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Gonda News: बुजुर्गों की लाठी बन रहा मेडिकल कॉलेज का हड्डी रोग विभाग
Thu, 19 Oct 2023 11:41 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Thu, 19 Oct 2023 11:41 PM IST
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गोंडा में मेडिकल कॉलेज के आर्थो वार्ड में मरीजों को देखते डॉ. अतुल सिंह।
गोंडा। स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय का ऑर्थो विभाग बुजुर्ग मरीजों का सहारा बन रहा है। यहां घुटने व कूल्हे का प्रत्यारोपण शुरू होने से मरीजों में नई उम्मीद जग गई है। विशेषज्ञ चिकित्सक लंबे समय से बिस्तर पर पड़े बुजुर्गों को भी चलाने का दावा कर रहे हैं।
शहर के खैरा नई बस्ती निवासी धीरजराम तिवारी (93) दो महीना पहले फिसलकर गिर गए थे। उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई थी। कई निजी अस्पतालों में दिखाने पर डॉक्टर ने उम्र का हवाला देते हुए ऑपरेशन करने से हाथ खड़े कर दिए थे। शनिवार को उन्हें मेडिकल कॉलेज लाया गया। जहां आर्थो सर्जन डॉ. अतुल सिंह ने कूल्हे का प्रत्यारोपण किया। ऑपरेशन सफल होने के बाद उनके पैर चलने लगे।
माधोपुर के दामोदर पुरवा निवासी शिवकुमार (82) के कूल्हे का प्रत्यारोपण भी शुक्रवार को किया गया। अब वे वाॅकर के सहारे से चलने भी लगे। खरगूचांदपुर निवासी उमा देवी (62) को भी मेडिकल कॉलेज के ऑर्थों वार्ड ने सहारा दिया और वह चलने लगीं।
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डॉक्टर अतुल ने बताया कि निजी अस्पतालों में कूल्हा प्रत्यारोपण का बहुत अधिक खर्च आता था। यहां परिजनों से सहमति लेकर ऑपरेशन करने का प्रयास किया और सर्जरी सफल रही। अभी तक मेडिकल कॉलेज में कूल्हा उपलब्ध नहीं था, इसलिए मरीजों के परिजन बाहर से कूल्हा खरीदकर लाए। बाकी पूरी सर्जरी व दवाएं यहां पर मुफ्त में मिली।
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शहर के खैरा नई बस्ती निवासी धीरजराम तिवारी (93) दो महीना पहले फिसलकर गिर गए थे। उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई थी। कई निजी अस्पतालों में दिखाने पर डॉक्टर ने उम्र का हवाला देते हुए ऑपरेशन करने से हाथ खड़े कर दिए थे। शनिवार को उन्हें मेडिकल कॉलेज लाया गया। जहां आर्थो सर्जन डॉ. अतुल सिंह ने कूल्हे का प्रत्यारोपण किया। ऑपरेशन सफल होने के बाद उनके पैर चलने लगे।
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माधोपुर के दामोदर पुरवा निवासी शिवकुमार (82) के कूल्हे का प्रत्यारोपण भी शुक्रवार को किया गया। अब वे वाॅकर के सहारे से चलने भी लगे। खरगूचांदपुर निवासी उमा देवी (62) को भी मेडिकल कॉलेज के ऑर्थों वार्ड ने सहारा दिया और वह चलने लगीं।
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डॉक्टर अतुल ने बताया कि निजी अस्पतालों में कूल्हा प्रत्यारोपण का बहुत अधिक खर्च आता था। यहां परिजनों से सहमति लेकर ऑपरेशन करने का प्रयास किया और सर्जरी सफल रही। अभी तक मेडिकल कॉलेज में कूल्हा उपलब्ध नहीं था, इसलिए मरीजों के परिजन बाहर से कूल्हा खरीदकर लाए। बाकी पूरी सर्जरी व दवाएं यहां पर मुफ्त में मिली।