{"_id":"130-87719","slug":"Gonda-87719-130","type":"story","status":"publish","title_hn":"बिना अपराध के ही सजा काट रहे सात बच्चे","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बिना अपराध के ही सजा काट रहे सात बच्चे
Gonda
Updated Wed, 29 Oct 2014 05:30 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
महिला बंदी व उनके साथ सजा काट रहे बच्चे-
महिला बंदी का नाम बच्चे का नाम
सोनू बबुआ (चार माह)
शारदा मुस्कान (26 माह)
गिरिजा सत्यम (तीन वर्ष)
विमला शारदा (चार वर्ष)
दिलजहां शादाब (तीन वर्ष)
दिलजहां सूफिया (चार वर्ष)
श्रीमती (दादी) सृष्टि (तीन वर्ष)
गोंडा। जिला कारागार में सजा काट रहीं महिलाओं के मासूमों को किसी अदालत से सजा का फरमान नहीं सुनाया गया है, फिर भी वे बच्चे मां के साथ जेल में बंद हैं। दहेज हत्या समेत कई मामलों में जेल में निरुद्ध महिलाओं के सात बच्चे कारागार में मां के साथ बंद हैं। उन्हें यह भी नहीं मालूम कि वह जेल में क्यों कैद हैं। हालांकि बच्चों का पालन उनकी मां कर रही हैं। जेल विभाग की ओर से बनाए गए क्रेच में बच्चे खेलकूद के साथ ही ककहरा भी पढ़ रहे हैं।
जिला कारागार में बंदियों के रहने के लिए 15 बैरकों की व्यवस्था है। 14 बैरकों की क्षमता 30 बंदियों की है, जबकि अस्पताल बैरक में केवल 20 बंदियों के रहने की व्यवस्था है। इस तरह कारागार में कुल 508 बंदियों के रहने की क्षमता है, जबकि यहां 850 से अधिक बंदी रहते हैं। इनमें करीब 450 बंदियों को सजा सुनाई गई है, जबकि अन्य बंदी कई आपराधिक मामलों में निरुद्ध हैं। यहां बैरकों में क्षमता से अधिक बंदी रह रहे हैं, जिन्हें कई समस्याओं से जूझना पड़ता है। इन्हीं बैरकों से हटकर एक महिला बैरक बनी है। इसकी क्षमता मात्र 30 बंदियों की है, लेकिन यहां भी 42 महिला बंदी कई आपराधिक मामलों में निरुद्ध हैं। इनमें सात महिलाओं को अदालत से सजा सुनाई जा चुकी है। इन महिलाओं के साथ ही इनके बच्चे भी यहां कैद हैं। जबकि उन्हें यह भी नहीं मालूम कि उनकी मां और वह जेल में क्यों हैं।
इनसेट
बच्चों के लिए है अस्पताल व पाठशाला
जिला कारागार में निरुद्ध विचाराधीन व सजायाफ्ता महिला बंदियाें के बच्चों के लिए क्रेच (चाइल्ड केयर) की व्यवस्था है। यहां बच्चों के इलाज के लिए अस्पताल व पढ़ने के लिए पाठशाला भी है। जहां बच्चों को उनकी मां पढ़ाया करती हैं। हालांकि बच्चों को पढ़ाने के लिए यहां अध्यापक की भी व्यवस्था है। वह भी बच्चों को ककहरा सिखा रहे हैं।
विज्ञापन
इनसेट
क्रेच में है ये व्यवस्था
जिला कारागार के क्रेच (चाइल्ड केयर) में महिला बंदियों के बच्चों के लिए कुर्सी, मेज, स्टूल, बैट-बाल, खिलौने व किताबें, स्लेट, चाक, कपड़ों समेत उनकी जरूरत की सभी चीजें मौजूद हैं। क्रेच में मां से काफी समय तक दूर रहने के कारण उन्हें मां की जरूरत न महसूस हो, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। जब तक बच्चों की मां उनके पास न आ जाएं, तब तक देखरेख के लिए लगाई गई महिला उनका ध्यान रखती हैं। क्रेच में बच्चों के लिए मिकी-माउस, हीमैन, मिकी एंड डोनाल्ड जैसे सेटेलाइट चैनलों पर दिखने वाले कॉर्टून मौजूद हैं, जिनसे वह अपना मन बहला रहे हैं।
इनसेट
घंटे की आवाज सुनकर जागते बच्चे
जिला जेल में सजा काट रहीं महिला बंदियों के बच्चे हर रोज भोर में चार बजे घंटे की आवाज सुनकर जागते हैं। कारागार में प्रत्येक घंटे पर घंटा बजाकर जेलकर्मियों को सतर्क रहने की हिदायत दी जाती है। अपनी मां के साथ सजा काट रहे बच्चे भोर में चार बजे घंटा बजते ही जग जाते हैं। इसके बाद महिला बंदियों की गिनती कराने के बाद साढ़े छह बजे जेल खोल दी जाती है।
इनसेट
