों का भरपूर सहयोग मिल रहा है। मंदिर पहुंचने लिए पक्की सड़क निर्माण की मांग शासन-प्रशासन से की गई है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि रहिया देवी (वन देवी) से सच्चे मन से मांगी गईं मुरादें अवश्य पूर्ण होती है। इसी मान्यता के चलते गैसड़ी, पचपेड़वा, जरवा, बालापुर एवं तुलसीपुर के लोग अपनी मन्नतें लेकर रहिया देवी मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए आते है। पूजा-अर्चना कर भक्त वन देवी से मनवांछित फल प्राप्त करने का आशीर्वाद मांगते है।
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दुर्गम रास्तों के चलते आम दिनों में भीड़ कम होती है लेकिन नवरात्र के समय मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर में रहिया देवी के साथ काल भैरव, पंचमुखी हनुमान एवं अन्नपूर्णा देवी की पूजा-अर्चना के लिए नेपाल से भी श्रद्धालु यहां आते हैं।
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बताया जाता हैं कि इस मंदिर का निर्माण थारु जनजाति के सरदारों द्वारा सैकड़ों वर्ष पूर्व कराया गया था। मंदिर का जीर्णोद्धार 2001 में कराया गया था।
थारु जनजाति के लोग रहिया देवी को कुल देवी मानते हैं। परंपरा के अनुसार थारु जनजाति के लोग अपने सभी शुभ कार्य रहिया देवी के दर्शन कर शुरू करते हैं। शादी-विवाह के बाद देवी का आशीर्वाद लेने भी मंदिर जरुर आते हैं।
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मुण्डन, कर्ण-छेदन व जनेऊ संस्कार भी मंदिर में ही होता है। नवरात्र में नौ दिन तक यहां मेला लगता है। मेले में थारु जनजाति के लोग बड़ी संख्या में हिस्सा लेते हैं। नौ दिन श्रद्धालु विधि विधान के साथ देवी की पूजा अर्चना करते हैं।
रात में होने वाले भंडारे में थारु जनजाति के लोग प्रसाद ग्रहण करने आते हैं। मंदिर के व्यवस्थापक हीरा लाल यादव के मुताबिक मंदिर की व्यवस्था में स्थानीय लोगों का भरपूर सहयोग मिल रहा है। मंदिर पहुंचने लिए पक्की सड़क निर्माण की मांग शासन-प्रशासन से की गई है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि रहिया देवी (वन देवी) से सच्चे मन से मांगी गईं मुरादें अवश्य पूर्ण होती है। इसी मान्यता के चलते गैसड़ी, पचपेड़वा, जरवा, बालापुर एवं तुलसीपुर के लोग अपनी मन्नतें लेकर रहिया देवी मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए आते है। पूजा-अर्चना कर भक्त वन देवी से मनवांछित फल प्राप्त करने का आशीर्वाद मांगते है।