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Ghazipur News: बिना जोताई की गेहूं की बोआई, 30 प्रतिशत खाद-बीज की बचत
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गाजीपुर। जलवायु अनुकूल खेती पर केंद्र एवं राज्य सरकार काम कर रही हैं। कृषि वैज्ञानिक भी इस पर जोर दे रहे हैं। शुक्रवार को मरदह क्षेत्र के चवर गांव के निवासी अमरजीत सिंह के तीन एकड़ जमीन में जीरो टिलेज तकनीकी से बिना जोताई के सीधे गेहूं की बोआई की गई। विशेषज्ञों के मुताबिक इस तकनीकी से खेती करने पर 20-30 प्रतिशत बीज और 30 प्रतिशत खाद की बचत हुई है। साथ ही पानी की भी बचत हुई है।
अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान वाराणसी के डॉ. आर के मलिक, डॉ अजय पुंढीर, गोपाल पांडे जनमयजय बिवाल, कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक की मौजूदगी में जीरो टिलेज तकनीकी से बोआई की गई। इस तकनीकी से चार से पांच सेमी की दूरी पर बीज खेत में डाला गया। जबकि धान के कटाई के बाद बचे अवशेष वैसे ही पड़ रहे, जो बाद में मिट्टी में सड़कर खाद बन जाएंगे। डॉ.आर के मलिक के मुताबिक इस विधि से बोआई करने पर गेहूं के पौधों के जड़ों की पकड़ अच्छी रहती है, जिससे पौधा जमीन पर नहीं गिरता है। जीरो टिलेज से मृदा संरचना एवं मृदा उर्वरता बनी रहती है। गेहूं के पौधे की बढ़वार अच्छी होती है।
आठ से दस हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की बचत
कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. ओमकार सिंह ने बताया कि जीरो टिलेज से पराली की समस्या दूर होती है। साथ ही कई और भी फायदे हैं। धान की कटाई के बाद गेहूं की बोआई के लिए खेत की तैयारी में परंपरागत विधि में 6-8 जोताई की आवश्यकता पड़ती है, जबकि जीरो टिलेज मशीन से बोआई करने पर यह कार्य बिना जोताई होती है। इसलिए खेत की तैयारी में लगने वाले खर्च में लगभग आठ से दस हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से बचत हो जाती है। साथ ही समय भी बचता है।
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जीरो टिलेज तकनीक के लाभ
अधिक पैदावार: इस तकनीक से बोआई करने पर गेहूं की पैदावार परंपरागत बोआई की अपेक्षा अधिक होती है।
जीरो टिलेज मशीन से गेहूं की बुवाई 10-15 दिन पहले की जा सकती है। इससे देर से बोआई के कारण पैदावार में होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सकती है।
इस विधि से बोआई करने पर गेहूं के पौधों के जड़ों की पकड़ अच्छी रहती है जिससे पौधा जमीन पर नहीं गिरता है।
जीरो टिलेज से मृदा संरचना एवं मृदा उर्वरता बनी रहती है। इससे गेहूं के पौधे की बढ़वार अच्छी होती है।
धान की कटाई ‘कम्बाइन मशीन से करने पर धान के पूरे अवशेष खेत में ही पड़े रहते हैं। ये अवशेष गेहूं की फसल में ‘मल्च’ का कार्य करते हैं जिससे पानी (नमी) का वाष्पीकरण कम होता है तथा इन अवशेषों के सड़ने से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है।
जीरो टिलेज तकनीक से बोआई करने के बाद यदि वर्षा हो जाती है तो खेत में पपड़ी नहीं पड़ती है तथा फसल का अंकुरण प्रभावित नहीं होता है।
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अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान वाराणसी के डॉ. आर के मलिक, डॉ अजय पुंढीर, गोपाल पांडे जनमयजय बिवाल, कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक की मौजूदगी में जीरो टिलेज तकनीकी से बोआई की गई। इस तकनीकी से चार से पांच सेमी की दूरी पर बीज खेत में डाला गया। जबकि धान के कटाई के बाद बचे अवशेष वैसे ही पड़ रहे, जो बाद में मिट्टी में सड़कर खाद बन जाएंगे। डॉ.आर के मलिक के मुताबिक इस विधि से बोआई करने पर गेहूं के पौधों के जड़ों की पकड़ अच्छी रहती है, जिससे पौधा जमीन पर नहीं गिरता है। जीरो टिलेज से मृदा संरचना एवं मृदा उर्वरता बनी रहती है। गेहूं के पौधे की बढ़वार अच्छी होती है।
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आठ से दस हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की बचत
कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. ओमकार सिंह ने बताया कि जीरो टिलेज से पराली की समस्या दूर होती है। साथ ही कई और भी फायदे हैं। धान की कटाई के बाद गेहूं की बोआई के लिए खेत की तैयारी में परंपरागत विधि में 6-8 जोताई की आवश्यकता पड़ती है, जबकि जीरो टिलेज मशीन से बोआई करने पर यह कार्य बिना जोताई होती है। इसलिए खेत की तैयारी में लगने वाले खर्च में लगभग आठ से दस हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से बचत हो जाती है। साथ ही समय भी बचता है।
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जीरो टिलेज तकनीक के लाभ
अधिक पैदावार: इस तकनीक से बोआई करने पर गेहूं की पैदावार परंपरागत बोआई की अपेक्षा अधिक होती है।
जीरो टिलेज मशीन से गेहूं की बुवाई 10-15 दिन पहले की जा सकती है। इससे देर से बोआई के कारण पैदावार में होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सकती है।
इस विधि से बोआई करने पर गेहूं के पौधों के जड़ों की पकड़ अच्छी रहती है जिससे पौधा जमीन पर नहीं गिरता है।
जीरो टिलेज से मृदा संरचना एवं मृदा उर्वरता बनी रहती है। इससे गेहूं के पौधे की बढ़वार अच्छी होती है।
धान की कटाई ‘कम्बाइन मशीन से करने पर धान के पूरे अवशेष खेत में ही पड़े रहते हैं। ये अवशेष गेहूं की फसल में ‘मल्च’ का कार्य करते हैं जिससे पानी (नमी) का वाष्पीकरण कम होता है तथा इन अवशेषों के सड़ने से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है।
जीरो टिलेज तकनीक से बोआई करने के बाद यदि वर्षा हो जाती है तो खेत में पपड़ी नहीं पड़ती है तथा फसल का अंकुरण प्रभावित नहीं होता है।