जिला जेल की महिला बैरक में जो भी बंदी निरुद्ध हैं, उनमें से सात महिला बंदियों को अदालत ने विभिन्न मामलों में सजा सुनाई है। सात महिला बंदियों के बच्चे पांच साल से कम के हैं, इसलिए वह अपनी मां के साथ कारागार में रह रहे हैं। बच्चों को मां से अलग नहीं किया जा सकता है
-दिलीप पाण्डेय, जेलर
विज्ञापन
महिला बंदी का नाम बच्चे का नाम
सोनू बबुआ (चार माह)
शारदा मुस्कान (26 माह)
गिरिजा सत्यम (तीन वर्ष)
विमला शारदा (चार वर्ष)
दिलजहां शादाब (तीन वर्ष)
दिलजहां सूफिया (चार वर्ष)
श्रीमती (दादी) सृष्टि (तीन वर्ष)
गोंडा। जिला कारागार में सजा काट रहीं महिलाओं के मासूमों को किसी अदालत से सजा का फरमान नहीं सुनाया गया है, फिर भी वे बच्चे मां के साथ जेल में बंद हैं। दहेज हत्या समेत कई मामलों में जेल में निरुद्ध महिलाओं के सात बच्चे कारागार में मां के साथ बंद हैं। उन्हें यह भी नहीं मालूम कि वह जेल में क्यों कैद हैं। हालांकि बच्चों का पालन उनकी मां कर रही हैं। जेल विभाग की ओर से बनाए गए क्रेच में बच्चे खेलकूद के साथ ही ककहरा भी पढ़ रहे हैं।
जिला कारागार में बंदियों के रहने के लिए 15 बैरकों की व्यवस्था है। 14 बैरकों की क्षमता 30 बंदियों की है, जबकि अस्पताल बैरक में केवल 20 बंदियों के रहने की व्यवस्था है। इस तरह कारागार में कुल 508 बंदियों के रहने की क्षमता है, जबकि यहां 850 से अधिक बंदी रहते हैं। इनमें करीब 450 बंदियों को सजा सुनाई गई है, जबकि अन्य बंदी कई आपराधिक मामलों में निरुद्ध हैं। यहां बैरकों में क्षमता से अधिक बंदी रह रहे हैं, जिन्हें कई समस्याओं से जूझना पड़ता है। इन्हीं बैरकों से हटकर एक महिला बैरक बनी है। इसकी क्षमता मात्र 30 बंदियों की है, लेकिन यहां भी 42 महिला बंदी कई आपराधिक मामलों में निरुद्ध हैं। इनमें सात महिलाओं को अदालत से सजा सुनाई जा चुकी है। इन महिलाओं के साथ ही इनके बच्चे भी यहां कैद हैं। जबकि उन्हें यह भी नहीं मालूम कि उनकी मां और वह जेल में क्यों हैं।
विज्ञापन
इनसेट
बच्चों के लिए है अस्पताल व पाठशाला
जिला कारागार में निरुद्ध विचाराधीन व सजायाफ्ता महिला बंदियाें के बच्चों के लिए क्रेच (चाइल्ड केयर) की व्यवस्था है। यहां बच्चों के इलाज के लिए अस्पताल व पढ़ने के लिए पाठशाला भी है। जहां बच्चों को उनकी मां पढ़ाया करती हैं। हालांकि बच्चों को पढ़ाने के लिए यहां अध्यापक की भी व्यवस्था है। वह भी बच्चों को ककहरा सिखा रहे हैं।
विज्ञापन
इनसेट
क्रेच में है ये व्यवस्था
जिला कारागार के क्रेच (चाइल्ड केयर) में महिला बंदियों के बच्चों के लिए कुर्सी, मेज, स्टूल, बैट-बाल, खिलौने व किताबें, स्लेट, चाक, कपड़ों समेत उनकी जरूरत की सभी चीजें मौजूद हैं। क्रेच में मां से काफी समय तक दूर रहने के कारण उन्हें मां की जरूरत न महसूस हो, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। जब तक बच्चों की मां उनके पास न आ जाएं, तब तक देखरेख के लिए लगाई गई महिला उनका ध्यान रखती हैं। क्रेच में बच्चों के लिए मिकी-माउस, हीमैन, मिकी एंड डोनाल्ड जैसे सेटेलाइट चैनलों पर दिखने वाले कॉर्टून मौजूद हैं, जिनसे वह अपना मन बहला रहे हैं।
इनसेट
घंटे की आवाज सुनकर जागते बच्चे
जिला जेल में सजा काट रहीं महिला बंदियों के बच्चे हर रोज भोर में चार बजे घंटे की आवाज सुनकर जागते हैं। कारागार में प्रत्येक घंटे पर घंटा बजाकर जेलकर्मियों को सतर्क रहने की हिदायत दी जाती है। अपनी मां के साथ सजा काट रहे बच्चे भोर में चार बजे घंटा बजते ही जग जाते हैं। इसके बाद महिला बंदियों की गिनती कराने के बाद साढ़े छह बजे जेल खोल दी जाती है।
इनसेट
जिला जेल की महिला बैरक में जो भी बंदी निरुद्ध हैं, उनमें से सात महिला बंदियों को अदालत ने विभिन्न मामलों में सजा सुनाई है। सात महिला बंदियों के बच्चे पांच साल से कम के हैं, इसलिए वह अपनी मां के साथ कारागार में रह रहे हैं। बच्चों को मां से अलग नहीं किया जा सकता है
-दिलीप पाण्डेय, जेलर