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लाल की शहादत पर दूसरे दिन भी नहीं जले चूल्हे
गाजीपुर
Updated Fri, 25 Nov 2016 12:24 AM IST
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लाल की शहादत पर दूसरे दिन भी नहीं जले चूल्हे
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ारत माता के सम्मान में अपने प्राण को न्यौछावर करने वाले जांबाज शशांक कुमार सिंह के सम्मान में शहादत क दूसरे दिन भी पूरे गांव के घरों में चूल्हे नहीं जले। तीसरे दिन गुरुवार को भी माटी के लाल की शहादत पर ही गांव में चर्चा रही। गुरुवार को गांव के हर किसी की आंखें उस ओर टिकी रहीं जिस रास्ते से शहीद का पार्थिव शरीर गांव में आने वाला था। उधर माता-पिता सहित परिवार के लोगों का सब्र टूट रहा था। तभी 2.40 बजे अंधऊ हवाई पट्टी पर शहीद के पार्थिव शरीर के आने की सूचना मिली।
इसके साथ ही घर वालों और गांव वालों की आंखों से आंसू बहने लगे। वहीं शशांक के शहीद होने से जहां पूरा गांव गमगीन है, वहीं देश के लिए मर-मिटने पर गर्व भी कर रहा है।
वर्ष 2010 में शशांक कुमार सिंह सेना में भर्ती हुए, तो उनकी मां कमलावती देवी का कलेजा इस बात से चौड़ा हो गया था। तब वह लोगों से यह कहतीं फिरती थीं कि मेरा दूसरा बेटा भी भारत मां की रक्षा करने के लिए फौज में गया है।
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मंगलवार की देर शाम उस मां के कान में यह आवाज पहुंची कि शशांक शहीद हो गए। तो वह कुछ देर के लिए पूरी तरह से खामोश हो गईं और कुछ देर बाद उसकी आंखों आंसू की धार फूट पड़े। बेटे की शहादत से उसका कलेजा फटा जा रहा था, लेकिन बेटा देश के लिए कुर्बान हुआ है इसका फख्र भी था। शहीद की भाभी सुलेखा के साथ ही बहन ज्योति की आंखों से आंसुओं से डूबी रही।
यह खबर मिलते ही पूरा गांव शहीद के दरवाजे पर पहुंच गया और परिवार वालों को देश के लिए अपनी प्राणों को न्यौछावर करने पर गर्व महसूस करते हुए परिवार वालों को सांत्वना देने में जुट गया। यह सिलसिला मंगलवार को देर रात से शुरू होकर बुधवार को भी पूरे दिन चलता रहा। गुरुवार को शव आने की सभी प्रतीक्षा करते रहे। उधर 90 वर्षीय शहीद की दादी रमावती देवी की आंखों से भी पोते की शहादत पर आंसू बह रहे थे।
वह बार-बार परिवार के लोगों से यह पूछ रही थी, उसका लाल कब तक आएगा। शहीद का बड़ा भाई हिमांशु जो खुद सेना में है, शशांक के पोस्ट से 70 किलोमीटर की दूरी पर तैनात था, छुट्टी लेकर गुरुवार की भोर में वह घर पहुंचा। दूसरा भाई सुधांशु जो दिल्ली में किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता है, वह भी मंगलवार की देर शाम घर पर आ गया।
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इसके साथ ही घर वालों और गांव वालों की आंखों से आंसू बहने लगे। वहीं शशांक के शहीद होने से जहां पूरा गांव गमगीन है, वहीं देश के लिए मर-मिटने पर गर्व भी कर रहा है।
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वर्ष 2010 में शशांक कुमार सिंह सेना में भर्ती हुए, तो उनकी मां कमलावती देवी का कलेजा इस बात से चौड़ा हो गया था। तब वह लोगों से यह कहतीं फिरती थीं कि मेरा दूसरा बेटा भी भारत मां की रक्षा करने के लिए फौज में गया है।
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मंगलवार की देर शाम उस मां के कान में यह आवाज पहुंची कि शशांक शहीद हो गए। तो वह कुछ देर के लिए पूरी तरह से खामोश हो गईं और कुछ देर बाद उसकी आंखों आंसू की धार फूट पड़े। बेटे की शहादत से उसका कलेजा फटा जा रहा था, लेकिन बेटा देश के लिए कुर्बान हुआ है इसका फख्र भी था। शहीद की भाभी सुलेखा के साथ ही बहन ज्योति की आंखों से आंसुओं से डूबी रही।
यह खबर मिलते ही पूरा गांव शहीद के दरवाजे पर पहुंच गया और परिवार वालों को देश के लिए अपनी प्राणों को न्यौछावर करने पर गर्व महसूस करते हुए परिवार वालों को सांत्वना देने में जुट गया। यह सिलसिला मंगलवार को देर रात से शुरू होकर बुधवार को भी पूरे दिन चलता रहा। गुरुवार को शव आने की सभी प्रतीक्षा करते रहे। उधर 90 वर्षीय शहीद की दादी रमावती देवी की आंखों से भी पोते की शहादत पर आंसू बह रहे थे।
वह बार-बार परिवार के लोगों से यह पूछ रही थी, उसका लाल कब तक आएगा। शहीद का बड़ा भाई हिमांशु जो खुद सेना में है, शशांक के पोस्ट से 70 किलोमीटर की दूरी पर तैनात था, छुट्टी लेकर गुरुवार की भोर में वह घर पहुंचा। दूसरा भाई सुधांशु जो दिल्ली में किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता है, वह भी मंगलवार की देर शाम घर पर आ गया।