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अब न रंगकर्मी रहे न कद्र करने वाले
ब्यूरो/अमर उजाला,गाजीपुर
Updated Mon, 28 Mar 2016 12:01 AM IST
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शिवमूर्ति सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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रंगमंच की उपेक्षा और रंगकर्मियों की बेहतरी के लिए शासन स्तर पर कुछ नहीं किए जाने के कारण अब न तो रंगकर्मी रहे और न ही इसकी कद्र करने वाले। उपेक्षा के चलते आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे रंगकर्मियों ने नाट्य विधा से सन्यास लेकर रोजी रोटी के अन्य साधनों को अपना लिया। ये बातें 82 वर्षीय वयोवृद्ध रंगकर्मी नाटककार डॉ. शिवमूर्ति सिंह ने रविवार को विश्व थियेटर दिवस पर अमर उजाला से खास बातचीत में कहीं।
उन्होंने कहा कि एक जमाने में रंगमंच ही मनोरंजन का एकमात्र साधन हुआ करता था। जब कहीं नाटक खेले जाते थे तो बड़ी संख्या में भीड़ जुटती थी। सामाजिक विसंगतियों पर आधारित नाटक देखकर लोग चैतन्य होते थे। रंगकर्मियों की कला को प्रोत्साहन तो मिलता ही था, उनकी आय भी होती थी। अब लोग नाटकों का मंचन नहीं देखना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि रंगमंच हमेशा समाज को दिशा देने का काम करता रहा है।
गाजीपुर में सबसे पहले वर्ष 1916 में पं. भागवत मिश्र के प्रोत्साहन और सहयोग से पं. माधव शुक्ल ने हिंदी नाट्य समिति की स्थापना की थी। वर्ष 1939-40 में जलियावाला बाग कांड के आधार पर करंडा के बचई सिंह के नेतृत्व में एक लघु नाटक तैयार कर उसका मंचन किया गया था। वर्ष 1980 में माध्यम नाट्य संस्था की स्थापना की गई। 4 जनवरी 1981 को रंगमंचीय नाटकों के प्रस्तुतिकरण के साथ रंग आंदोलन की शुरुआत की गई। कहा कि उन्होंने नाट्य संस्था की स्थापना की थी।
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उन्होंने गाजीपुर में दर्जन भर से ज्यादा नाटकों का आकर्षक रंगमंचीय प्रस्तुतिकरण किया। पूर्वांर्ध, महाप्रस्थान, स्कंदगुप्त, गिरीश करनाड की तरफ से रचित तुगलक, धर्मवीर भारती कृत अंधायुग, मोहन राकेश कृत आषाढ़ का एक दिन, डा. शंभूनाथ सिंह कृत गांधारी, अकेलापन शहर, बादल सरकार का एवं इंद्रजीत आदि नाटकों का मंचन कर गाजीपुर में रंगमंच को मुकाम प्रदान किया। इन प्रयासों के बावजूद जिले में रंगमंच कर्मियों का अभाव बना रहने से भावों का प्रस्तुतिकरण लगभग थमा ही नहीं बल्कि समाप्त हो गया।
जिले के करंडा विकासखंड के बसंत पट्टी के मूल निवासी एवं स्नातकोत्तर महाविद्यालय के रिटायर्ड हिंदी विभागाध्यक्ष डा. शिवमूर्ति सिंह इन दिनों ददरीघाट स्थित अपने आवास पर निवास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का दुख है कि उन्होंने वर्षों पहले आडिटोरियम के लिए काफी प्रयास किया था। लगातार प्रयास के बाद भी आडोटोरियम की स्थापना नहीं हो सकी।
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उन्होंने कहा कि एक जमाने में रंगमंच ही मनोरंजन का एकमात्र साधन हुआ करता था। जब कहीं नाटक खेले जाते थे तो बड़ी संख्या में भीड़ जुटती थी। सामाजिक विसंगतियों पर आधारित नाटक देखकर लोग चैतन्य होते थे। रंगकर्मियों की कला को प्रोत्साहन तो मिलता ही था, उनकी आय भी होती थी। अब लोग नाटकों का मंचन नहीं देखना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि रंगमंच हमेशा समाज को दिशा देने का काम करता रहा है।
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गाजीपुर में सबसे पहले वर्ष 1916 में पं. भागवत मिश्र के प्रोत्साहन और सहयोग से पं. माधव शुक्ल ने हिंदी नाट्य समिति की स्थापना की थी। वर्ष 1939-40 में जलियावाला बाग कांड के आधार पर करंडा के बचई सिंह के नेतृत्व में एक लघु नाटक तैयार कर उसका मंचन किया गया था। वर्ष 1980 में माध्यम नाट्य संस्था की स्थापना की गई। 4 जनवरी 1981 को रंगमंचीय नाटकों के प्रस्तुतिकरण के साथ रंग आंदोलन की शुरुआत की गई। कहा कि उन्होंने नाट्य संस्था की स्थापना की थी।
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उन्होंने गाजीपुर में दर्जन भर से ज्यादा नाटकों का आकर्षक रंगमंचीय प्रस्तुतिकरण किया। पूर्वांर्ध, महाप्रस्थान, स्कंदगुप्त, गिरीश करनाड की तरफ से रचित तुगलक, धर्मवीर भारती कृत अंधायुग, मोहन राकेश कृत आषाढ़ का एक दिन, डा. शंभूनाथ सिंह कृत गांधारी, अकेलापन शहर, बादल सरकार का एवं इंद्रजीत आदि नाटकों का मंचन कर गाजीपुर में रंगमंच को मुकाम प्रदान किया। इन प्रयासों के बावजूद जिले में रंगमंच कर्मियों का अभाव बना रहने से भावों का प्रस्तुतिकरण लगभग थमा ही नहीं बल्कि समाप्त हो गया।
जिले के करंडा विकासखंड के बसंत पट्टी के मूल निवासी एवं स्नातकोत्तर महाविद्यालय के रिटायर्ड हिंदी विभागाध्यक्ष डा. शिवमूर्ति सिंह इन दिनों ददरीघाट स्थित अपने आवास पर निवास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का दुख है कि उन्होंने वर्षों पहले आडिटोरियम के लिए काफी प्रयास किया था। लगातार प्रयास के बाद भी आडोटोरियम की स्थापना नहीं हो सकी।